अफवाह साबित हुई करोड़ों घुसपैठियों के होने की बात, दहाई का भी आंकड़ा पार करना मुश्किल

त्रासदी , , बुधवार , 01-08-2018


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मुकेश असीम

964 में श्रीमान नेहरू के वक्त आसाम में 35 विदेशी नागरिक अदालतें कायम की गईं थीं जिनका काम ही विदेशियों को पहचानना और बाहर भेजना था। ये अदालतें तब से लगातार काम कर रही हैं। अगर मान भी लें कि कांग्रेस ने इस काम को ईमानदारी से नहीं किया लेकिन विदेशी घुसपैठियों के खिलाफ आंदोलन से ही सत्ता में आने वाली असम गण परिषद और बीजेपी सरकारों के वक्त भी इन अदालतों को किसी साल भी 150 से ज्यादा विदेशी नहीं मिले।

यह विदेशी घुसपैठियों की बड़ी तादाद के दावों के झूठ-सच की पूरी पोल खोल देता है कि कैसे पहले कांग्रेस, फिर असम गण परिषद और फिर संघ/बीजेपी ने इस झूठे मामले को खड़ा कर लगातार प्रचार के जरिये इसे आम लोगों के जेहन में सच की तरह बिठा दिया और चुनावी फायदे के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया, कांग्रेस ने अल्पसंख्यक बंगालियों को डराकर और संरक्षक बनकर, शेष दोनों ने उन्हें निकालने का दावा कर। 

अब एनआरसी के लिए असम के निवासियों को कहा गया कि वे खुद को 1951 के पंजीकृत नागरिकों का वंशज सिद्ध करने के दस्तावेज़ दें - असम में छोड़िए देश के किसी भी राज्य में खुद को 1951 के किसी व्यक्ति का वंशज सिद्ध करने के कागजाती सबूत मांगें जाएं तो कितने लोग दे पाएंगे जबकि उसमें नाम-पते की वर्तनी में एक हिज्जे के गलत होने पर भी दस्तावेज़ नामंज़ूर किए जा रहे हैं। वोटर कार्ड से लेकर स्कूली रिकॉर्ड में ही गरीब-अशिक्षित लोगों के कैसे नाम-पते रहते हैं, हम सब जानते हैं।

नतीजा, बंगाली भाषा-भाषी गरीब मेहनतकश लोग, हिंदू-मुस्लिम दोनों, बड़े पैमाने पर 'गैरकानूनी घुसपैठिए' घोषित कर दिये जा रहे हैं। हालांकि बीजेपी भी जानती है कि किसी को भी बांग्लादेश भेजना मुमकिन न होगा पर इसके जरिये उसने 2019 के चुनाव में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए एक बड़ा मुद्दा तैयार कर लिया है।

दुनिया भर में मजदूरों को 'गैरकानूनी' घोषित करने के पीछे एक और स्वार्थ भी काम करता है, उन्हें पहले पुलिस का भय दिखा कर संरक्षण देने के नाम पर सस्ती दरों पर मजदूरी भी कराई जाती है। सस्ती दरों पर उनसे मजदूरी कराने वाले अक्सर 'घुसपैठियों' के खिलाफ मुहिम में खुद भी शामिल रहते हैं या ऐसी मुहिम को वित्तीय मदद करते पाये जाते हैं क्योंकि इनका मुनाफे का सीधा स्वार्थ इससे जुड़ा होता है।

ढोंग का एक और पक्ष - 'घुसपैठियों' के खिलाफ सबसे अधिक शोर मचाने वाले तबके में वे लोग मिलेंगे जो खुद 5 साल रहने के बाद अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, आदि में स्थायी निवास/नागरिकता/ग्रीन कार्ड की पात्रता की मांग करते पाये जाते हैं। लेकिन यहां 50 साल से रहने वालों को गैरकानूनी बताते हैं! जब ट्रम्प/मे की सरकारें इन्हें वहां स्थायी निवास देने से मना करती हैं तो खुद मोदी/सुषमा उनके लिए इन देशों की सरकारों से वार्ता करते हैं।

करोड़ों बांग्लादेशियों की बात झूठ निकली!

कांग्रेस मेहनतकश जनता में आपसी वैमनस्य फैलाने के वास्ते इतने किस्म के जहरीले बीज बो कर गई है, इतनी जगह नीचे-नीचे आग सुलगाई हुई है कि संघियों को ज्यादा दिमाग लगाने की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती। बस जहां बीज दबे पड़े हैं वहां थोड़ा खाद-पानी, जहां आग सुलग रही है वहां तेज धोंकनी फूंको, और बस काम बन गया।

बीजेपी को तो असल में अचंभा यही हो रहा है कि कांग्रेस सरकार तो 2009 में ही असम के 41 लाख मतदाताओं को गैर-नागरिक बता रही थी, जिसे संघ ने देश भर में प्रचार का एक बड़ा मुद्दा बनाया था, पर अब बीजेपी सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद मतदाता-गैर मतदाता मिलाकर कुल मात्र 40 लाख ही निकले, जिनमें से भी करीब 15 लाख को तो पुराने कांग्रेसी और अब संघी बने हेमंत बिस्वा शर्मा खुद भारतीय नागरिक मान रहे हैं, कह रहे हैं कि ममता की बंगाल सरकार द्वारा दस्तावेजों की जांच-पड़ताल में मदद न करने से ये इस सूची में शामिल नहीं किए जा सके। बचे 25 लाख में से भी बहुत से जांच-पड़ताल के बाद मान लिए जाएंगे। सबसे गरीब, बेसहारा, अशिक्षित दस्तावेज़ रहित 15-20 लाख लोग ही आखिर विदेशी नागरिक करार दिये जाएंगे।

सच तो यही है कि करोड़ों बांग्लादेशियों के उत्तर-पूर्व भारत में घुस आने की झूठी बात फैलाकर कांग्रेस लंबे वक्त से सांप्रदायिक वैमनस्य की आग सुलगा रही थी जिसका पूरा फायदा संघ ने अपने फासिस्ट मंसूबों के लिए उठाया।

(मुकेश असीम आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक मामलों की गहरी समझ रखते हैं। और आजकल मुंबई में रहते हैं।)








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