23 मई आ गई, अब क्या?

काम की बात , , सोमवार , 20-05-2019


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हरजिंदर सिंह लाल्टू

(यह लेख एग्जिट पोल प्रसारित होने से पहले लिखा गया था। लिहाजा पढ़ते समय उसके बाद की स्थितियों का इसमें कोई आभास नहीं होगा। लेकिन चूंकि नतीजे अभी 23 को आने बाकी हैं। लिहाजा उसके आइने में लिखे गए इस लेख को यहां देने का फैसला लिया गया है-संपादक)  

आखिर वह दिन आ गया कि देश को एक बीमार दिमाग के तानाशाह से मुक्ति मिलने की उम्मीद पुख्ता हुई है। पर क्या सचमुच हम मुक्त हो गए हैं? शायद उन कारणों की पड़ताल ज़रूरी है जिनकी वजह से पिछले पांच साल का अंधकार युग हमने जिया। और कोई दावा नहीं कर सकता कि आगे भी अंधेरा नहीं है। 2014 के चुनावों के बहुत पहले से हिंदुस्तान के मध्य-वर्ग के लोगों ने जुनून के साथ यह बात फैलानी शुरू की थी कि गुजरात में बड़ी तेजी से विकास हुआ है और पूरे देश को गुजरात मॉडल की ज़रूरत है। अब हर कोई जानता है कि इस झूठ को फैलाने में सबसे बड़ी भूमिका सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की रही, जबकि उनके लिए सच ढूंढना उन दिनों सबसे आसान था।

उन्होंने इस झूठ को फैलाने में बड़ी भूमिका क्यों निभाई और बाक़ी लोगों ने इस झूठ को मान क्यों लिया? सच क्या था? सच यह था कि 1990 से आज तक गुजरात मानव विकास आंकड़ों की सूची में में 11 वें स्थान पर अटका हुआ है। इसे छोड़ दें और पूंजीवादी व्यवस्था में माली बढ़त की बात करें तो पिछले तीन दशकों सें सबसे तेजी से बढ़ते सूचना उद्योग या आईटी के खित्ते में सबसे ऊपर आने वाले छ: शहरों में गुजरात का कोई शहर नहीं आ पाया है। सच यह था कि आज़ादी के बाद सत्तर सालों में पहली बार ऐसा हुआ था कि अदालत के आदेश से किसी राज्य के गृहमंत्री को राज्य में प्रवेश करने से मना किया गया था। पहली बार किसी राज्य की काबीना स्तर की मंत्री और पुलिस प्रमुख को लंबी अवधि तक जेल की सजा काटनी पड़ी (अब भी वे जमानत पर हैं)। राज्य के मुख्यमंत्री को दस बरस तक पश्चिमी मुल्कों में आने से रोकने के लिए वीज़ा देने से मना कर दिया गया। 

यह सच नरेंद्र मोदी और अमित शाह के गुजरात का है। क्या यह लोगों को मालूम नहीं था? सबको मालूम था और लगातार इन पर बातचीत होती रही थी। इशरत जहां, हरेन पांड्या, सोहराबुद्दीन, कौसर बी की हत्याओं से पहले गुजरात का भयंकर नरसंहार, यह सब हर कोई जानता था। गोधरा कांड के बारे में कई तरह के शक जाहिर हो चुके थे और अब भी जब-तब सुनने में आते हैं। तो फिर क्यों लोगों ने तमाम झूठी बातें मान लीं? इस सवाल का जवाब ढूँढे बिना हम सचमुच आगे क्या कुछ होने वाला है, उसका अंदाज़ा नहीं लगा पाएंगे। देश के ज्यादातर लोग ग़रीब और अनपढ़ हैं। उनकी समझ में सीधी सी बात यह है कि कोई भी सरकार उनके हित में काम नहीं करती। 

ऐसे में हिटलर जैसा बड़बोला कोई नेता छप्पन इंच के सीने जैसी बकवास करे, तो लोग उस तरफ झुकते हैं। पर बात महज इतनी नहीं थी। चार दशकों से आरएसएस और इसके कार्यकर्ता लगातार फिरकापरस्ती का ज़हर फैलाते रहे हैं। आज़ादी के तुरंत बाद तीन दशकों तक पढ़े-लिखे लोग फिरकापरस्ती के माहौल में रहते हुए इसमें बह जाने से बचे हुए थे। इसकी वजह कुछ हद तक पहले संघ पर लगा प्रतिबंध और कुछ वह थकान थी जो आज़ादी के दौरान हुए खूनखराबे से आई थी। मुख्य वजह भारतीय संविधान में धर्म-निरपेक्षता और तर्कशील सोच पर दी गयी जोर थी, जिसे सरकारी प्रशासन को चाहे-अनचाहे अलग-अलग तरीकों से सभी खित्तों में लागू करना पड़ा था, जिनमें तालीम और तमाम सांस्कृतिक खित्ते शामिल थे। पर अस्सी के दशक से ये दोनों बातें कमज़ोर पड़ती गईं और तेजी से बढ़ते भ्रष्टाचार के साथ आर्थिक नवउदारवाद का दौर उभरा। इस दौरान संघ परिवार के प्रभाव में नई पीढ़ी बेझिझक फिरकापरस्ती के रंग में डूब चली। विकास और तमाम दूसरी बातों को कवच की तरह अपनाते हुए फिरकापरस्ती का ज़हर सियासत में खुल कर सामने आया।

