कौन नहीं है नेहरू का गुनाहगार?

जयंती पर विशेष , , मंगलवार , 14-11-2017


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अनिल जैन

''पं. जवाहरलाल नेहरू जिस स्वतंत्रता के सेनानी और संरक्षक थे, आज वह स्वतंत्रता संकटापन्न है। सम्पूर्ण शक्ति के साथ हमें उसकी रक्षा करनी होगी। जिस राष्ट्रीय एकता और अखंडता के वे उन्नायक थे, आज वह भी विपदग्रस्त है। हर मूल्य चुका कर हमें उसे कायम रखना होगा। जिस भारतीय लोकतंत्र की उन्होंने स्थापना की, उसे सफल बनाया, आज उसके भविष्य के प्रति भी आशंकाएं प्रकट की जा रही हैं। हमें अपनी एकता से, अनुशासन से, आत्म-विश्वास से इस लोकतंत्र को सफल करके दिखाना है। नेता चला गया, अनुयायी रह गए। सूर्य अस्त हो गया, तारों की छाया में हमें अपना मार्ग ढूँढना है। यह एक महान परीक्षा का काल है। संसद में उनका अभाव कभी नहीं भरेगा। शायद तीन मूर्ति को उन जैसा व्यक्ति कभी भी अपने अस्तित्व से सार्थक नहीं करेगा। वह व्यक्तित्व, वह ज़िंदादिली, विरोधी को भी साथ ले कर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद निकट भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी। मतभेद होते हुए भी उनके महान आदर्शों के प्रति, उनकी प्रामाणिकता के प्रति, उनकी देशभक्ति के प्रति, और उनके अटूट साहस के प्रति हमारे हृदय में आदर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।''

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बारे में उपरोक्त उद्गार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हैं जो उन्होंने नेहरू के निधन पर संसद में व्यक्त किए थे। नेहरू की मौत के तीन दशक बाद वाजपेयी को भी देश का नेतृत्व करने का अवसर मिला और आज भी उन्हीं की पार्टी सत्ता पर काबिज है, जिसका नेहरू के बारे में नजरिया अपने पितृपुरुष से बिल्कुल भिन्न तो है ही, साथ ही बेहद विकृत भी।

सरकार और सत्ताधारी दल के स्तर पर इन दिनों नेहरू के व्यक्तित्व और कृतित्व को तरह-तरह से लांछित और अपमानित करने का अभियान जोरशोर से चल रहा है। इस सिलसिले में सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नेहरू के अनन्यतम सहयोगी को उनके बरअक्स खड़ा करने की फूहड़ कोशिशें भी मनगढ़ंत किस्सों के जरिये हो रही हैं। ऐसी कोशिशें तब और तेज हो जाती हैं जब देश में कहीं चुनाव हो रहा होता है। जाहिर है इन सारी कवायदों का मकसद अपनी विरोधी पार्टी कांग्रेस को नीचा दिखाना होता है। प्रतिक्रियास्वरूप कांग्रेस भी ऐसी कोशिशों पर स्वाभाविक रूप से बिफर पड़ती है। उसकी शिकायत होती है कि भाजपा सरकार आधुनिक भारत के निर्माण में नेहरू के योगदान को और उनकी शानदार विरासत को योजनाबद्ध तरीके से नकारने का क्षुद्रतापूर्ण प्रयास कर रही है। यह शिकायत करते वक्त कांग्रेस और खासतौर पर उसके शीर्ष नेतृत्व की ओर से यह संदिग्ध दावा भी किया जाता है कि समाजवादी आर्थिक नीतियां और धर्मनिरपेक्षता कांग्रेस की मूल सोच रही है जो उसे देश के पहले प्रधानमंत्री से विरासत में मिली है। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि नेहरू को अपने जीवनकाल में तो जनता से बेशुमार प्यार और सम्मान मिला लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उनकी लगातार अनदेखी होती गई और उनकी प्रतिष्ठा में कमी आई। कहा जा सकता है कि ऐसा कांग्रेस विरोधी राजनीतिक पार्टियों की ताकत बढ़ने के कारण हुआ लेकिन हकीकत यह भी है कि खुद कांग्रेस भी उनकी मृत्यु के बाद उनसे लगातार दूर होती चली गई। केंद्र और राज्य की कांग्रेस सरकारों ने बड़ी-बड़ी सरकारी परियोजनाओं को तो नेहरू का नाम जरूर दिया लेकिन व्यवहार में वे उनकी वैचारिक विरासत को ठेंगा दिखाती रहीं।, फिर वह मामला चाहे आर्थिक नीतियों का हो, धर्मनिरपेक्षता का हो या फिर लोकतांत्रिक संस्थाओं के सम्मान का। दरअसल, अब कांग्रेस के नेता जिस नेहरूवादी समाजवाद का जब-तब पुण्य स्मरण करते रहते हैं, उसकी मौत का तराना नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी ने ही रच दिया था, जिसे न सिर्फ उनके शासनकाल में बल्कि बाद में उनके बेटे राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्वकाल में भी जोर-शोर से गुनगुनाया गया। 

