इंदिरा के आपातकाल के वारिस बनते नरेंद्र मोदी

विश्लेषण , , शनिवार , 12-05-2018


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दीपांकर शिवमूर्ति

2014 आम चुनाव में भारी बहुमत के बाद उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में तीन चैथाई बहुमत से बीजेपी का चुनाव जीतना इस बात का संकेत है कि मोदी की लोकप्रियता पूरे देश में है। पूर्वोत्तर के इसाई और आदिवासी बहुल राज्यों में एनडीए को मिला अभूतपूर्व जनसमर्थन मोदी को ऐसे राजनेता के तौर पर स्थापित कर देता है जिसकी स्वीकार्यता धर्म, जाति, क्षेत्र, समुदाय, भाषा जैसी हदों का अतिक्रमण करती है। इतिहासकार रामचंद्र गुहा की दृष्टि में मोदी नेहरू और इन्दिरा गांधी के बाद अब तक के तीसरे सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं। लेकिन क्या बीजेपी की राजनीतिक सफलता में सिर्फ मोदी की लोकप्रियता काम कर रही है या अन्य कारण भी है?

मोदी ने 2014 में जो ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा दिया था, उसका कुल लब्बोलुआब यह है कि 22 राज्यों में बीजेपी-एनडीए की सरकारें बन चुकी हैं। अपने शिखर पर कांग्रेस 18 सूबों में शासन करती थी। चुनावी राज्य कर्नाटक को लेकर कांग्रेस पार्टी की सरकार सिर्फ तीन राज्यों पंजाब, मिजोरम और पांडिचेरी में ही शेष है। फिर इसमें आश्चर्य कैसा कि अपने वजूद के संकट से जूझती तमाम विपक्षी पार्टियां आज एकजुट हो रही हैं!

आज बीजेपी भले ही उन तमाम विपक्षी पार्टियों को मोदी की लोकप्रियता से भयभीत और अवसरवादी की संज्ञा दे रही हो, मगर 1977 के आम चुनावों में इन्दिरा गांधी का मुकाबला करने के लिए तत्कालीन जनसंघ (आज की बीजेपी) ने विपक्ष से मिलकर महागठबंधन बनाया था। 1952 में बनी जनसंघ को तब पहली बार राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता और सत्ता का स्वाद मिला था। और अभी भी बीजेपी-एनडीए में 40 से अधिक छोटी बड़ी पार्टियां हैं।

1985 में कांग्रेस के बाद 2014 में लगभग तीस साल बाद बीजेपी स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर सकी। इस दरम्यान गठबंधन सरकारें बनती रहीं, जिसमे क्षेत्रीय दलों का खासा दबदबा और दखल रहा। कुछ सरकारों के कार्यकाल पूरा करने के बावजूद सरकार की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर रही। अक्सर प्रधानमंत्री के लिए क्षेत्रीय दलों और नेताओ की मांगों और दबावों को नजरअंदाज करना मुश्किल था।

हर सत्तासीन व्यक्ति अपने पूर्ववर्तियों के अनुभव से कुछ सबक लेता है। मगर मोदी तो इन्दिरा गांधी से कुछ ज्यादा ही प्रभावित मालूम पड़ते हैं। और यह असर संगठन, सरकार, स्टाइल, कम्यूनिकेशन हर स्तर पर नुमायां है। मसलन, महत्वपूर्ण मसलों पर चुनिन्दा लोगों से मशविरा और हाई कमान कल्चर। इसमे जनप्रतिनिधियों, मंत्रियों और राज्यों के मुख्यमंत्रियों पर केंद्रीकृत नियंत्रण, सर्वशक्तिमान पीएमओ, नौकरशाही पर नियंत्रण और संवैधानिक पदों पर अपने वफादार व्यक्तियों को बैठना शामिल है।

