चुनाव को बुनियादी मुद्दों से भटकाने की पीएम मोदी की कोशिश

मुद्दा , , मंगलवार , 19-03-2019


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विशद कुमार

एक तरफ जहां राहुल गांधी का 'चौकीदार चोर है' में मोदी शासन काल के पांच सालों की असफलता का कोई लेखा-जोखा नजर नहीं आता, पांच सालों में उत्पन्न देश की समस्याओं की कोई मौलिक समस्या नहीं नजर आती, वहीं 'चौकीदार चोर है' के जवाब में मोदी द्वारा 'मैं हूं चौकीदार' के कैंपेन में उनके पांच सालों के विकास का कोई मॉडल नहीं दिखता है। यह बातें इस चीज को चीख-चीख कर पूछ रही हैं कि सत्ता हथियाने के खेल में आखिर 'जनता की, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन' की लोकतांत्रिक प्रणाली कहां गुम हो गई है?

इसमें सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सत्ता हथियाने के इस खेल में जनता को मूर्ख बनाने के सारे हथकंडे उसी तरह जायज हैं जिस तरह 'जंग और मुहब्बत में सब जायज होता है'?

यह तो तय है कि 2014 में सत्ता पर कब्जा जमाने के बाद इन पांच सालों के विकास की कोई ठोस तस्वीर मोदी के पास नहीं है। जिसे मोदी इस चुनाव में आधार बना कर पेश कर सकें। जबकि विपक्ष के पास इसकी काली तस्वीरें जरूर हैं, जिसे वह मुद्दा भी बना सकता है। लेकिन फिर भी वह कई गैरजरूरी संवादों में उलझकर रह गया है।

कहना ना होगा कि मोदी ने बड़ी चतुराई से विपक्ष को इन वाहियात संवादों के मकड़जालों में उलझा कर रख दिया है।

अगर हम बेरोजगारी की बात करें तो एक रिपोर्ट के अनुसार 2017 में जहां देश में 1 करोड़ 83 लाख लोग बेरोजगार थे, साल 2018 में इनकी संख्या बढ़कर 1 करोड़ 86 लाख हो गई। अगर श्रम ब्यूरो की रिपोर्ट देखी जाए तो आंकड़ों के अनुसार भारत दुनिया के सबसे ज्यादा बेरोजगारों का देश बन गया है। रिपोर्ट के अनुसार भारत की 11 फीसदी आबादी यानी लगभग 12 करोड़ लोग बेराजगार हैं।

साल 2015 में सिर्फ 1 लाख 35 हजार लोगों को ही नौकरी मिली है। रिपोर्ट के अनुसार हर रोज 550 नौकरियां खत्म हो रही हैं। श्रम रोजगार की रिपोर्ट कहती है कि स्वरोजगार के मौके घटे हैं, और नौकरियां कम हुई हैं।

युवाओं के लिए आज रोजगार पाना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक बयान में कहा था कि 'बेरोजगारी से अच्छा है युवा मजदूरी करके पकौड़े बेचें'। मोदी के इस बयान के बाद देखते ही देखते पकौड़ा रोजगार का मजाक पूरे देश में उड़ने लगा।

देश में बढ़ती बेरोजगारी को लेकर जो आंकड़े हैं वे युवाओं के लिए एक बड़ी चिंता का विषय हैं।

कहा जाता है कि पढ़े-लिखे लोगों को एक अच्छी नौकरी मिल जाएगी। लेकिन आंकड़ों के मुताबिक बेरोजगारों में पढ़े-लिखे युवाओं की तादाद ही सबसे ज्यादा है। जिसमें 25 फीसदी 20 से 24 आयु वर्ग के हैं, जबकि 25 से 29 वर्ष की उम्र वाले युवकों की तादाद 17 फीसदी है। 20 साल से ज्यादा उम्र के 14.30 करोड़ युवाओं को नौकरी की तलाश है।

दूसरी तरफ हम देश में गरीबी, भुखमरी की बात करें तो वर्ष 2018 में जारी ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार भारत 119 देशों की सूची में 103 वां स्थान पर है,  जबकि 2017 में 100 वें स्थान पर था।

