विश्वविद्यालय परिसरों में लागू है लाट साहब का एजेंडा

मुद्दा , , शनिवार , 07-07-2018


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अंबरीश कुमार

लखनऊ। लखनऊ विश्विद्यालय में बनारस हिंदू विश्विद्यालय को दोहराया जा रहा है। सिर्फ बनारस ही क्यों यूपी के ज्यादातर विश्विद्यालय में यह दोहराया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक पहले ही कह चुके हैं कि वे पहले एक स्वंयसेवक हैं। ऐसा महसूस हो रहा है कि अब यह स्वंयसेवक ज्यादातर विश्विद्यालय परिसर में संघ को संरक्षित करने और हर दूसरी राजनैतिक धारा के लोगों को अपमानित करने का प्रयास कर रहा है। धीरे-धीरे  यह मानने लगे हैं। 

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि लखनऊ विश्विद्यालय परिसर में संघ का एजेंडा लागू किया जा रहा है। समाजवादी पार्टी की छात्र शाखा को सत्तारूढ़ दल के इशारे पर बदनाम किया जा रहा है। ताजा मामला विश्विद्यालय की छात्रा पूजा शुक्ल का है। वे पढ़ना चाहती हैं पर विश्विद्यालय का कुलपति उन्हें इसलिए प्रवेश नहीं दे रहा है क्योंकि उन्होंने छात्र आंदोलन के दौरान मुख्यमंत्री योगी को काला झंडा दिखाया था।

देश में जितने भी नेता विश्विद्यालय की राजनीति से निकले हैं वे सभी अपने दौर में काला, पीला, लाल और हरा झंडा सीएम से लेकर पीएम तक को दिखाते रहे हैं। हम लोग भी इसी विश्विद्यालय में एक नहीं कई बार झंडा दिखाने से लेकर पुतला फूंकने जैसी कार्रवाई में शामिल रहे। पर इस वजह से प्रवेश नहीं रोका गया। लेकिन लखनऊ विश्विद्यालय के कुलपति ने न सिर्फ भाजपा के बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारे की हवा निकाल दी बल्कि इस बेटी को पुलिस को सौंप दिया। पुलिस ने उसे घसीट कर अस्पताल पहुंचा दिया। यह घटना संघ का चश्मा पहनने वालों को नहीं दिखी। 

दूसरी तरफ विश्वविद्यालय में छात्रों के एक झुंड ने कुलपति और शिक्षकों से मारपीट की। यह दुर्भाग्यपूर्ण था। अदालत ने संज्ञान लिया। बिलकुल लेना चाहिए। साथ ही इस घटना की तह में भी जाना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि क्या वजह है जो बनारस, इलाहाबाद से लेकर लखनऊ तक कुलपति पर हमला हो रहा है। पर अनर्थ तब होगा जब इन दोनों घटनाओं को जोड़ देंगे। यह संघ की रणनीति है। संघ सत्ता में है। देश की, प्रदेश की और विश्वविद्यालय की भी। ऐसे में अगर दूसरी धारा को कुचलने का प्रयास हुआ तो टकराव शुरू होगा। बनारस में भी यही हुआ और इलाहाबाद में भी। 

अब लखनऊ निशाने पर है। लखनऊ  विश्विद्यालय की शालीन कुलपति रहीं प्रोफ़ेसर रूप रेखा वर्मा भूख हड़ताल पर बैठी पूजा शुक्ल से मिलने गईं थीं। वे लखनऊ के जन आंदोलनों का जाना पहचाना चेहरा हैं। अगर पूजा शुक्ल के अनशन के बहाने उन्हें फंसाने का भी प्रयास होगा तो नागरिक समाज चुप नहीं बैठेगा। लाट साहब को यह समझना चाहिए। और संयम भी बरतना चाहिए। जो छात्र आंदोलन करते रहे हैं, उनसे संवाद की जरूरत है। जेल भेजने से समस्या का हल नहीं निकलेगा।

(अंबरीश कुमार शुक्रवार के संपादक हैं और 26 वर्षों तक इंडियन एक्सप्रेस समूह से जुड़े रहे हैं।)

 




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