इंग्लैंड में रह रहे अपने 1लाख “बांग्लादेशियों” के बारे में क्या सोचती है भारत सरकार

मुद्दा , नई दिल्ली, बृहस्पतिवार , 02-08-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। ऐसे समय में जबकि हम बांग्लादेश से आए लोगों को चुन-चुन कर अवैध ठहराने और फिर उन्हें भगाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। तब इस मसले पर खुद अपने से जुड़े किसी मामले में हमारा क्या रवैया रहता है उसको जान लेना बेहद जरूरी होगा। भारत और इंग्लैंड के बीच भी इसी तरह का एक मसला चल रह है। जिसमें इंग्लैंड का कहना है कि 75 हजार से लेकर तकरीबन 1 लाख तक भारतीय इंग्लैंड में अवैध रूप से रह रहे हैं। इसी साल की मई में पीएम नरेंद्र मोदी जब इंग्लैंड की यात्रा पर गए थे तब उन्होंने इससे संबंधित एक समझौते पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। जिसमें अवैध भारतीयों को वापस लाने से जुड़ी तमाम बातें शामिल थीं।

भारत सरकार के अधिकारियों का कहना है कि हस्ताक्षर करने पर अभी फैसला नहीं हो पाया है। उनका कहना है कि भारत की प्रमुख चिंता ये है कि ब्रिटेन मानवतावादी पहलुओं पर विचार किए गए बगैर बड़ी तादाद में भारतीयों को निष्कासित करने की कोशिश कर रहा है। इसके साथ ही किसी हस्ताक्षर से पहले सुरक्षा पहलुओं का भी ध्यान रखा जाना जरूरी है।

इसमें कुछ सिख और कश्मीर के अतिवादी भी हैं जो अलग से अपने लिए देश की मांग कर रहे हैं। ऐसे में इनको लेना भारत की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है।

“दि टेलीग्राफ” की एक रिपोर्ट के मुताबिक बहुत सालों से भारत के साथ अवैध प्रवासियों का मुद्दा उठाने वाले ब्रिटिश अधिकारियों का कहना है कि इनकी तादाद 75 हजार से लेकर 1लाख तक है। इंग्लैंड में रहने वाला ये अकेला सबसे बड़ा समुदाय है।

हालांकि भारतीय एजेंसियां इस आंकड़े से सहमत नहीं हैं उनका कहना है कि ये संख्या महज 2000 है।

इसी साल जनवरी में गृहराज्य मंत्री किरन रिजीजू ने इंग्लैंड के साथ सहमति पत्र पर (एमओयू) हस्ताक्षर किया है जिसमें ब्रिटेन के अधिकारियों द्वारा हिरासत में लेने के 30 दिन के भीतर अवैध प्रवासियों के वापस भेजे जाने का प्रावधान शामिल है।

एमओयू के मुताबिक ब्रिटिश अधिकारी सबसे पहले अवैध भारतीय प्रवासियों को चिन्हित करेंगे फिर उनके बारे में दिल्ली को सूचना देंगे और उसके बाद भारत स्वतंत्र रूप से एक महीने के भीतर उनकी जांच करेगा जिससे लौटने की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाया जा सके।

उसके बाद अगर ब्रिटेन का दावा सही साबित होता है तब लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग अवैध प्रवासियों को इमरजेंसी यात्रा प्रमाणपत्र जारी करेगा जिससे उनकी स्वदेश वापसी को सुनिश्चित किया जा सके।

आधिकारिक आंकड़े के मुताबिक पिछले साल 5000 अवैध भारतीय देश में लौटे थे जिसमें 500 को डिपोर्ट के जरिए भेजा गया था। 

इस मामले से समझा जा सकता है कि भारत सरकार अपने लिए किस तरह की सहूलियत चाहती है और अपने देश में किसी दूसरे मुल्क के नागरिकों के साथ उसका बर्ताव कैसा होता है। अगर सरकार सचमुच में इस समस्या को हल करना चाहती थी तो उसके लिए सबसे पहले उसे बांग्लादेश सरकार से बात करनी चाहिए थी। लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया। अब अगर इन नागरिकों को अवैध घोषित कर दिया गया तो उनके पास अपना कोई देश नहीं होगा। न ही उन्हें बांग्लादेश भेजा जा सकता है और न ही कोई दूसरा उपाय है जिससे उनके नागरिक अधिकारों की रक्षा की जा सके। इसके साथ ही देश की मौजूदा सरकार ने खुद अपने नागरिकों के लिए भी संकट खड़ा कर दिया है। 

बाहर विदेश में रहने वाले प्रवासी एक समय के बाद अपनी नागरिकता का दावा करने लगते हैं। लेकिन यहां जो पिछले 30 से लेकर 40 सालों से रह रहे हैं क्या उनका कोई अधिकार नहीं बनता है? और अगर आप हिंदुओं के साथ सद्भावनापूर्ण तरीके से विचार कर सकते हैं तब मुसलमानों के बारे में क्यों नहीं? और वैसे भी जब तक संसद से हिंदुओं को वैध ठहराने का विधेयक नहीं पारित होता है तब तक बांग्लादेश से आए हिंदुओं को भी उसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ेगा जो मुसलमान कर रहे हैं। और ऊपर से उस विधेयक के जरिये सरकार बांग्लादेश समेत दूसरे देशों के सामने भी असुरक्षा का संकट पैदा कर दे रही है। 


 








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