तिरंगे को अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ता था संघ

एक नज़र इधर भी , , शुक्रवार , 17-08-2018


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दयानन्द

(राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस तिरंगे को कभी भी अपना राष्ट्रीय ध्वज नहीं मान पाया। यहां तक कि एक वाकये को छोड़कर 2002 तक नागपुर स्थित उसके मुख्यालय पर कभी राष्ट्रीय झंडा नहीं फहरा। बाद में कोर्ट के आदेश के बाद उसे तिरंगा फहराना पड़ा। आखिर क्या वजह है इस विरोध का और आरएसएस तिरंगे की जगह किस झंडे को चाहता है। राजनीतिक विश्लेषक और शिक्षाविद दयानंद ने अपने इस लेख में उसका विस्तार से वर्णन किया है। पेश है पूरा लेख-संपादक) 

1. कांग्रेस ने दिसम्बर 1929 में अपने लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज’ का लक्ष्य अपनाया और लोगों से 26 जनवरी, 1930 स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने और तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में फहराने का आह्वान किया। इस समय तक तिरंगे को सर्वसम्मति से राष्ट्रीय आंदोलन का ध्वज माना जाता था जिसके प्रत्युत्तर में आरएसएस के सरसंघचालक हेडगेवार ने अपनी सभी शाखाओं को भगवा ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में पूजा करने के लिए परिपत्र जारी किया था।

2. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फ़ौज ने भी एक तिरंगे झण्डे को ही अपने ध्वज के रूप में इस्तेमाल किया था। जिसमें चरखे की जगह बीच में उछलते बाघ का चिन्ह था।

3. 14 जुलाई, 1947 को संविधान सभा की झंडा समिति ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस्तेमाल किए गए तिरंगे को उपयुक्त संशोधनों के साथ भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाए जाने की सिफारिश की। सभी दलों को स्वीकार्य बनाने के लिए कांग्रेस ध्वज के चरखे को अशोक स्तम्भ के चक्र द्वारा बदल दिया गया। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अनुसार, चक्र इसलिए चुना गया था, क्योंकि यह धर्म और कानून का प्रतिनिधि है।

4. 17 जुलाई 1947 को आरएसएस ने अपने अंग्रेजी मुखपत्र ऑर्गनाइजर के तीसरे संस्करण में, राष्ट्रीय ध्वज’ शीर्षक से एक संपादकीय लिखा, और मांग की कि भगवा ध्वज को स्वतंत्र भारत के ध्वज के लिए चुना जाए। यही मांग स्वतंत्रता की पूर्व संध्या तक उसके संपादकीय लेखों में कई बार दोहराई गयी। 

5. जुलाई 31 को ‘हिन्दुस्थान’ शीर्षक से छापे एक संपादकीय में भारत के लिए एक भगवा ध्वज के साथ हिंदुओं के नाम पर देश का नाम रखने की भी मांग हुई।

6. 14 अगस्त के एक “किधर जाऊं” शीर्षक वाले संपादकीय में सम्मिश्रण वाले राष्ट्र की पूरी अवधारणा को अस्वीकार कर दिया गया।

7. 14 अगस्त के अंक में "भगवा ध्वज के पीछे रहस्य" नाम का लेख लिखा गया था, जिसमें खुलकर तिरंगे का अपमान किया गया था। तिरंगे को अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ता था संघ इसमें कहा गया था कि-

"जो लोग किस्मत के दांव से सत्ता में आ गए हैं हमारे हाथ में तिरंगा दे सकते हैं, लेकिन इसको हिंदुओं द्वारा कभी अपनाया नहीं जाएगा और न ही इसका कभी हिंदुओं द्वारा सम्मान होगा। तीन शब्द अपने आप में अशुभ है, और तीन रंगों वाले एक झंडे का निश्चित रूप से एक बहुत बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ेगा और यह देश के लिए हानिकारक है।"

8. गोलवलकर ने 14 जुलाई, 1946 को नागपुर में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि भगवा ध्वज ही महान संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता था । यह भगवान का दूसरा रूप है।

हमें दृढ़ विश्वास है कि अंत में पूरे देश को पहले इस भगवा ध्वज के सामने झुकना होगा।

9. गांधी की अंतिम यात्रा के बाद 24 फरवरी 1948 को एक भाषण में, पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि

“कुछ स्थानों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज का अपमान किया गया । वे अच्छी तरह से जानते हैं कि झंडा को नीचा दिखाकर वे खुद को गद्दार साबित कर रहे हैं।”

10. महात्मा गांधी की हत्या के बाद सरदार पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया था। संघ के नेताओं के काफी गिड़गिड़ाने पर 11 जुलाई 1949 को आरएसएस पर प्रतिबंध हटा दिया गया था। इसके बाद आरएसएस अपने मुख्यालय में पहली बार 26 जनवरी 1950 को तिरंगा फहराया। उसी वर्ष 15 दिसंबर को सरदार पटेल का निधन हुआ, और फिर आरएसएस ने 2002 तक कभी अपने मुख्यालय में तिरंगा झंडा नहीं फहराया। पीएन चोपड़ा और प्रभा चोपड़ा के संपादन में प्रकाशित कलेक्टेड वर्क्स ऑफ सरदार पटेल(खंड- XIII) में सरदार पटेल का इस मसले पर विचार अंकित है।

11. 26 जनवरी 2001, राष्ट्रप्रेमी युवा दल के तीन कार्यकर्ताओं – इसके अध्यक्ष बाबा मेंढे, रमेश कलंबे और दिलीप चट्टानी को जबरन आरएसएस कार्यालय में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए नागपुर में गिरफ्तार किया गया। उस समय सबसे पहले, आरएसएस परिसर के प्रभारी सुनील काठले ने कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोकने की कोशिश की। लेकिन, जब वे तिरंगा फहराने में सफल रहे, आरएसएस उन्हें अदालत में घसीट लाया।

12. नागपुर अदालत में बंबई पुलिस अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की प्रासंगिक धाराओं के तहत इन देशभक्त युवकों पर केस चला। कानूनी लड़ाई जारी रही और उन्हें अंततः 2013 में आरआर लोहिया की अदालत ने आरोपों के सबूत की कमी के लिए बरी कर दिया। 

13. 2001 की घटना के बाद 2002 के गणतंत्र दिवस पर, 52 वर्षों में पहली बार, आरएसएस ने अपने मुख्यालय में झंडा फहराने का फैसला किया।

14. आरएसएस द्वारा वर्णित और चित्रित की जाने वाली भारत माता के हाथों में कभी भी तिरंगा ध्वज नहीं रहा बल्कि वे भगवा ध्वज लिए दिखती हैं। प्रारंभ से ही आरएसएस का भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रतीकों, जैसे राष्ट्रीय ध्वज और संविधान, से दूरी बनाए रखने का इतिहास रहा है।

15. देश की आजादी के बाद सावरकर ने कहा था कि- 'हिंदुत्व किसी भी सूरत में इस अखिल भारतीय भगवा ध्वज के अलावा किसी अन्य झंडे के सामने अपना सिर नहीं झुका सकता।"


                             (दयानंद राजनीतिक विश्लेषक और शिक्षाविद हैं।) 








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