संघ मुक्त नहीं, संघम् शरणम् गच्छामि

राजनीति , , बृहस्पतिवार , 27-07-2017


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गिरीश मालवीय

राजा भर्तहरि राजपाट छोड़ कर संन्यासी हो गए। उन्होंने नीति शतक, वैराग्य शतक और श्रृंगार शतक नामक तीन महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे, जो आज भी जीवन, राजनीति और सिद्धांतों का सटीक वर्णन करते हैं। अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ नीति शतक में उन्होंने लिखा कि,  ‘‘ सत्याऽनृता च पुरुषा प्रियवादिनी च, हिंस्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या। नित्यव्यया प्रचुरनित्यधनागमा च, वाराङ्गनेव नृपनीतिरनेक रूपा।’’ - (नीतिशतक, 46) इस श्लोक का शाब्दिक अर्थ यह है कि, ‘‘कभी सच तो कभी झूठ बोलने वाली, कभी कठोर तो कभी मीठा बोलने वाली, कभी हिंसक तो कभी दयालु होने वाली, कभी धनलोलुप तो कभी उदार, कभी खर्चीली तो कभी सम्पत्ति जमा करने वाली-इस प्रकार की राजनीति-वारांगना जैसी अनेक रूप धारण करती है।’’

बिहार का एंटायर पोलिटिकल साइंस

भर्तहरि ने नीति शतक में यह किस संदर्भ में लिखा ये तो पता नहीं लेकिन कम से कम आज बिहार की राजनीति की यही सच्चाई है। कभी-कभी तो लगने लगता है कि बिहार में वाकई एंटायर पोलिटिकल साइंस का विषय पढ़ाया जाता है और नीतीश कुमार उसी विषय में पीएचडी किये हुए हैं, कोई मूर्ख ही यह कह सकता है कि नीतीश लालू यादव क्या हैं यह नहीं जानते थे, और नीतीश क्या हैं यह लालू यादव नहीं जानते थे। यह तो राम मिलाई जोड़ी थी। आज से लगभग दो साल पहले नीतीश कुमार ने ट्वीट किया था ‘‘ जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग, चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग।’’ इस ट्वीट को भाजपा ने मुद्दा बनाया था और कहा था कि नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद पर निशाना साधा है। इस पर उस वक्त लालू प्रसाद खामोश थे, बाद में बोले कि नीतीश कुमार ही सफाई दे सकते हैं, हो सकता है उन्होंने भाजपा पर टिप्पणी की हो। बाद में नीतीश ने साफ किया कि उनका इशारा भाजपा की तरफ था। आज भुजंग बदल गया है या चंदन बदल गया है। ये किस तरह के लोग हैं जो डीएनए की खराबी को बड़ी आसानी से भूल जाते हैं, शायद राजनीतिज्ञों का ही डीएनए खराब है। नीतीश को क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, यह सवाल अब भले ही प्रासंगिक लग रहा हो लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इस सवाल का कोई मतलब नहीं है।

नीतीश कुमार की ऐतिहासिक भूल

नीतीश कुमार एक ऐतिहासिक भूल कर गुजरे हैं। विपक्ष जिससे महागठबंधन की नींव बनने की उम्मीद करे बैठा था वह कंगूरे का पत्थर बन जाने को लालायित बैठा है। नीतीश के इस तरह गोदी में बैठ जाने से 2019 के महागठबंधन की उम्मीदों को तगड़ा झटका लगा है। यह मामला सिर्फ बिहार का नहीं है, 2015 का बिहार चुनाव का जनमत बीजेपी के विरुद्ध था, लेकिन आज वह नीतीश कुमार के साथ सरकार में शामिल हो गई। गोवा में जनमत भाजपा सरकार के विरुद्ध था लेकिन वहां भी आज भाजपा सत्ता में है। ऐसा ही उत्तरपूर्व के कुछ राज्यों में हुआ है। भाजपा येन केन प्रकारेण हर राज्य में सत्ता में आना चाहती है जहां वह चुनाव हार गयी हो, वैसे इसे सिर्फ भाजपा की सफलता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह वास्तव में महागठबंधन की संभावनाओं पर कुठाराघात है, 2019 के लिए फिर से विपक्ष को नयी शुरुआत करनी होगी।






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