जमीनी मुद्दों को दरकिनार कर भावनात्मक मुद्दों के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की जुगत में भाजपा

राजनीति , , सोमवार , 11-03-2019


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चरण सिंह राजपूत

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है। सभी दल अपने अपने हिसाब से चुनावी समर में उतर चुके हैं। हर चुनाव की तरह ही इन चुनाव में भी भावनात्मक मुद्दों के सहारे जमीनी मुद्दों को दबाने का खेल शुरू हो चुका है। पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद बालाकोट में आतंकी शिविरों पर सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भाजपा ने इसे भुनाना शुरू कर दिया है। भाजपा ने राष्ट्रवाद का कार्ड आगे बढ़ा दिया है। सर्जिकल स्ट्राइक को भुनाने के लिए हर हथकंडा अपनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी के साथ पार्टी अध्यक्ष अमित शाह अपनी हर सभा में सेना के पराक्रम को अपने पराक्रम के रूप में पेश कर रहे हैं। मैं देश को झुकने नहीं दूंगा। मिटने नहीं दूंगा- जैसी भाषा प्रधानमंत्री की आम हो गई है। भाजपा मोदी को ऐसे प्रस्तुत कर रही है जैसे कि इनसे पहले के सभी प्रधानमंत्री नकारे थे। इनसे पहले सेना ने जैसे कुछ किया ही नहीं। जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान को नेस्तनाबूत कर दिया हो।

मोदी सरकार की विफलता पर पर्दा डालने को लिए देश में अंध राष्ट्रवाद फैलाया जा रहा है। स्थिति यह है कि यदि कोई सरकार के खिलाफ बोल रहा है तो वह सेना और देश के खिलाफ बोल रहा है। उसे मोदी समर्थक देशद्रोही ठहरा दे रहे हैं। मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर भी सरकार की तानाशाही देखने को मिल रही है। मोदी सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों पर तरह तरह के आरोप लगाये जा रहे हैं। फेसबुक पर सरकार के खिलाफ लिखने वाले लोगों के अकाउंट लॉक कर दिये जा रहे हैं। बस भारत माता की जय बाल दो और बन जाए देशभक्त। फिर भले ही आप देश विरोधी कार्यों में लिप्त हों। हां यदि देश और समाज के प्रति समर्पित रहने वाले किसी व्यक्ति ने मोदी सरकार की आलोचना कर दी तो समझो वह नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति है। उसे आतंकवादी, नक्सली पता नहीं कैसी कैसे उपाधि दे दी जा रही है। 

मीडिया मोदी के भावनात्मक एजेंडे को लागू करने में पूरी तरह से लगा हुआ है। स्थिति इतनी गंभीर है कि गत दिनों वायुसेना अध्यक्ष ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर मीडिया पर युद्धोन्माद फैलाने से बाज आने के लिए कहना पड़ा। इतना ही नहीं पाक के कब्जे से वापस अपने देश पहुंचे विंग कमांडर अभिनंदन के साहस से जुड़े पोस्टर जगह जगह लगाकर भाजपा उनको भी भुनाने से बाज नहीं आ रही है। इस पर चुनाव आयोग को आगे आकर हस्तक्षेप करना पड़ा। भाजपा का प्रयास है कि पाकिस्तान के नाम पर भारत के मुसलमानों के खिलाफ नफरत का माहौल बनाकर हिन्दू वोटबैंक को किसी तरह से एकजुट कर लिया जाए। 

