राज्य तंत्र का अभिन्न हिस्सा हो गया है भीड़-दंड

त्रासदी , , बुधवार , 11-07-2018


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मनोज भक्त

गत 3 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय ने गौ-हिंसा से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई में भीड़ दंड (मॉब-लिंचिंग) पर एक संक्षिप्त निर्णय दिया है। सुनवाई कर रही मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने कहा कि मॉब-लिंचिंग किसी भी पैटर्न और मकसद से इतर एक अपराध है और यह कानून-व्यवस्था का मसला है। न्यायालय के अनुसार यह राज्यों के जिम्मे है कि वे इससे निपटें। याचिका से जुड़ीं जानी-मानी अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह के केंद्र की भूमिका के सवाल पर मुख्य न्यायाधीश श्री दीपक मिश्रा ने कहा कि केंद्र अनुच्छेद 256 के तहत राज्यों को आवश्यक निर्देश दे सकता है। 5 जुलाई को केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने जमानत पर रिहा हुए रामगढ़ (झारखंड) लिंचिंग के आरोपियों का माला पहना कर स्वागत किया। गत 29 जून को रामगढ़ लिंचिंग में गौमांस ले जाने के नाम पर अलीमुद्दीन की हत्या कर दी गयी थी। लिंचिंग के अपराधियों को भाजपा के मंत्रियों, सांसदों और विधायकों द्वारा खुले समर्थन की यह कोई अकेली घटना नहीं है। मंत्रियों और सत्ताधारी दल द्वारा भीड़-दंड को खुला समर्थन राज्यतंत्र के संकट को भी उजागर करता है।

भारत के विभिन्न राज्यों में लिंचिंग की घटनाएं बड़ी तेजी से फैली हैं। “द क्विंट” के हिसाब से 2015 से अब तक भीड़-दंड की 62 घटनाएं हो चुकी हैं। पिछले दो महीनों में भीड़-दंड के अलग-अलग मामलों में 27 निर्दोष निर्ममता से मारे गये। इसमें हत्या से कमतर हिंसा वाली अधिकांश घटनायें दर्ज भी नहीं हो पाती हैं। गौ-हिंसा के शिकार ज्यादातर मुस्लिम या दलित हैं। बच्चा-चोरी की अफवाह में भीड़ - हिंसा का शिकार कोई भी हो सकता है। अफवाहों का ह्वाट्स एप्प और सोशल मीडिया के लोकप्रिय साइटों से प्रसारण होता है। लोग जमावड़े में बदल जाते हैं। उकसावे बाजी होती है।

अफवाहों के संगठक चरम हिंसा की ओर भीड़ को मोड़ देते हैं। नागरिक विवेक तो दूर की बात, भीड़ के पास इतना भी वक्त नहीं होता कि सुनी-सुनाई बातों की पड़ताल करे। रामगढ़ (झारखंड) के अलीमुद्दीन के लिचिंग में भाजपा का एक पदाधिकारी अगुवई कर रहा था। लातेहार लिंचिंग में एक हिंदुत्ववादी संगठन के नेतृत्व में भीड़ ने दो बेगुनाहों को पेड़ से लटका कर मार डाला। राजस्थान के अलवर में पहलू खान की हत्या से जुड़े आरोपी भी हिंदुत्वादी संगठन से जुड़े हुए हैं और स्थानीय भाजपा विधायक का सीधा संरक्षण उन्हें प्राप्त है। गौ-हिंसा के अधिकांश मामलों में भाजपा-संघ परिवार से जुड़े लोगों की संलिप्तता सामने आती है।

नागालैंड के दीमापुर में की गयी सईद शरीफुद्दीन खान की जेल से खींचकर भीड़ द्वारा हत्या उनके बांग्लादेशी घुसपैठिया होने की झूठी अफवाह फैलाकर की गयी। इस भीड़ को इस कार्रवाई तक ले जाने के लिए बांग्लादेशियों के खिलाफ नारे लगाये गये और उत्तेजक भाषण दिए गए। जबकि सच्चाई यह थी कि शरीफुद्दीन घुसपैठिया नहीं, भारतीय था। त्रिपुरा में बच्चा चोर की अफवाह में अब तक भीड़-दंड के तीन शिकार हो चुके हैं। एक बच्चे के शव में कटे के निशान होने पर उसकी किडनी अंतर्राष्ट्रीय गिरोह द्वारा चोरी किए जाने की अफवाह उड़ा दी गयी।

इस अफवाह बाजी में राज्य की भाजपा सरकार के एक मंत्री भी शामिल थे। बच्चा-चोर की अफवाह पर पिछले दो माह में 20 से अधिक लोग मारे गये हैं। कार्बी आंगलांग की घटना को छोड़ दिया जाय तो इस मामले में ज्यादातर घूम-घूमकर खटने-कमाने वाले मजदूर ही शामिल हैं। न्यूज 18 ने राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के हवाले से रिपोर्ट किया है कि 2015-16 के 41893 बच्चा-चोरी के मुकाबले 2016-17 में यह संख्या 54823 थी। अपराध सिद्धि दर 22% पर स्थिर है। बच्चा-चोरी की घटनाओं में अफवाह समाज के अंदर बच्चों को खो देने का भय पैदा करता है और खास स्थितियों में यह उन्माद में बदल जाता है।

