मोदी का किसानों के लिए समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी का चुनावी चारा

पड़ताल , जयपुर, बृहस्पतिवार , 05-07-2018


msp-modi-farmer-election-insurance-paddy

मदन कोथुनियां

अक्सर भारत की राजनीतिक पार्टियां जनता को मूर्ख व याददाश्त के मामले में कमजोर समझती हैं, इसलिए सत्ता में आते ही 4 साल तक जमकर लूटती हैं व चुनावी साल में कुछ राहत देने का दिखावा करती हैं। वो समझती हैं कि अगर पहले साल से जनता को कुछ राहत दे दी तो चुनावों तक वो भूल जाएगी। अगर वोट लेना है तो चार साल जमकर नोट कमाओ और चुनावी साल में कुछ देने का नाटक करो और जो नोट चार साल में लूटे हैं, उसके बूते चुनाव जीत लिया जाए। 

साल 2014 के चुनावों में गांवों में रहने वाली 65% आबादी, जो प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सिर्फ खेती पर निर्भर है, से श्रीमान नरेन्द्र मोदी ने वादा किया था कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट सत्ता में आते ही लागू कर दी जाएगी, लेकिन सत्ता में आते ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करना सम्भव नहीं है। 

कल A2+FL की कीमत के आधार पर समर्थन मूल्य में कुछ बढ़ोतरी करके इस तरह प्रचारित किया जा रहा है कि किसानों को लागत का डेढ़ गुना सरकार ने देना शुरू कर दिया, जबकि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में C2+50% मुनाफा देने की बात की गई है। संक्षेप में A2+FL व C2+50% का फर्क जान लीजिए।

 A2 का मतलब है कि actual paid out cost अर्थात खाद, बीज, दवाइयां, उपयोग की गई मशीनों का भाड़ा-किराया आदि। FL मतलब family labour अर्थात परिवार का मेहनताना। इस प्रकार A2+FL कीमत तय होती है। जब इसी कीमत में खेत का किराया या मशीनों का किराया व उनका ब्याज जोड़ दिया जाता है तो उसे C2 कीमत माना जाता है। माना किसी किसान ने लोन पर पांच लाख का ट्रैक्टर लिया है और खेती में काम लिया जा रहा है तो उसका ब्याज भी इसमें जोड़ा जाता है। देश भर में अलग-अलग जगह अलग-अलग दर है इसलिए एक अनुमानित कीमत तय की जाती है।

सबसे बड़ी बात यह है कि दोनों तरह की कीमतों में किसान परिवार के सदस्यों को कुशल श्रमिक मानकर उसकी मजदूरी जोड़ने का कोई प्रावधान नहीं है। मतलब किसान अकुशल श्रमिक है और घर में पानी की फिटिंग करने वाला कुशल श्रमिक है और उसके श्रम की कीमत डेढ़ गुना से दो गुना तक ज्यादा है, इसलिए C2 कीमत भी अंतिम व व्यवहारिक नहीं है लेकिन किसान बदतर हालात में है इसलिए कुछ बेहतर मिल जाये उसके लिए प्रयासरत है।

अब वापस आते हैं मोदी जी और उनकी सरकार पर। मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में 2016 में 7000 करोड़ रुपये, 2017में 9000 करोड़ रुपये व 2018 में 13000 करोड़ रुपये बजट दिया और इतना ही राज्य सरकारों ने दिया है। मतलब सरकार की तरफ से तीन साल में कुल 58 हजार करोड़ रुपये दिए गए। किसानों के खातों से जो हफ्ता वसूली हुई है वो इसकी 30% है। मतलब 19000 करोड़ रुपये से ज्यादा। कुल मिलाकर 77000 करोड़ रुपये बीमा कंपनियों को दे दिए गए। बीमा कंपनियों से फसल क्षति होने वाले कुल किसानों में से 20% किसानों को मुआवजा मिला है, जिसके 10-20 रुपये चेक और चेक बाउंस चर्चा का विषय रहे हैं!

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना खरीफ 2017 की अंतरिम रिपोर्ट के अनुसार दूसरे वर्ष भी बीमा कंपनियों द्वारा किसानों को लूटने का काम जारी है। खरीफ 2017 में देश के 3.74 करोड़ किसानों से 3027 करोड़ रुपये बीमा हप्ता, केंद्र सरकार द्वारा 9000 करोड़ रुपये और राज्य सरकार द्वारा 9000 करोड़ रुपये मिलाकर कुल 21027 करोड़ रुपये फसल बीमा कंपनियों को प्राप्त हुए। कंपनियों के द्वारा 8724 करोड़ रुपयों के दावे अनुमोदित किये गये हैं लेकिन जून 2018 तक केवल 4276 करोड़ रुपये ही किसानों को भुगतान किये गये हैं, तो कुल मिलाकर प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना चहेती बीमा कंपनियों पर टैक्स का व किसानों का धन लुटाने का जरिया मात्र रह गई है।

मोदी सरकार की किसान हितैषी दूसरी बड़ी जिस योजना का ढिंढोरा पीटा गया वो है "स्वायल हेल्थ कार्ड"। करोड़ों रुपये फूंकने के बाद किसानों को क्या फायदा हुआ वो आप सब जानते हैं और खुद मोदी सरकार ने उस पर चर्चा करना भी छोड़ दिया है। दूसरी तरफ कृषि मशीनरी/उपकरणों पर 18% GST ठोक दिया गया। डीजल की बढ़ी दरों का भार भी किसानों पर पड़ा है।

एक तरफ किसानों की जरूरतों जैसे कपड़ा, बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा आदि में बेतहाशा महंगाई की मार पड़ी और किसान पिछले चार साल में और बर्बाद होते गए तो दूसरी तरफ किसानों की फसलों की उचित कीमत मिलने के बजाय सब्जियां सड़कों पर फेंकी गईं, जिन फसलों का समर्थन मूल्य तय नहीं था उसे औने-पौने दामों पर किसान बेचने को मजबूर था और जिन फसलों का समर्थन मूल्य तय था उस पर भी सरकार ने खरीद नहीं की और किसान मंडियों में धक्के खाता रहा। 

इसका परिणाम यह हुआ कि मोदी सरकार के तमाम हवाई दावों के बीच किसान आत्महत्या में 42% तक की वृद्धि हुई! अगर वास्तव में किसानों के लिए कुछ किया गया होता तो किसान इस तरह जिंदगी से बेवफाई नहीं करते।

यह चुनावी साल है और मोदी सरकार मूर्खता के विज्ञापनों के साथ आपके बीच आ रही है। तय आपको करना है कि क्या किया जाए? स्वागत या कुछ और? हजारों करोड़ बैंकों से लेकर दोस्त विदेशों में भाग गए। किसानों को देने के लिए इनके पास पैसे नहीं हैं, लेकिन परसों अर्थात 7 जुलाई 2018 को प्रधानमंत्री मोदी की जयपुर में सभा है। भीड़ जुटानी है, इवेंट मैनजमेंट करना है, भाड़े के लोगों को लाकर मोदी-मोदी करवाना है तो पैसे तो खर्च होंगे ही, लेकिन पार्टी फण्ड से नहीं, आपके व मेरे द्वारा विकास के लिए जमा करवाये गए टैक्स से। 7 करोड़ 22 लाख रुपये सिर्फ बसों से भीड़ जुटाने के लिए सरकारी खजाने से दिए जा रहे हैं, ताकि मरते किसान को भूलकर आप जयपुर में प्रधानमंत्री की सभा में पैदा होते विकास का दीदार कर सकें।

(मदन कोथुनियां स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।)








Tagmsp modi farmer election paddy

Leave your comment