2014 के आम चुनावों में उछाला गया मोदी का नारा ‘अच्छे दिन आएंगे’, 1971 में दिये गए इन्दिरा गांधी के नारे ‘गरीबी हटाओ’ से मिलता जुलता है। दोनों ही नारों का मनोविज्ञान आम जनता को बेहतर भविष्य का सब्जबाग दिखाते हैं।

इन्दिरा के भाषणों मसलन, ‘मै कहती हूं गरीबी हटाओ, वो कहते हैं इन्दिरा हटाओ’ की तरह मोदी भी अपनी ‘चाय बेचने वाली’ पृष्ठभूमि को बेतरह भुनाते हैं। अक्सर दोनों ही नेता लोगों को भावुक करते हुए खुद को जनपक्षधर, सच्चा और विपक्ष को दृष्टिविहीन, अवसरवादी, भ्रष्ट और जनता के बरक्स खड़ा कर देते हैं।

अभी हाल के गुजरात विधानसभा चुनावों में मोदी ने अपने पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह पर उन्हें चुनाव में हराने के लिए पाकिस्तान से सांठगांठ का आरोप लगा दिया था। इन्दिरा गांधी ने भी 1975 में जननायक जेपी के ‘सम्पूर्ण क्रांति’ आंदोलन को सीआईए और पूंजीपतियों द्वारा प्रायोजित बताया था और देश में एमरजेंसी लगा दिया था। 

‘कमिटेड’ ज्यूडीशरी और ब्यूरोक्रेसी, पत्रकारों और सम्पादकीय पर नियंत्रण की जो राह इंदिरा गांधी ने दिखाई थी, मोदी भी उसी मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं। जस्टिस केएम जोसेफ को कोलेजियम की सिफारिश के बाद भी सुप्रीम कोर्ट का जज सिर्फ इसलिए नही बनाया जा रहा क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर उत्तराखंड में केंद्र के राष्ट्रपति शासन लागू करने के फैसले को पलट दिया था।

इन्दिरा गांधी के समय संस्थाओं में दखल का ऐसा कोई मॉडल नही था। नेहरू और शास्त्री उच्च नैतिक मूल्यों का पालन करने वाले, संवैधानिक और लोकतान्त्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता सुनिश्चित करने वाले राष्ट्राध्यक्ष थे। इसका एक कारण उनका स्वाधीनता आंदोलन में लंबे समय तक संघर्ष और महात्मा गांधी का मार्गदर्शन भी था।

मोदी योजनाबद्ध और सूक्ष्म तरीकों से लोकतान्त्रिक और संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर कर रहे हैं। इसके लिए उन्हे एमरजेंसी घोषित करने की भी जरूरत नही है, लोकसभा में बीजेपी का बहुमत ही पर्याप्त है। सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर जजों की अभूतपूर्व प्रेस कान्फ्रेंस, महत्वपूर्ण बिलों को मनी बिल के तौर पर लोकसभा में पारित करवाना, संसद की उपेक्षा और विपक्ष की घटती सहभागिता इस बात का प्रमाण है। हालांकि चार जजों ने सरकार को सीधे तौर पर निशाने पर नही लिया, फिर भी परोक्ष रूप में यह अवधारणा विकसित हुई कि मुख्य न्यायाधीश निर्णयों अथवा बेंचों के गठन में सरकार या सरकार के निकटवर्तियों को लाभ पहुंचा रहे हैं।

इस पोस्ट-ट्रुथ इरा में मोदी बेहद कुशल प्रचार तंत्र और ‘अवधारणा’ के मनोविज्ञान का बेहतरीन इस्तेमाल कर रहे हैं। बीजेपी को चुनाव दर चुनाव जीतने के आलोक में एकदलीय प्रणाली के खतरों से भी रूबरू हुआ जा सकता है जिसमे हिंदुस्तान के ‘हिंदूवादी पाकिस्तान’ बनने का खतरा भी शामिल है। हालांकि, इन्दिरा गांधी के हिस्से में प्रिवीपर्स समाप्त करने, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, 1971 का युद्ध जीतना और सिक्किम का भारत में विलय जैसी उपलब्धियां हैं, जिसके समानान्तर शायद नोटबंदी, जीएसटी और सर्जिकल स्ट्राइक को नहीं रखा जा सकता।

