समाजवादी प्रेमकुमार मणि ने अपने पूर्व सहयोगी नीतीश को लिखा खत, कहा- आप बुरी शक्तियों से घिर गए हैं

एक नज़र इधर भी , , सोमवार , 04-02-2019


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जनचौक ब्यूरो

(कभी समाजवादी आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे प्रेम कुमार मणि ने बेहद आहत होकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिखा है। दरअसल उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व में जुलूस-प्रदर्शन के दौरान हुए पुलिस लाठीचार्ज में कुशवाहा गंभीर रूप से घायल हो गए। जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। उन्हें अस्पताल में देखने के बाद मणि बेहद परेशान हो गए। और इसी सिलसिले में उन्होंने नीतीश को एक खत लिखा है। जिसे उन्होंने अपने फेसबुक पर भी जारी किया है। पेश है यहां उनका पूरा खत-संपादक) 

 

पटना,

3 फ़रवरी २०१९

आदरणीय भाई नीतीश जी , 

आज (3 फरवरी) उपेंद्र कुशवाहा जी का हाल चाल लेने पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल गया था। आपको पता होगा , कल आपकी पुलिस ने निर्ममता से उनकी पिटाई की है उनके सिर और हथेली पर चोटें हैं और उनका इलाज चल रहा है। मैं जब गया वह व्यथित थे। उन्होंने जो कहा वह चिंताजनक है। मैंने केवल उनकी चोटें नहीं देखीं, उन परिस्थितियों को भी जानना चाहा, जिसमें उन पर इस तरह का हमला हुआ। मैंने पुलिस द्वारा बल-प्रयोग के कारणों के बारे में उनका पक्ष भी सुना। उनका कहना है कि पुलिस कह रही थी कि वह प्रतिबंधित क्षेत्र में नहीं जा सकते। मैं समझता हूं व्यवस्था के लिए कुछ प्रतिबंधित क्षेत्र बनाये जाते हैं और इनका औचित्य भी है। लेकिन जहां तक मेरी जानकारी है, एक सांसद के लिए रक्षा प्रतिष्ठानों को छोड़ कर कोई प्रतिबंधित क्षेत्र नहीं होता।

यूं भी डाक बंगला चौराहा कोई प्रतिबंधित क्षेत्र नहीं होना चाहिए। जिसने इसे ऐसा बनाया है उसे सिरफिरा ही कहा जायेगा। और यदि किसी जनसमूह को राज्यपाल या सरकार को ज्ञापन देना है, तब वह किस रास्ते वहां पहुंचेगी ? क्या आप की सरकार यह चाहती है कि तमाम जनतांत्रिक अभियान धरना, प्रदर्शन, जुलूस आदि बंद कर दिए जाएं ? आपकी सरकार ने बहुत चालाकी से धरना-प्रदर्शन स्थल मीठापुर में कर दिया है। वहां जाकर महसूस होता है, मानो वह जनतंत्र का श्मशान -स्थल हो। वहां धरना-प्रदर्शन निरर्थक होते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन सब के लिए बिहार में कोई आंदोलन नहीं हुए।

नीतीशजी, उसी डाक बंगला चौराहे पर आप ही के नेतृत्व में हम लोगों ने १९९६ में मार्च निकाला था, चारा घोटाले के सीबीआई से जांच की मांग को लेकर। चौक-चौराहे जनता के लिए ही होते हैं। कम्युनिस्ट चीन में भी थ्येन अनमन नाम के चौक पर ही जनता का जमावड़ा लगा था। लोकतान्त्रिक रिवाज़ ऐसे चौक -चौराहों को प्रतिबंधित करने की इज़ाज़त नहीं करते। आपको इधर क्या हो गया है, जो जनता से इतने डरे होते हैं। इतने लम्बे समय तक चुनाव नहीं लड़ सकने की मजबूरियां तो समझ में आती हैं ,लेकिन जुलूस -प्रदर्शनों से से यह फोबिया चिंताजनक है।

आपको स्मरण होगा जब आप मुख्यमंत्री बने थे तब कुछ ही महीनों के बाद (८ मार्च २००६ को ) माओवादी महिला संगठन द्वारा महिला दिवस पर पटना में एक जुलूस निकाला जाना था। पुलिस ने पटना के इर्द-गिर्द के तमाम थानों में सैकड़ों महिलाओं को बंदी बना लिया था। मुझे जानकारी मिली तब मैंने आपसे अनुरोध किया कि उन्हें जुलूस निकालने दिया जाय। पुलिस मना कर रही थी। हमारा इस बात पर जोर था कि उत्पीड़ित तबकों से सरकार को संवाद करना चाहिए। आप राज़ी हो गए। यही नहीं, उनके पीने के लिए पानी टैंकर का प्रबंध करवाया। उस रोज आप दिल्ली चले गए थे। देर रात आपने जुलूस के ठीक से गुजर जाने की फ़ोन पर खबर दी। यह भी बतलाया कि यह अच्छा हुआ। पुलिस पुराने तौर-तरीकों पर चलती है। उसे दुरुस्त करना होगा।