ऐसा भी नहीं है कि विपक्ष की पार्टियां कोई जमीनी मुद्दों लेकर चुनाव लड़ने जा रही हैं। विपक्ष भी किसी तरह से भावनात्मक मु्द्दों के सहारे सत्ता में पहुंचने की रणनीति बनाने में लगा है। सपा, बसपा और रालोद ने जातिगत आधार पर गठबंधन बनाया है। उन्हें लगता है कि बसपा की वजह से दलित, सपा की वजह से यादव और रालोद की वजह से उन्हें जाट वोट मिल जाएंगे। ये लोग भाजपा की वजह से मुस्लिमों का उन्हें वोट देना उनकी मजबूरी मानकर चल रहे हैं। ऐसे ही कांग्रेस ने देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे कर युवा कार्ड चला है। बिहार में तेजस्वी यादव यादव और मुस्लिमों के वोटों के बल पर चुनावी समर पार करने की फिराक में हैं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी का एजेंडा दिल्ली को पूर्ण राज्य दिलवाने का है। लगभग सभी दल भावनात्मक मुद्दों के सहारे चुनाव जीतने की जुगत में हैं।

यह राजनीतिक दलों का नैतिक पतन ही है कि हर चुनाव की तरह की तरह इन चुनाव में भी बेरोजगारी, महंगाई, भुखमरी कानून व्यवस्था, विकास और किसान, मजदूर और युवाओं की बदहाली जैसे मुद्दे गायब होते जा रहे हैं।

क्षेत्रीय दलों की राजनीति की गाड़ी जातिगत और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे पर आगे बढ़ी है। भाजपा और कांग्रेस जैसे कट्टर हिंदुत्व और सॉफ्ट हिंदुत्व पर अपनी चुनावी बिसात बिछा रहे हैं। मतदाताओं की भावनाओं का दोहन कर वोटों की फसल काटने के सियासी खेल अपने रंग में आ रहा है। खेती-किसान और नौजवानों का सवाल लगभग सभी दलों के राजनीतिक नाभिकीय केंद्र से दूर हो रहा है। भले ही किसान, जवान और नौजवान के लिए कुछ न करें पर भावनात्मक रूप से उन्हें रिझाने की कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जा रही है। 

मोदी सरकार के खिलाफ भले ही किसी राजनीतिक दल ने कोई बड़ा आंदालन न किया हो पर किसानों की बदहाली को लेकर अलग-अलग राज्यों में किसान संगठनों ने बड़े बड़े आंदोलन किये। जिसका फायदा कांग्रेस मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में उठा चुकी है। चार साल तक छाए रहे जमीनी मुद्दे चुनाव से ठीक पहले नेपथ्य में जाते दिखाई दे रहे हैं। भाजपा ने बड़ी चालाकी से राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद जनभावनाओं का ज्वार बना दिया है।

भाजपा का प्रयास है कि सवर्ण आरक्षण, तीन तलाक, किसानों को सीधे नकदी मदद और विशेष रूप से सर्जिकल और एयर स्ट्राइक को लोकसभा चु्नाव में पूरी तरह से भुनाया जाये। विपक्ष राफेल विमान सौदा, बढ़ती बेरोजगारी, किसानों की बदहाली, असहिष्णुता, मॉब लिंचिंग, नोटबंदी के कारण परेशानी, जीएसटी से आई समस्याएं, सीबीआई जैसी संस्थाओं में दखल जैसे मुद्दों पर जोर तो दे रहा है पर वह भी किसी प्रभावी भावनात्मक मुद्दे की तलाश में है।

दरअसल, पुलवामा में सीआरपीएफ काफिले पर हुए आतंकी हमले के बाद आम चुनाव से ठीक पहले भाजपा के शातिराना रणनीति ने कई मुद्दों को फिलहाल निष्प्रभावी बना दिया है। यही वजह है कि भापजा ने इस मुद्दे पर अपनी जान झोंक दी है। हालांकि विपक्ष इस ऑपरेशन से जुड़े कुछ सवाल उठाकर सरकार को घेरने का लगातार प्रयास कर रहा है।

इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि कृषि प्रधान देश में हर सरकार और राजनीतिक पार्टी किसान हितैषी होने का दावा करती है। एक रिपोर्ट बताती है कि गत 17 साल में किसानों ने 45,000 करोड़ों का नुकसान झेला है। लगातार घाटे के कारण किसान खेती छोड़ रहे हैं। कर्ज के बोझ से होने वाली किसानों की आत्महत्या करने की घटनाएं रूकने का नाम नहीं ले रही हैं। दो दशक में तीन लाख किसानों ने जान दी हैं। यह हाल तब है जब 2008 में मनमोहन सरकार ने किसानों की कर्जमाफी योजना लागू की थी और अब भाजपा सरकार ने फसल की लागत का डेढ़ गुना कीमत देने का दावा किया। 6 हजार नकदी की घोषणा की और अब सम्मान निधि योजना से किसानों के खाते में सीधे राशि जानी शुरू हो गई है। 

देश में बेरोजगारी का बहुत बड़ा मुद्दा है, जिसे भाजपा दिखावे के राष्ट्रवाद में दबाने में लगी है। इस बार 543 में 282 सीटें ऐसी हैं, जहां पहली बार वोट डालने वाले मतदाताओं की औसत संख्या करीब डेढ़ लाख है। पिछले लोकसभा चुनाव में 297 सीटों पर जीत का अंतर इससे कम ही था। ऐसे में सभी दल युवाओं पर डोरे डाल रहे हैं, वह बात दूसरी है कि कोई भी दल युवाओं की परेशानी को गंभीरता से समझने को तैयार नहीं। आंकड़े बताते हैं कि 2005 से 2015 तक जरूरत 12 करोड़ रोजगार की थी, लेकिन डेढ़ करोड़ ही नौकरियां मिलीं। इन परिस्थितियों में खोखले राष्ट्रवाद पर यदि जनता भटकती है तो इसे भी देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।


 








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Jeengar DS Gahlot :: - 03-11-2019
अब कौन-से "अटैक" व "स्ट्राइक" की योजना में जुटे हुए हैं - पीएम मोदी ... ? जो चीख-चीख कर कहते सुनाई दे रहे हैं - "मैं देश को झुकने नहीं दूंगा - मिटने नहीं दूंगा - चुन-चुनकर बदला लेंगे ..." आदि-आदि ... तो, इनका "मोदी-मीडिया" भी चीख-चीख कर यह कहता सुनाई दे रहा है - "मोदी है तो मुमकिन है ..." ... और, यही "मीडिया" पूरी तैयारी के साथ सेना के वर्तमान व पूर्व अफसरों को अपने-अपने चैनलों पर पेश कर - "बालाकोट एयर स्ट्राइक" के सबूतों को प्रदर्शित करता सुनाई भी दे रहा है ... जबकि, यही पीएम मोदी - मोदी-मीडिया - मोदी-भक्त - क्यों हैं "खामोश" - काला धन - नोटबंदी - जीएसटी - भ्रष्ट्राचार - किसान-आत्महत्या - महंगाई - बेरोजगारी - महंगी बिजली - महंगी रसोई गैस आदि आमजन समस्याओं पर ... तो, क्यों हैं खामोश - राफेल-खरीद घोटाले व देश के लुटेरों आदि पर ... ? लगता है - "पुलवामा-हमले" में छिपी हुई व आमजन में उजागर होती इनकी शामलाती (मिलीभगत) के पहचान-चिन्हों को मिटाने के लिए रची गई इनकी "एयर स्ट्राइक योजना" भी "संदिग्ध" बनती जा रही है ... इसलिए, इस "संदिग्ध" बनी हुई "एयर स्ट्राइक" को "सत्य" साबित करने के लिए ही - पीएम मोदी व मोदी-मीडिया हरसंभव कोशिश में जुटे हुए हैं ... ताकि, झूंठ-मक्कारी के साथ चीख-चीख कर आमजन में अपनी "बेचारगी" दिखाते हुए - अपनी डूबती-राजनीति को बचाया जा सके ... इसे क्या समझें - पीएम मोदीजी की "कुशल राजनीति" अथवा "धूर्त व मक्कार नीति" ... ? - जीनगर दुर्गा शंकर गहलोत, वरिष्ठ नागरिक व पत्रकार, कोटा (राज.) (11-03-2019 ; 11:40 PM)