राजनीति के दो चेहरे: एक एनकाउंटर की कल्पना भर से रो पड़ता है दूसरा खोल देता है हत्यारों के सामने सीना

एक नज़र इधर भी , , बृहस्पतिवार , 18-01-2018


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इंद्रेश मैखुरी

क्या इन दोनों बातों में कोई साम्य है?जी नहीं, एक एनकाउंटर का नाम भर, सुनकर थरथराते हुए आंसू बहाने वाले और बहादुरी से मौत का मुकबला करने वाले के बीच न कोई साम्य हो सकता है, न कोई साम्य है। 13 साल के अंतराल के साथ केवल दोनों घटनाओं की तिथियों में साम्यता है।

प्रवीण तोगड़िया जिस दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में टेसुए बहा रहे थे वो दिन था 16 जनवरी 2018। कामरेड महेंद्र सिंह ने जिस दिन शहादत का वरण किया, वो तारीख थी-16 जनवरी 2005। कामरेड महेंद्र सिंह एकीकृत बिहार और बाद में झारखंड की विधानसभा में भाकपा (माले) के विधायक थे। 1990 में पहली बार विधायक चुने जाने के बाद वे अपने जीवन के अंतिम दिन तक विधायक चुने जाते रहे। झारखंड की विधानसभा में आधिकारिक रूप से विपक्ष के नेता का दर्जा उन्हें हासिल नहीं था। पर विपक्ष के नेता की भूमिका उन्होंने विधानसभा के भीतर और बाहर बखूबी अदा की।

झारखंड सरकार ने विधायकों की तनख्वाह बढ़ाने की कोशिश की तो उन्होंने सदन में उसका विरोध किया। विधानसभा में विभिन्न विभागों द्वारा अपना बजट पास कराने के लिए बांटे जाने वाले तमाम उपहारों का उन्होंने हमेशा विरोध किया। विधायक निधि के कामों में कौन विधायक कितना कमीशन खाता है, इसकी सूची तक महेंद्र सिंह विधानसभा में ले आये। झारखण्ड विधानसभा में पेश की गई इस सूची में तमाम अन्य विधायकों के अलावा तब के विधानसभा अध्यक्ष द्वारा लिए गए कमीशन का भी ब्यौरा था।

ऐसा व्यक्ति जो सत्ता की हर काली करतूत का खुलासा कर दे, उसे खामोश करने का, हत्या के अलावा सत्ता के पास और क्या रास्ता हो सकता है? और यही महेंद्र सिंह के साथ हुआ। 16 जनवरी 2005 को उनकी हत्या कर दी गयी। जन आंदोलन के दबाव में उनकी हत्या की सीबीआई जांच की घोषणा हुई पर हत्यारे कानून की गिरफ्त से बाहर ही रहे। सरकारी तोता मालिकों से पूरी वफादारी जो निभाता है!

लेकिन यहां तोगड़िया के प्रेस कॉन्फ्रेंस में रोने पर महेंद्र सिंह का जिक्र क्यों किया जा रहा है? यह जिक्र एक खास फर्क को रेखांकित करने के लिए है, जो आगे की पंक्तियों में समझा जा सकेगा।

तोगड़िया उनके अनुयायियों के लिए शेर थे, जो जम कर दूसरे धर्म वालों के खिलाफ दहाड़ते रहते थे। उनकी दहाड़ ने अक्सरहां समाज में वैमनस्य की आग फैलाने का काम ही किया है। साम्प्रदायिक सौहार्द के विघटन और दंगाई-उन्मादी मानसिकता के प्रसार को तोगड़िया के अनुयायी उनकी दहाड़ की सफलता के मानक के तौर पर देखते रहे हैं। जितनी अधिक आग, हिंसा, घृणा-दहाड़ उतनी सफल।

लेकिन समाज में जम कर आग फैलाने वाला यह स्वयम्भू शेर, एक दिन आंखों में गंगा-जमुना की धार लिए पत्रकारों से कहता है कि मुझे एनकाउंटर में मारने की साजिश हो रही है। तब बरबस मन में जिज्ञासा पैदा होती है कि यह कैसा शेर है, जो मारे जाने की काल्पनिक धमकी से थरथर कांपता हुआ पहले होश खो बैठा और अब आंसू बहा रहा है?

ठीक इसी मौके पर कामरेड महेंद्र सिंह की हत्या का वाकया याद आया। महेंद्र सिंह विधानसभा के चुनाव प्रचार में एक सभा संबोधित करके निकल रहे थे। अचानक दो बंदूकधारी मोटरसाइकिल पर आए। उन्होंने पूछा-महेंद्र सिंह कौन है? अज्ञात बंदूकधारियों को देखते ही उनकी मंशा समझ ली गयी। पर महेंद्र सिंह बिना किसी भय के बोले-मैं महेंद्र सिंह हूँ। हत्यारों ने उन पर ताबड़तोड़ गोलियां दागी और फरार हो गए।

सत्ता जब चाहती हो कि समाज मे आग लगे तो फिर उस सत्ता की छांव में, जेड सिक्योरिटी की सुरक्षा में गर्जन-तर्जन करके समाज में कमजोरों के घर और उनकी जिंदगियां जलाना बहादुरी नहीं कायरता है, तोगड़िया जी। आप यह कायराना कृत्य बहादुरी समझ कर करते रहे और सत्ता ने जरा आंखें तरेरी तो सारी हेकड़ी धरी रह गई।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में एनकाउंटर किये जाने की कल्पना भर से रोता तोगड़िया और हत्यारों के सामने- मैं महेंद्र सिंह हूँ-का घोष करके शहादत का वरण करते महेंद्र सिंह। ये दक्षिण और वाम की दो प्रतिनिधि तस्वीरें हैं। और यही उनके बीच का असली फर्क भी है।

(इंद्रेश मैखुरी सीपीआई (एमएल) उत्तराखंड की राज्य कमेटी के सदस्य हैं।)










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