पिछली 2 जुलाई को केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ह्वाट्सएप एप्प के अधिकारियों को चेतावनी दी कि वे झूठी खबरों पर लगाम लगाएं। केंद्रीय मंत्री की चिंता या उनकी चेतावनी के नतीजों पर सवाल किये जा सकते हैं। यह अलग मसला है। बात सामने आती है कि बेकाबू तकनीक ने सरकार और कानून की क्षमता के लिए भी घंटी बजा दी है। ह्वाट्स एप्प जैसे तकनीकों से प्रसारण-क्षमता चमत्कारिक ढंग से बढ़ गयी है। फोटो या वीडियो संपादन में एप्स के जरिए मनचाहा आभासीय तथ्य गढ़ा जा सकता है। इस गढ़े हुए तथ्य को वायरल किया जाता है। तरंगीय दुनिया में तीखी होड़ मची रहती है। वायरल तथ्य क्षणजीवी होते हैं। उपभोक्ता के पास इसकी परख का भी समय नहीं होता है और वह इसका इस्तेमाल कर लेता है। इंटरनेट की अबाध धारा से आभासी तथ्यों की विराट खपत पहले से ही मौजूद भूखे सामाजिक उपभोक्ता की उपस्थिति के बगैर कैसे संभव है?

भाजपा-संघ परिवार हिंदू भावनाओं की आड़ में अल्पसंख्यकों और खासकर मुस्लिमों के खिलाफ नफरत की राजनीति करते हैं। इनके प्रचार एवं गतिविधियों पर एक सरसरी निगाह डालने से ही यह स्पष्ट हो जाता है। पाकिस्तान के नाम पर वे देश के मुस्लिमों को भारत में अनधिकृत नागरिक के रूप में पेश करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय इस्लामोफोबिया का माहौल उनके लिए मददगार साबित हो रहा है। इस्लाम को हिंदू धर्म पर खतरा के रूप में पेश किया जाता है। लव जिहाद के झूठे हौवे से हिंदू औरतों की इज्जत पर संकट का उन्माद तैयार किया जाता है।

अति राष्ट्रवाद का नारा देकर मुस्लिमों को राष्ट्रद्रोही और एक संभावित आतंकी के रूप में पेश किया जाता है। मुस्लिमों की तेज रफ्तार से बढ़ती आबादी जैसे कुछ चुनिंदा तथ्यहीन प्रचारों के जरिए वे बहुसंख्यक हिंदुओं के लिए भय तैयार करते हैं। ईसाईयों के प्रभावी आबादी वाले आदिवासी अंचलों में भी संघ परिवार राजनीतिक ध्रुवीकरण का यही पैटर्न अपनाता है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत की राजनीति बहुसंख्यकों को दक्षिणपंथी कट्टरतावाद की ओर धकेलने में कामयाब हुई है।

अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भी हम मिलती-जुलती प्रवृतियों को रेखांकित कर सकते हैं। अस्मिताओं का टकराव बीसवीं सदी के सह-अस्तित्व की ओर नहीं बढ़ रहा है। राजनीतिक-भूगोलों से लेकर अंतर्देशीय सामाजिक अस्मिताओं में श्रेष्ठता के लिए मार काट मची है। यह संकटग्रस्त आर्थिकी का छद्मवेश है। ज्यादातर अर्थशास्त्री मान रहे हैं और कि पूंजी स्थायी नहीं तो कम से कम दीर्घकालिक संकट में अवश्य ही फंस चुकी है। बाजार की दवा असरदार नहीं रही। बीसवीं सदी के परंपरागत उद्योग-कृषि-व्यवसाय वैश्वीकरण की मार से उबर नहीं पाये हैं। जुमलों में तैर रही मोदी सरकार ने देश को छला-सा बना दिया है।

राज्य चहेते कॉरपोरेट घरानों की ताबेदारी में लगा है। कॉरपोरेट मनचाहे तरीके से सार्वजनिक स्पेस को हड़प रहा है। 4 जी-5जी इंटरनेट की तेजी में व्यवसायिक विज्ञापनों की चकाचौंध के साये तले सामाजिक असुरक्षा भी अफवाहों के रूप में डोलती रहती हैं, सबसे जवान भारत के युवा को भविष्य लगातार पीछे धकेल रहा है। आम आदमी की निजी हैसियत विराट कॉरपोरेट छाया में लगातार सिमट रही है। इस सर्वग्राही असुरक्षा ने व्यक्ति की पहचान को बेमानी कर दिया है और व्यक्ति एक आदिम हिंस्र पहचान की तलाश के लिए विवश है।

यह हिंसक आदिम पहचान संविधान के समाजवादी दिशा, बराबरी और निजता के अधिकारों के नकार पर खड़ी है। दक्षिणपंथी कट्टरतावाद ने इस पहचान को एक आदर्श के तौर पर प्रतिष्ठित कर दिया है। भीड़ की हिंसा और भीड़ के न्याय को राष्ट्रवाद का एक हिस्सा बनाया जा रहा है। लिंचिंग के वीडियो वायरल हो रहे हैं। केंद्र-राज्य के मंत्रियों द्वारा सार्वजनिक तौर पर भीड़ से निकल रहे हत्यारों को नायक घोषित किया जा रहा है। लिंचिंग में शरीक अधिकांश के लिए यह दंडमुक्त अपराध है। राज्यतंत्र ने इस दोहरेपन के साथ तालमेल बिठा लिया है। विभिन्न राजनीतिक संगठनों, सोशल मीडिया की पहलकदमियों और नागरिक संगठनों ने इसके खिलाफ चौतरफा प्रतिवाद किया है। घृणा-राजनीति फैलाने की मशीनरी के खिलाफ जन-विमर्श को परिपक्व करना लिंचिंग पर लगाम के लिए जरूरी हो गया है।

                                                                                       (लेखक भाकपा (माले) के पोलित ब्यूरो सदस्य हैं और आजकल झारखंड में रहते हैं।)








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