नेपाल की यात्रा पर गए पीएम मोदी क्या पांच सौ और एक हजार की पुरानी करेंसी भी लेकर लौटेंगे?

देश-दुनिया , , शनिवार , 12-05-2018


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चंद दिनों पहले प्रधानमंत्री पद ग्रहण करने के बाद नेपाल के पीएम केपी शर्मा ओली अपनी पहली विदेश यात्रा पर भारत आये थे और अभी भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नेपाल की यात्रा पर हैं। मुद्दे तो कई हैं, पर इन दोनों यात्राओं के केंद्र में जो एक बड़ा मसला है वो है 8 नवंबर 2016 को भारत सरकार द्वारा बंद किए गए 500 और 1000 के पुराने नोटों को नेपाल सरकार द्वारा बदलने की मांग।

याद ही होगा चुनावी भाषणों में काला धन वापस लाने और देश के सभी लोगों के खाते में 15 लाख देने का बड़ा वायदा कर जब मोदी जी सत्ता के सिंहासन पर विराजमान हुए थे। तो खुद को उन्होंने देश के चौकीदार के रूप में पेश किया था। माननीय मोदी ने अपने एंटायर पॉलिटिकल साइंस की अद्भुत डिग्री का जौहर दिखलाया और देश की अर्थव्यवस्था पर सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए नोटबन्दी का ऐतिहासिक फैसला लिया। जिसमें योग गुरु बाबा रामदेव का योग अर्थशास्त्र, अरुण जेटली का अद्भुत अर्थशास्त्र, परेश रावल का कॉमेडी अर्थशास्त्र, रवीना टण्डन का ग्लैमरस अर्थशास्त्र, खिलाड़ी अक्षय कुमार का एक्शन अर्थशास्त्र, धुरन्धर सलामी बल्लेबाज सहवाग का ट्वीट अर्थशास्त्र, अनुपम खेर का फिल्मी अर्थशास्त्र और तत्कालीन आरबीआई गवर्नर माननीय उर्जित पटेल जी के दिव्य अर्थशास्त्र ने माननीय प्रधानमंत्री का बख़ूबी मार्गदर्शन किया।

इन सभी विद्वान अर्थशस्त्रियों ने देश के चौकीदार का अच्छा साथ निभाया था ज़िसके कारण वैश्विक मंदी के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था को ऊंचाइयों पर ले जाने वाले महान अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह और पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन जैसे लोगों के अर्थव्यवस्था के ज्ञान को आसानी से किनारे लगा दिया गया। 

काले धन को वापस लाने का वादा करके जब प्रधान सेवक ने नोटबन्दी के ऐतिहासिक फैसला को 50 दिन के मोहलत के साथ सुनाया तो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का चौथा स्तम्भ कहलाने वाले माइक्रो चिप विशेषज्ञ मीडिया ने इसे इस रूप में प्रचारित किया जैसे पचास दिन के बाद सबके खाते में पन्द्रह लाख तो आसानी से आ ही जायेंगे। नोटबन्दी के समय लाइन में लगे आम गरीब आदमी के मरने पर ऐसा माहौल बनाया गया कि जैसे वो लोग सरकार के कुप्रबंधन का शिकार न होकर देश के लिये सीमा पर लड़ रहे सैनिकों की तरह शहीद हो रहे हैं। 15 लाख की तो छोड़ ही दें। नोटबन्दी के बाद आरबीआई की साख को समाप्त कर चुके उर्जित पटेल ने तकरीबन एक साल तक कई मशीनों से नोट गिनने के बाद जो आंकड़े दिए थे वो बेहद चौंकाने वाले थे। मैं आपके सामने एक ऐसे ही दिलचस्प आंकड़े को रख रहा हूं।

आरबीआई के अनुसार तक़रीबन 99% से अधिक नोट वापस आ गये जिसकी घोषणा आरबीआई ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर नवम्बर महीने में ही कर दी। 

अर्थशास्त्रियों की मानें तो 1% नोट जलने, फटने, या अन्य कारणों से भी नष्ट हो जाती है। यानी कुल मिलाकर कालाधन नाम की कोई बात ही नहीं थी। अब जबकि नेपाल के प्रधानमंत्री अपनी पहली भारत यात्रा से भी वापस जा चुके हैं और भारतीय प्रधानमंत्री वर्तमान में नेपाल के मन्दिरों में पूजा अर्चना कर रहे हैं, और वार्ता के केंद्र में नेपाल के पास बची भारतीय करेंसी है तो बात संवेदनशील हो जाती है। कयास लगाये जा रहे हैं कि नोटबंदी के बाद नेपाल के पास करीब 9.5 अरब मूल्य के 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट पड़े हुए हैं, जिसे बदलने की बात नेपाल के प्रधानमंत्री ने स्पष्ट रूप से रख दी है। इन नोटों के नहीं बदले जाने की वजह से नेपाल को आर्थिक तौर पर काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

यही कारण है कि भारतीय प्रधानमंत्री को नेपाल दौरे पर कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ख़बरों के अनुसार त्रिभुवन यूनिवर्सिटी नेपाल के छात्रों ने मोदी जी की यात्रा का कड़ा विरोध किया है। मोदी "गो बैक" के नारों से प्रधानसेवक का स्वागत किया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि उनकी इस यात्रा की सबसे बड़ी वजह ही यही है कि वे अपने यहां जमा भारतीय मुद्रा को बदल सकें ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आरबीआई को यह बताना चाहिए कि नेपाल के पास उपलब्ध नोट बाकी के 1% नोट से कम हैं या ज्यादा?

विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो भारत में नोटबंदी के बाद आरबीआई के पास अब लगभग पूरी रकम वापस आ चुकी है। रकम की गिनती भी हो चुकी है और नकली नोट भी पहचान कर हटा दिए गए हैं आरबीआई के पास अब ऐसा कोई पैसा नहीं बचा है जो वापस आना था। यानी 500 और हज़ार के जितने नोट छपे थे सभी बैंकों में वापस आ गए हैं। फिर ये साढ़े 9 अरब रुपये कहां से आए?

अगर मोदी सरकार नेपाल से अपने पुराने नोट वापस लेती है तो सवाल फिर से खड़ा हो जाएगा कि ये पैसे कहां से आया। नेपाल सरकार आधिकारिक रूप से जाली नोट लेकर तो यकीनन नहीं आये होगी। नतीजे एकदम स्पष्ट और चौंकाने वाले हैं, सरकार ने सत्ता की मदद से अपने और सहयोगी पूंजीपति मित्रों के जाली नोट को भी सफेद करने का कारनामा कर चुकी है। 

कुल मिलाकर हिचकोलें खा रही अर्थव्यबस्था का एक बड़ा सच नोटबन्दी के निर्णय के नीचे दफ़न है और अपनी विश्वसनीयता और साख खो चुका आरबीआई इस सच को सामने लाने का साहस जुटा पायेगा ऐसा लग तो नहीं रहा है।

(लेखक दयानंद शिक्षाविद होने के साथ राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक हैं।)








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