नेहरू असंदिग्ध रूप से लोकतंत्रवादी थे और असहमति का भी सम्मान करते थे लेकिन इसके ठीक उलट इंदिरा गांधी ने राजनीति में बहस और संवाद को हमेशा संदेह की नजरों से देखा। उनकी इस प्रवृत्ति की चरम परिणति 1975 में जेपी आंदोलन के दमन और आपातकाल लागू कर अपने तमाम विरोधियों को जेल में बंद करने के रूप में सामने आई। कुल मिलाकर उन्होंने अपने पिता की वैचारिक विरासत को आगे बढ़ाने या उसे गहराई देने के बजाय उसे सुनियोजित तरीके से नुकसान ही पहुंचाया। नेहरू के प्रशंसक रहे एक अमेरिकी पत्रकार एएम रॉसेनथल ने आपातकाल के दौरान 1976 में भारत का दौरा करने के बाद सामाजिक असमानता और धार्मिक आधारों पर बंटे भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना में नेहरू के साहसी और संघर्षशील योगदान को रेखांकित करते हुए लिखा था कि अगर इस दौर में नेहरू जिंदा होते तो उनका जेल में होना तय था, जहां से वे अपनी प्रधानमंत्री को नागरिक आजादी, लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थानों के महत्व पर पत्र लिखते।

नेहरू की राजनीतिक विरासत के क्षरण का जो सिलसिला इंदिरा गांधी के दौर में शुरू हुआ वह उनके बाद उनके बेटे राजीव गांधी के दौर में भी न सिर्फ जारी रहा बल्कि और तेज हुआ, खासकर धर्मनिरपेक्षता के मोर्चे पर। उन्होंने नेहरू की धर्मनिरपेक्षता से दूर जाते हुए पहले तो बहुचर्चित शाहबानो मामले में मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेकते हुए संसद में अपने विशाल बहुमत के दम पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। उनके इस कदम से हिन्दू कट्टरपंथियों के हौसले भी बुलंद हुए और उन्हें लगा कि इस सरकार को भीड़तंत्र के बल पर आसानी से झुकाया-दबाया जा सकता है, सो उन्होंने भी इतिहास की परतों में दबे अयोध्या के राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद विवाद को झाड़-पोछकर एक व्यापक अभियान छेड़ दिया। राजीव गांधी और उनके नौसिखिए सलाहकारों ने हिन्दू कट्टरपंथियों को संतुष्ट करने और उसे मुस्लिम सांप्रदायिकता के बरअक्स संतुलित करने के लिए अयोध्या में विवादित धर्मस्थल का ताला खोल दिया। बाद में 6 दिसंबर, 1992 को हुआ बाबरी मस्जिद का आपराधिक ध्वंस राजीव गांधी की इसी गलती की तार्किक परिणति थी।

कुल मिलाकर दोनों किस्म की सांप्रदायिकताओं के समक्ष बारी-बारी से समर्पण करने के दुष्परिणाम देश ने न सिर्फ तात्कालिक तौर पर भुगते, बल्कि उस समय सांप्रदायिक नफरत की जो आग लगी थी उसकी तपिश देश आज भी महसूस कर है। वैसे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को कमजोर करने के लिए अकेले राजीव गांधी को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हकीकत तो यह है कि देश की आजादी के बाद आधुनिक राष्ट्रीयता के विकास के लिए धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करने के जितने भी प्रयास किए गए, वे सबके सब नाकारा साबित हुए हैं। तमाम सत्ताधीशों ने हमेशा धर्मनिरपेक्षता को 'सर्वधर्म समभाव' का नाम देकर रूढ़िवाद और अंधविश्वास फैलाने वाले धार्मिक नेतृत्व को पनपाने का काम किया और धर्मनिरपेक्षता के वास्तविक स्वरूप को लोगों के सामने रखने का कभी साहस नहीं किया। धर्मनिरपेक्षता या कि सर्वधर्म समभाव के बहाने सभी धार्मिक समूहों के पाखंडों का राजनीतिक स्वार्थ के लिए पोषण किया गया और सुधारवादी आंदोलन निरुत्साहित किए गए। चूंकि आजादी के बाद देश में केंद्र और राज्यों के स्तर पर सर्वाधिक समय कांग्रेस का ही शासन रहा इसलिए उसे ही इस पाप का सबसे बड़ा भागीदार माना जाना चाहिए।