बता दें कि 2014 में केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली भाजपा सरकार बनने के बाद भारत की रैंकिंग में लगातार गिरावट दर्ज की गयी है। साल 2014 में भारत जहां 55वें पायदान पर था, वहीं 2015 में 80 वें, 2016 में 97 वें, 2017 में 100 वें और 2018 में 3 पायदान और गिरकर 103 पर आ गया। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में दुनिया के तमाम देशों में खानपान की स्थिति का विस्तृत विवरण होता है। जैसे लोगों को किस तरह का खाद्य पदार्थ मिल रहा है, उसकी गुणवत्ता और मात्रा कितनी है और उसमें कमियां क्या हैं। 

वैश्विक खाद्य सुरक्षा सूचकांक की रिपोर्ट कहती है कि भारत की 68.5 फीसद आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है। भारत में खाद्यान वितरण प्रणाली में सुधार और मोदी सरकार के जनकल्याण के दावों के बावजूद भारत में भूख से मरने वालों की संख्या घटने की बजाए और तेजी से बढ़ रही है।

 संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुपोषित लोगों की संख्या 19.07 करोड़ है। यह आंकड़ा दुनिया में सर्वाधिक है। देश में 15 से 49 वर्ष की 51.4 फीसदी महिलाओं में खून की कमी है। पांच वर्ष से कम उम्र के 38.4 फीसदी बच्चे अपनी आयु के मुताबिक कम लंबाई के हैं। इक्कीस फीसदी का वजन अत्यधिक कम है। भोजन की कमी से हुई बीमारियों से देश में सालाना तीन हजार बच्चे दम तोड़ देते हैं।

-देश में 30.7 प्रतिशत बच्चे (5 साल से कम उम्र के) अंडरवेट हैं।

-भारत में 58 प्रतिशत बच्चों का ग्रोथ 2 साल से कम उम्र में रुक जाती है।

-देश में 4 में से हर 1 बच्चा कुपोषण का शिकार है।

-3,000 बच्चे देश में कुपोषण से पैदा होने वाली बीमारियों के कारण रोज मरते हैं।

-दुनियाभर में 5 साल से कम उम्र में मरने वाले बच्चों में भारत का हिस्सा 24 प्रतिशत है।

-30 प्रतिशत नवजात शिशुओं की मौत भारत में होती है।

क्या ये भी मुद्दे विपक्ष के पास नहीं हैं, या विपक्ष इन मुद्दों से अनजान है? या विपक्ष भी गोदी मीडिया के ही आंकड़ों से प्रभावित है?

राहुल गांधी के 'चौकीदार चोर है' के जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर अपना नाम बदल दिया। उन्होंने- 'मैं भी चौकीदार हूं' कैंपेन के तहत अपने ट्विटर हैंडल का नाम बदलकर चौकीदार नरेंद्र मोदी कर लिया है। मोदी ने वीडियो के साथ जारी अपने ट्वीट में कहा, "आपका यह चौकीदार राष्ट्र की सेवा में मजबूती से खड़ा है, लेकिन मैं अकेला नहीं हूं। हर कोई जो भ्रष्टाचार, गंदगी, सामाजिक बुराइयों से लड़ रहा है, वह एक चौकीदार है। हर कोई जो भारत की प्रगति के लिये कठिन परिश्रम कर रहा है, वह एक चौकीदार है। आज हर भारतीय कह रहा है कि मैं भी चौकीदार।"

कहना ना होगा कि प्रधानमंत्री के ट्वीट में ही कई सवाल छिपे हुए हैं। भ्रष्टाचार, गंदगी, सामाजिक बुराइयां, प्रगति व परिश्रम जैसे शब्दों में सारे सवाल हैं, जिसका जवाब मोदी के पास नहीं हो सकते।

फिर क्या कारण है कि मोदी के इस 'मैं भी चौकीदार हूं' के कैंपेन में विपक्ष उलझकर रह गया है?

विपक्ष से तो बेहतर किरदार जेएनयू से लापता छात्र नजीब अहमद की मां का है जिन्होंने प्रधानमंत्री की इस नई मुहिम पर यह कहकर सबसे तीखा प्रहार किया है कि  "अगर आप चौकीदार हैं तो मेरा बेटा कहां है?"

उन्होंने "एबीवीपी के आरोपी गिरफ़्तार क्यों नहीं किये जा रहे हैं? मेरे बेटे की तलाश में देश की तीन टॉप एजेंसियां विफल क्यों रहीं”। का सवाल पूछकर मोदी के गुब्बारे में सबसे कारगर पिन चुभो दी है।

(रांची से पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

 








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