महाराष्ट्र में पक रही है दांवपेंचों से भरी सियासी खिचड़ी

विशेष , मुंबई, सोमवार , 13-11-2017


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लोकमित्र गौतम

इसे कहते हैं सिर मुड़ाते ही ओले पड़ना। शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे जब तक जिंदा रहे, कभी किसी से मिलने कहीं नहीं गए। देश के बड़े से बड़े नेता को अगर उनसे मिलना होता था, तो उसे उनके निवास मातोश्री में ही आना पड़ता था। अपने ही घर में सबसे मिलना उनका एक सियासी टसन था। यही वजह है कि जब महाराष्ट्र में पहली बार शिवसेना भाजपा कि गठबंधन सरकार आयी तो सरकार के विरोधी व्यंग्य में कहा करते थे कि सरकार तो मातोश्री से चल रही है। उनके न रहने के बाद कई सालों तक उद्धव ठाकरे ने भी वही ठसक अपनाने की कोशिश की कि जिसको उनसे मिलना हो वह मातोश्री आये। शुरू में तो कुछ लोग आये भी। लेकिन धीरे धीरे आने वाले पहले कम हुए फिर करीब-करीब खत्म हो गए।

उद्धव और पवार। 

इसलिए पिछले पखवाड़े उद्धव ने मातोश्री से बाहर न जाने की परम्परा को तोड़ते हुए दो नेताओं से मिलने उनके घर या होटल गए। इनमें एक थीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दूसरे महाराष्ट्र की राजनीति में मौजूदा चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार। ममता से मिलने जाने पर तो उद्धव न केवल अपने बेटे को भी साथ ले गए बल्कि फोटोग्राफर को भी ले गए और सेना के प्रवक्ता संजय राउत ने पत्रकारों को इस मीटिंग के संबंध में फोन ही नहीं किया बल्कि ब्रीफ भी कर दिया। नतीजतन ममता के साथ उद्धव की खूब तस्वीरें छपीं और दसियों तरह के कयास भी बिखरे। शिव सेना ऐसा ही चाहती थी। लेकिन शरद पवार के साथ की मीटिंग को सेना ने बिलकुल गुप्त रखने की कोशिश की जबकि उनसे मिलने जाते समय उद्धव के साथ संजय राउत भी थे।

हालांकि मीडिया को फिर भी पता चल गया और उसने यह अनुमान भी लगा लिया कि प्रदेश में जल्द ही मध्यावधि चुनाव हो सकते हैं। मीडिया के इस अनुमान का तो सेना ने खंडन नहीं किया कि प्रदेश में जल्द ही मध्यावधि चुनाव हो सकते हैं लेकिन वह शरद पवार के साथ उनके आवास पर हुई किसी गुप्त मीटिंग से मुकर गयी। सेना ने बल्कि इसका जोरदार खंडन किया। लेकिन ऐसा करके सेना फंस गयी क्योंकि शरद पवार ने न केवल मीटिंग होने का खुलासा कर दिया बल्कि यह भी आशंका जताई कि सेना शायद लंबे समय तक सरकार के साथ न रह सके। शरद पवार के इस खुलासे से सेना बैक फुट पर ही नहीं आयी बल्कि सरकार के खिलाफ वह जिस चक्रव्यूह को रचने की कोशिश कर रही थी वह अपना आकार लेने के पहले ही बिखर गया।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि महाराष्ट्र की सियासी जंग में गुप्त चक्रव्यूह रचे जाने का सिलसिला थम गया है। सच तो यह है कि सेना के चक्रव्यूह को ध्वस्त करके शरद पवार ने एक किस्म से अपने चक्रव्यूह के खाते में सफलता दर्ज कर दी है। क्योंकि मुलाकात की पुष्टि करके शरद पवार ने एक ओर जहां सेना के मंसूबों का खुलासा कर दिया है और इस तरह भाजपा तथा शिवसेना के बीच अविश्वास की खाईं को और ज्यादा बढ़ा दिया है वहीँ अपने इस तीर से उन्होंने भाजपा की और ज्यादा नजदीकी हासिल करने की कोशिश की है। इसकी पुष्टि दो तरह से होती है एक तो मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने सेना को लगभग ललकारते हुए कह दिया है कि सेना दो नावों में सवारी न करे। उसे अगर गठबंधन तोड़ना है तो जहां कल तोड़ रही हो वहां आज ही तोड़ दे।

दूसरी तरफ उन्होंने भाजपा के राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ गठजोड़ को लेकर भी कह दिया है कि राजनीति में कुछ भी हो सकता है, साथ में यह भी जोड़ा कि शरद पवार भाजपा के साथ रह चुके हैं। हालांकि इस पर तात्कालिक लीपापोती के मद्देनजर शरद पवार की भाषा अचानक थोड़ी बदल गई है। उन्होंने कहा है कि यदि शिवसेना सरकार से बाहर होती है तो एनसीपी फडनवीस सरकार को समर्थन नहीं देगी। उनके मुताबिक़ 2014 में चुनाव के बाद लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा न हो, इसलिए हमने भाजपा को समर्थन देने की घोषणा की थी, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। शरद पवार का यह बयान अपनी जगह है। लेकिन हर कोई जानता है कि आमतौर पर राजनीति में सबसे सरल ढंग से कही गयी बातें ही बदलती हैं। 

लब्बोलुआब यह कि महाराष्ट्र की राजनीति में उथल-पुथल बहुत ज्यादा मची हुई है। सेना कुछ ज्यादा ही बौखलाई हुई है। मगर सवाल है क्यों ? वास्तव में सेना की इस हड़बड़ाहट भरी बेचैनी के पीछे कारण यह है कि सेना किसी भी कीमत में नहीं चाहती कि भाजपा नारायण राणे को  मंत्रिमंडल में जगह दे। दरअसल राणे पुराने सैनिक हैं और सैनिकों की रणनीति की नस नस से वाकिफ हैं। उनका आज भी सेना के कार्यकर्ताओं के बीच आकर्षण है। एक बार वह मंत्री बने नहीं कि बड़ी तादाद में सेकेंड और थर्ड लाइन वाले शिव सैनिकों को खींच लेंगे और आगामी चुनावों में शिव सेना के लिए और भी मुश्किलें खड़ी कर देंगे। 

 

  • राणे के मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होने देना चाहती
  • फंस गयी है शिवसेना

 

इसी आशंका के चलते शिवसेना भाजपा पर लगातार दबाव बना रही है। लेकिन, शिवसेना के विरोध को दरकिनार कर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने राणे को मंत्रिमंडल में शामिल करने की तैयारी शुरू कर दी है। इसीलिये शरद पवार से उद्धव  मुलाकात करने गए थे कि उनसे यह जान सकें कि शिवसेना यदि सरकार से बाहर हुई तो एनसीपी की क्या भूमिका होगी? लेकिन पुराने पहलवान को हलके में लेने का यही नतीजा होता है कि वह अपने अनुभव से नए ताकतवर पहलवान को भी पटखनी दे देता है। शरद पवार ने यही किया। कहाँ तो शिव सेना उनके बल पर सरकार को ब्लैकमेल करना चाहती थी लेकिन उलटे पवार ने ही सेना का अपने पक्ष में यूज कर लिया। वह मुलाकात का खुलासा करके खुद को भाजपा और फडनवीस का शुभचिंतक साबित किया है जाहिर है इससे उनको बहुत कुछ की उम्मीद है।

(लोकमित्र गौतम वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल मुंबई में रहते हैं।)  

 






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