जहां तक आर्थिक नीतियों का सवाल है, इस मोर्चे पर भी नेहरू के रास्ते से हटने या उनके सोच को चुनौती देने का काम कांग्रेसी सत्ताधीशों ने ही किया और देश की लगभग सभी राजनीतिक धाराओं ने परोक्ष-अपरोक्ष रूप से इसमें सहयोग किया। वैसे नेहरू के रास्ते से विचलन की आंशिक तौर पर शुरुआत तो इंदिरा और राजीव के दौर में ही शुरू हो गई थी लेकिन 1991 में पीवी नरसिंहराव की अगुवाई में बनी कांग्रेस सरकार ने तो एक झटके में नेहरू के समाजवादी रास्ते को छोड़कर देश की अर्थव्यवस्था को बाजार के हवाले कर उसे विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) की मुखापेक्षी बना दिया। उदारीकरण के नाम शुरू की गई इन नीतियों के रचनाकार थे डॉ. मनमोहन सिंह, जिन्हें बाद में सोनिया गांधी ने ही एक बार नहीं, दो बार प्रधानमंत्री बनाया। सिर्फ प्रधानमंत्री ही नहीं बनाया बल्कि नेहरू के आर्थिक विचारों को शीर्षासन कराने वाली उनकी नीतियों के समर्थन में भी वे चट्टान की तरह खड़ी रहीं। 

नई आर्थिक नीतियों के आगमन के सिलसिले में सबसे पहले इंदिरा गांधी ने 80 के दशक में दोबारा सत्ता में आने के बाद आईएमएफ से भारी-भरकम कर्ज लेकर भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से जोड़ा। उसके बाद राजीव गांधी ने भी इस सूत्र को मजबूत किया। फिर आई समाजवादी मंत्रियों से भरी विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार, जिसके योजना आयोग में गांधीवादी, समाजवादी, मार्क्सवादी बुद्धिजीवी सितारों की तरह टंके हुए थे। लेकिन इन लोगों ने भी थोड़ी-बहुत वैचारिक बेचैनी दिखाने के बाद विश्व बैंक के अर्थशास्त्रियों द्वारा तैयार उस ढांचागत सुधार कार्यक्रम के आगे अपने हथियार डाल दिए, जिसे हम नई आर्थिक नीति के रूप में जानते हैं।

उस दौर में एक समय समाजवादी रहे चंद्रशेखर इसलिए विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के आलोचक बने हुए थे कि वह औद्योगिक क्षेत्र में विदेशी पूंजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए दरवाजे खोल रही है। लेकिन जैसे ही कांग्रेस के समर्थन से वे खुद प्रधानमंत्री बने, वैसे ही उन्होंने अपना पहला कार्यक्रम आईएमएफ के प्रबंध निदेशक से मुलाकात का बनाया। वैश्विक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के प्रति अनुराग दिखाने में भाजपा भी पीछे नहीं रही। 1991 में जब पीवी नरसिंहराव की सरकार ने आईएमएफ के निर्देश पर व्यापक स्तर पर सुधार कार्यक्रम लागू करते हुए वैश्विक पूंजी निवेश के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था के दरवाजे पूरी तरह खोल दिए और कोटा-परमिट प्रणाली खत्म कर दी तो तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी की प्रतिक्रिया थी कि कांग्रेस ने हमारे जनसंघ के समय के आर्थिक दर्शन को चुरा लिया है।

इतना ही नहीं, 1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी तो 'स्वदेशी' के लिए कुलबुलाते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषंगिक संगठन स्वदेशी जागरण मंच को वाजपेयी और आडवाणी ने साफ कह दिया कि 'स्वदेशी' सुनने में तो अच्छा लगता है लेकिन मौजूदा दौर में यह व्यवहारिक नहीं है। वाजपेयी ने तो एक मौके पर स्वदेशी के पैरोकार संघ नेतृत्व से सवाल भी किया था- 'और सब तो ठीक है लेकिन हिन्दू इकोनॉमिक्स में पूंजी की व्यवस्था कैसे होगी?' यही नहीं, संघ के बढ़ते दबाव को उतार फेंकने के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने की धमकी भी दे डाली थी। कुल मिलाकर आर्थिक नीतियों के मामले में नेहरू के रास्ते को अलविदा कहने में देश की लगभग सभी राजनीतिक जमातों में आम सहमति रही और कांग्रेस ने इस पाप-कर्म की अगुवाई की। इसलिए अब चुनाव में शर्मनाक शिकस्त खाने और अपनी पार्टी के सत्ता से बेदखल होने के बाद सोनिया गांधी का यह रुदन बेमतलब है कि मौजूदा माहौल में नेहरूवादी मूल्यों को कुछ लोगों से चुनौती मिल रही है।

