ट्रांसपोर्टर की मौत ने बता दिया किस कदर नाजुक हैं हालात

त्रासदी , , बुधवार , 10-01-2018


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इंद्रेश मैखुरी

हल्द्वानी के ट्रांसपोर्टर प्रकाश पाण्डेय बीते शनिवार 6 जनवरी को भाजपा कार्यालय में चल रहे उत्तराखंड के कृषि मंत्री सुबोध उनियाल के जनता दरबार में जहर खा कर पहुंचे और कल 9 जनवरी को उनका देहांत हो गया। एक व्यक्ति यदि जहर खाकर मंत्री के जनता दरबार में शिकायती पत्र ले कर पहुँचता है तो जाहिर सी बात है कि वह समस्या के निराकरण के लिए नहीं पहुंचा है। वह तो इस नतीजे के साथ पहुंचा है कि उसकी समस्या का हल करने वाला कोई नहीं है। वह चरम पीड़ा और अवसाद की स्थिति में पहुंचा चुका है। इसलिए ऐसा आत्महंता कदम उठा रहा है। वह साफ़ तौर पर वीडियो में कहता हुआ सुना जा सकता है कि नोटबंदी और जीएसटी ने उसे तबाह कर दिया है। ये वही नीतियाँ हैं,जिनको नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने देश की आजादी के उत्सव के बराबर के दर्जे पर प्रस्तुत करने की कोशिश की। लेकिन विडम्बना देखिये कि जिन नीतियों को हुक्मरान, मुक्ति का प्रतीक बता रहे हैं, उन्हीं नीतियों के मारे हुए व्यवसायी को, जीवन से मुक्ति के अलावा उन नीतियों की मार से बचने का कोई रास्ता नजर नहीं आया। अगर बाजार में घूमें तो कमोबेश सारे बाजार की हालत लगभग ऐसी ही है। कब,कहाँ,कोई दूसरा, प्रकाश पाण्डेय अवस्था को प्राप्त हो जाए,कह नहीं सकते।

प्रकाश पाण्डेय की मौत की जिम्मेदारी सीधे तौर पर केंद्र और उत्तरखंड की भाजपा सरकार पर आयद होती है। अपनी दिक्कतों के समाधान के लिए प्रकाश पाण्डेय ने प्रधानमन्त्री कार्यालय से लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तक गुहार लगाई। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। अपने अंतिम विडियो में वे बता रहे हैं कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के ओएसडी उर्वादत्त भट्ट निरंतर उन्हें बहलाते रहे। वीडियो के अनुसार, एक बार तो प्रकाश पाण्डेय से मुख्यमंत्री के ओएसडी ने कह दिया कि कहीं से बीपीएल कार्ड ले आओ,तो कुछ बीस-तीस हजार रुपये की मदद करवा देंगे। ट्रांसपोर्ट का व्यवसाय चलाने वाले एक समस्याग्रस्त व्यवसायी का इससे अधिक मखौल क्या उड़ाया जा सकता था?

वर्तमान सत्ता और उसके चहेतों ने जो नया चलन स्थापित किया है,वो यह है कि सरकार की नीतियों से तकलीफ की शिकायत करने वाले पीड़ित को तुरंत ही षड्यंत्रकारी और विपक्षियों का एजेंट सिद्ध कर दो। अभी प्रकाश पाण्डेय के मामले में ऐसी कोशिशें सामने नहीं आई हैं। लेकिन भाई लोग जैसे ही थोडा बचाव की मुद्रा से बाहर निकलेंगे तो तुरंत ही यह कारनामा भी शुरू कर देंगे। तो इससे पहले की यह हो, आइये, इस पहलू पर भी विचार कर लेते हैं। प्रकाश पाण्डेय जब भाजपा दफ्तर पहुंचे तो उन्होंने वहां मुख्यमंत्री को बेकार कहा, उन्होंने कहा कि भाजपा की सरकार किसी की सुनती नहीं है। तो क्या वो किसी विपक्षी पार्टी की शह पर ऐसा कर रहे थे। जी नहीं,विपक्षी पार्टी की शह भी हो तब भी एक व्यवसायी अपनी जान क्यों लेगा ?

प्रकाश पाण्डेय का फेसबुक प्रोफाइल देखिये तो आपको साफ़ अंदाजा लग जाएगा कि भाजपा को बुरा-भला कहते हुए जान देने वाला यह व्यक्ति तो दरअसल भाजपा और उसकी विचारधारा का अन्धसमर्थक, वाहक और प्रसारक था। बीच-बीच में विभिन्न पोस्टों में अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति है। मोदी जी से अपनी पीड़ा सुनने की विनती के साथ यह टेक अनिवार्य रूप से प्रकाश जोड़ते हैं कि मोदी जी हम आपके साथ हैं। बाकी सारी टाइमलाइन भाजपा आईटी सेल से निकलने वाली उन पोस्टों से भरी पड़ी है,जिसमे विपक्षी पार्टियों और विरोधी मत रखने वाले व्यक्तियों पर गालीगलौच की भाषा में झूठे-सच्चे आरोपों की वर्षा है। दलितों, मुस्लिमों और यहाँ तक कि पटेलों के खिलाफ भी पर्याप्त विष बुझे पोस्ट प्रकाश पाण्डेय की टाइमलाइन पर देखे जा सकते हैं। इससे साफ़ है कि वे किसी विपक्षी पार्टी या विचारधारा से ताल्लुक नहीं रखते थे। वे भाजपा और उसकी विचारधारा के ही आदमी थे। विडंबना देखिये कि जिस भाजपा और उसके आईटी सेल के जहर के प्रसारक, वे सोशल मीडिया पर रहे, उसी भाजपा की नीतियों ने उनकी और उनके व्यवसाय की कमर, इस कदर तोड़ दी कि वे स्वयं भी जहर खाने को मजबूर हो गए ! 

आम तौर पर व्यापारियों की पार्टी कहे जाने वाली भाजपा के राज में ही व्यापारी, इस कदर त्रस्त हैं कि वे ऐसे अतिवादी कदम उठाने को विवश है और तब भी सरकार मस्त हैं तो समझ लीजिये कि वे जिस डाल पर बैठे हैं,उसे ही काट रहे हैं। अब तक देश में इस सरकार और इससे पहले की कांग्रेस सरकार की नीतियों के मारे लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं और यह सिलसिला थम नहीं रहा है। अब वर्तमान केंद्र सरकार की नीतियों के मारे व्यावसायी भी आत्महत्या के रास्ते पर चल पड़ें हैं.यह कैसा “न्यू इंडिया” है मोदी जी कि कुछ को उत्पाती,उन्मादी दंगाई मारेंगे और कुछ के प्राण आपकी नीतियाँ हर लेंगी?

(इंद्रेश मैखुरी सीपीआईएमएल की उत्तराखंड राज्य कमेटी के सदस्य हैं।)










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