                                 (दीपांकर शिवमूर्ति इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र हैं।)




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Gytari :: - 05-15-2018
Ye kehna puri trh galat hai ki modi ki lokpriyata ke karan ESA much ho raha hai. Aaj desh me bar varg bjp ko napasnd karta hai. Phir bjp election par election kese jeet rahi hai. Is par chintan honan jaruri hai. Bjp ne savedahnik sanstaho par RSS ke follower ko Baitha kar desh ko highjack kar kiya hai. Phir chahe election commsion ke decision ho ya court ke judgement ki timing. Media to pujivadiyo ke jeb me hai. Asal me modi kuch nahi hai modi ke peeche kaam karne bale pujipati or RSS milkar isko anjaam Dr rahi hai. Bjp ke pujipati to pehle se hi govt ke adhikariyo ko pasand nahi large they kyoki ek 30000-100000 rs kamane bala govt officer in pujipatiyo ko line me khada karva sakta tha or ye bat carorepatiyo ko akharti thi. Kai karno me ye bhi ek karan hai ki bjp or pujipati ka gatjod jayda mature hua. Vese bhi jab se bjp baniyo ki party kahi jati hai. Kulmilakar bjp ka chunav par chunav jitna yeh darsata hai ki bhut fullproof planing se bjp evm set lar chuki hai or is evm loot me hindhuvaadi adhikari Jo sashan me bithe Huey hai pure pure RSS ke plan me sath hai.in karno se inkar nahi kiya ja sakta hai. Madhya Pradesh me election commsion officer ptrkar ko police ki dhamki deti hai kyoki evm me bjp ke paksh me vote apne aap kar rahi hai. Or Madhya Pradesh me hi rajyapal anadiben bjp karkarto ko bta rahi hai ki vote kese Lena hai. Court bjp ke paksh me sanrkshk bn kar khada hua hai.desh ko saaf saaf dhikai se raha hai kya ESA kaam bjp ne kar diya ki usko janta vote kar rahi hai. Or bjp election par election jeet rahi hai. Bjp ke neta Jo confidence se munch se byan dete hai ki me 17 ko cm ki shpat luga, humare itni seat aaygi, ye isliye bolte hai kyoki inke evm setter inko report se dete hai. Or ESA desh me ESA nahi abhi se chl raha hoga ye sadyantra jab se evm lunch hui tabhi se chl raha ho sakta hai. Iska sabse BDA karan ye hai ki is desh ke mutthi bhar 2-5% log Jo satta sansadhano par kabja Kare Huey hai unko is bat ka pta hoga ki yadi humne kuch jugat nahi lagai to is desh ke majority population jin Apr hum sadiyo se soshan, atyachar , gareebe dete aaye hai ab shikisht hokar samjhne LGA hai ,is bahushkyak varg ko ab Dharm ke naam par jayda dino tak bargala nahi sakte isliye evm scam ki suruat hui. Kuch businessman bhi is bat ko samajh liye isliye is desh se carore rupya lekar baag kahde Huey. Aaj desh ka loktantra bhari khtre me hai. Or jinke karan khtre me pada hai bo Ku Isko bachayga . isliye is desh ke sabhi dal Jo loktantra ke preamble me viswas karte hai in sabhi ko is desh ko sabse pehle evm hatva kar saans chlne tak sangrash karne ke liye taiyaar rehna hoga.nahi to ab is desh me khuni kranti ho sakta hai. Loktantra ko bachane ke liye khud ko bhi daav par lagana hoga.

Rai sahab yadav :: - 05-15-2018
Political analysis is very nice

raghvendra kannaoujiya :: - 05-12-2018
dam hai

Ashutosh Mohan :: - 05-12-2018
बहुत शानदार विश्लेषण