पढ़े-लिखे लोग खुले में बात विकास की करते हैं और उनके ज़हन में बहुसंख्यकवाद और हिंदुत्व काम कर रहा था। ऐसा नहीं कि अल्पसंख्यकों में फिरकापरस्ती नहीं है, उनमें असुरक्षा की भावना का होना लाजिम है और इसलिए वे तो इससे कभी छूट नहीं सकते - सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन इसे और बढ़ाता है। पर दलितों और पिछड़ी जातियों में तेजी से राजनैतिक चेतना फैलने से घबराए दलत जातियों के लिए मुसलमानों के खिलाफ नफ़रत फैलाकर सत्ता हथियाना आसान तरीका बन कर सामने आया। हिंसा का माहौल और मजहब के आधार पर सामाजिक ध्रुवीकरण का जो फायदा कांग्रेस को 1984 में मिला था, उसे संघ परिवार ने अपनी हिंदुत्ववादी सोच के अनुकूल पाया। क्या मोदी सरकार का अवसान होने पर यह खत्म हो जाएगा? दरअसल पिछले पांच सालों में संघ परिवार उत्तर भारत से आगे बढ़ कर बंगाल, पूर्वोत्तर और दक्षिण में अपना प्रभाव बढ़ाने में सफल हुआ है। यह अपने आप नहीं हुआ है, इसके लिए लगातार झूठ पर झूठ फैलाए गए हैं, काबिल और निष्पक्ष लोगों के बारे में ग़लत सूचनाओं की बाढ़ लाई गई है, नफ़रत और डर का माहौल बनाया गया है, और ऐसा करने में बड़ी तादाद में ऊंची तालीम पाए तथाकथित विद्वान लोग शामिल हैं।

विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से लेकर राज्यों के राज्यपालों तक अपने लोग भर कर संघ परिवार ने मध्य-वर्ग पर शिकंजा टाइट किया हुआ है और देश भर में विद्वज्जन नैतिक रूप से गिरते जा रहे हैं। इंसान में भला बुरा दोनों तरह की शख्सियत की संभावनाएं होती हैं। अक्सर संकट के पलों में या अपने और अपने कुनबे के हित में हम बुराइयों को अपनानें में हिचकिचाते नहीं है। इसके बरक्स हमारा विवेक हमें भला इंसान बनने को धकेलता रहता है। वैज्ञानिकों ने इन प्रवृत्तियों के जैविक स्रोत ढूंढने की कोशिश की है। अपनी प्रजाति को बनाए रखने के लिए कोई भी प्राणी अपने जैसे हर दूसरे प्राणी के हित में काम करेगा, यह सबसे बुनियादी प्रवृत्ति है। इसी से मानव-मूल्यों जैसे गुणों का विकास होता है। पर संसाधनों की कमी और असुरक्षा की वजह से आपसी स्पर्धा और रंजिश भी बढ़ती है। संघ परिवार की राजनीति इसी नफ़रत और इसे बढ़ाने पर आधारित है। आलमी पैमाने पर सियासत में इन दो प्रवृत्तियों के बीच संघर्ष चल रहा है।

क्या हम हर इंसान को एक जैसा मानते हैं या हम कौम, मजहब जैसे संकीर्ण दायरों में इंसान को बाँटना चाहते हैं। हिंदुस्तान में नफ़रत फैलाने वालों के पंजे गहरे गड़ चुके हैं और महज मोदी के जाने से उनको रोक पाना इतना आसान नहीं है। जो विकल्प आज सामने हैं, उनमें निहित स्वार्थों की वजह से यह ताकत नहीं है कि वे संघ परिवार की नफ़रत-फैक्ट्री को रोक सकें। इसके लिए आम लोगों को ही लामबंद होना होगा। देखना यह है कि इस ऐतिहासिक मौके का तरक्कीपसंद ताकतें कैसे इस्तेमाल करती हैं - क्या वे अपने मतभेद भूलकर एकजुट हो सकती हैं; लोगों में तालीम, सेहत, रोजगार जैसे ज़रूरी मुद्दों की ओर चेतना ला सकती हैं या संसदीय सियासत के गोरखधंधे में उलझ कर संघी ज़हर को आगे बढ़ते रहने का मौका देती रहेंगी। देश के ग़रीब, कम पढ़े-लिखे, दलित और तमाम तरह के हाशिए पर खड़े लोग मुंतज़िर हैं कि कहीं से कोई उम्मीद की किरण आएगी।

(ये लेख प्रसिद्ध लेखक हरजिंदर सिंह लाल्टू ने लिखा है।)








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