दरअसल, नेहरू के साथ उनके मरणोपरांत वही हुआ, जो नेहरू और उनकी कांग्रेस ने महात्मा गांधी के साथ किया था। जिस तरह आजादी के बाद सत्ता की बागडोर संभालते ही नेहरू ने गांधी की स्वावलंबन और हिन्द स्वराज संबंधी सारी सीखों को दकियानूसी करार देते हुए खारिज कर दिया था, उसी तरह नेहरू की मृत्यु के बाद उनके वारिसों ने भी नेहरू के मिश्रित अर्थव्यवस्था के रास्ते को छोड़ दिया। नेहरू को अपने पूरे जीवनकाल में कांग्रेस के बाहर तो नहीं, लेकिन कांग्रेस के भीतर भरपूर सम्मान मिला लेकिन आज हालत यह है कि सिर्फ चाटुकारिता और वंश-विशेष की पूजा में ही अपना करियर तलाशते लोगों को छोड़कर शायद ही कोई उनके समर्थन में खड़ा मिलेगा। उनके विचारों को समझने की इच्छा रखने वालों की तादाद भी नगण्य ही होगी। 1991 में राजीव गांधी की मौत के बाद माना जाने लगा था कि अब देश की राजनीति में नेहरू-गांधी परिवार का प्रभाव खत्म हो जाएगा और भारत के पहले प्रधानमंत्री के विचारों का बेहतर आकलन हो सकेगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि उस समय तक आर्थिक नीतियों संबंधी नेहरू के विचार अपनी प्रासंगिकता खो चुके थे लेकिन उनकी विरासत के कई दूसरे प्रासंगिक हिस्सों को मजबूत किया जा सकता था, मसलन विधायिका और संसदीय प्रक्रियाओं को लेकर उनकी प्रतिबद्धता सार्वजनिक संस्थानों को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाने की उनकी कोशिशें, धर्मनिरपेक्षता, धार्मिक बहुलता और लैंगिक समानता जैसे विचारों को लेकर उनकी चिंता तथा वैज्ञानिक शिक्षा और अनुसंधान को प्रोत्साहन देने वाले केंद्रों की स्थापना पर जोर। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो सका। वस्तुतः नेहरू कभी उस बोझ से मुक्त नहीं हो पाए, जो उनके अपने ही वंशजों की देन थी।

नेहरू की निष्पक्ष समीक्षा होना अभी बाकी

सोनिया गांधी ने 1998 में तमाम कांग्रेसियों के अनुनय-विनय पर कांग्रेस की बागडोर संभाली थी। तब से लेकर अब तक 16 वर्षों से वे पार्टी अध्यक्ष बनी हुई हैं। उम्मीदों के मुताबिक उनके बेटे राहुल को उनका राजनीतिक वारिस बनाया जा चुका है। फिलहाल वे ही अनौपचारिक तौर पर पार्टी के सर्वेसवाã हैं। कांग्रेस ने पिछला आमचुनाव उनकी अगुवाई में ही लड़ा था जिसमें उसे ऐतिहासिक पराजय हाथ लगी। कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी उसे हार का सामना करना पडा है। इससे राहुल की नेतृत्व क्षमता पर भी दबे स्वरों में सवाल भी उठ रहे हैं। लेकिन ऐसे सवाल उठाने वाले अभी भी नेहरू -गांधी परिवार के बाहर झांकने को तैयार नहीं हैं। राहुल के विकल्प के तौर पर उनकी निगाहें प्रियंका पर ही ठहरती हैं। मशहूर समाजशास्त्री आंद्रे बेते के शब्दों में 'मरणोपरांत नेहरू की स्थिति बाइबिल की उस मशहूर उक्ति के ठीक विपरीत दिशा में जाती दिखी जिसके मुताबिक पिता के पापों की सजा उसकी आगामी सात पीढ़ियों को भुगतनी होती है।'

दरअसल, नेहरू के मामले में उनकी बेटी, नवासों, नवासों की पत्नियों और पर-नवासों के कर्मों ने उनके कंधों का बोझ ही बढ़ाया है। संभवतः नेहरू को अपने जीवनकाल में मिली अतिशय चापलूसी का ही नतीजा है कि मरणोपरांत उन्हें पूरी तरह खारिज किया जाने लगा। दुर्भाग्य से यह प्रवृत्ति सार्वजनिक जीवन, राजनीतिक विमर्शों और खासकर साइबर संसार में तेजी से फैली है। लगता नहीं कि जब तक सोनिया गांधी और राहुल गांधी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहेंगे, तब तक नेहरू के जीवन और उनकी राजनीतिक विरासत को लेकर कोई वस्तुनिष्ठ, न्यायपूर्ण और विश्वसनीय धारणा बनाई जा सकेगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और नई दुनिया समेत कई समाचार पत्रों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)






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