मैं उस नीतीश कुमार और आज के नीतीश कुमार के अंतरों के कारण ढूँढना चाहता हूँ। तब आप नए मुख्यमंत्री थे और आपके लोकतान्त्रिक आवेग सुस्त नहीं हुए थे। आप जनता से संवाद स्थापित करना चाहते थे। दलित-पिछड़ों-महिलाओं आदि उत्पीड़ित तबकों के लिए आपके दिल में जगह थी। शायद कहा जाना चाहिए कि वह जगह अब ख़त्म हो गयी है और आपके लोकतान्त्रिक सरोकार संकुचित हो गए हैं। यह अफ़सोस-जनक है।

नीतीश जी, आप उस जेपी आंदोलन से जुड़े रहे हैं, जो लोकतान्त्रिक आवेगों को बहाल करने लिए आहूत था। जेपी पर जब पुलिस की लाठी चली थी और कुछ लोगों के अनुसार नानाजी देशमुख ने जिसे रोक लिया था, अन्यथा किसी अनहोनी की बात कही गयी थी, तब आप सक्रिय थे। तब भी लाठीचार्ज के कुछ कारण रहे होंगे। लेकिन पूरे देश ने, तमाम जनतांत्रिक व्यक्तियों और समूहों ने इसकी निंदा की थी। हम सब उसमें शामिल थे। आप भी, और मैं भी। मैं तो अदना नागरिक हूं, लेकिन आप तो आज साक्षात् सरकार हो,हुकूमत हो। आपको कोई सबक लेनी थी, कोई परंपरा विकसित करनी थी। लेकिन आपकी पुलिस भी वही काम कर रही है जो १९७४ की पुलिस कर रही थी। उसी पुलिस ने जगदेव बाबू पर गोलियां दागी थीं, जेपी पर डंडे बरसाए थे। आप १९७४ की तानाशाह बेलगाम हुकूमत क्यों बनना चाह रहे हैं?

मुझे वह समय भी याद है जब नालंदा में आप पर मिट्टी के ढेले फेंके गए थे। वहां के तत्कालीन एसपी और डीएम भीगी बिल्ली बने आपके पास खड़े थे, जिनका आपने तुरंत तबादला कर दिया था। एक विधायक भी खड़े थे जो आज आपके मंत्रिपरिषद में हैं। आपका कहना था, मेरा बॉडी इतना फ़्रिजाइल है कि मुझे एक ढेला भी लग गया होता तो मेरी जान चली जाती मणि जी! मैं मनाता हूं कि आप नाजुक-देह हैं, काश आप नाजुक- दिल भी होते ताकि दूसरों की तकलीफ भी समझ पाते। दूसरों के शरीर पर भी चोटें लगती हैं नीतीश जी ! उनकी भी जान होती है, जिसे जाने का खतरा होता है। काश, इसे आप समझ पाते।

मैंने उपेंद्र जी से पूछा कि मुख्यमंत्री जी का फ़ोन आया था? उन्होंने ना कहा। मुझे अफ़सोस हुआ। पुलिस कुछ कर जाती है। लेकिन मुख्यमंत्री को देखना होता है। कर्पूरी जी जब मुख्यमंत्री थे तब पुलिस हाज़त में सफाई मजदूर ठकैता डोम की पिटाई से मौत हो गयी थी। कर्पूरीजी ने पुलिस की गलती स्वीकारी और ठकैता को स्वयं मुखाग्नि दी। लेकिन आप की चुप्पी यह बतलाती है कि इस लाठीचार्ज को आपका समर्थन प्राप्त है। क्या यह सच है कि आपके इशारे पर ऐसा हुआ है? यदि यह सच है तब स्वयं निर्णय कीजिए कि आप क्या हैं!

मैं तो उपेंद्र जी को जानता भी नहीं था, याद कर रहा हूं वह समय जब आपने मुझसे कहा था कि उपेंद्र जी तेज तर्रार, कर्मठ और ईमानदार नौजवान हैं मणि जी, कर्पूरी जी ने मेरे साथ जोड़ा था, युवा लोकदल में। अच्छा बोल भी लेते हैं, इन पर नज़र रखियेगा। आपने उन्हें राजनीति में आगे किया। उन्हें प्रतिपक्ष का नेता बनाया। आपके विकट राजनीतिक समय-संघर्ष में उन ने भी आपका साथ दिया। और आज ऐसा हो गया है कि आप उन पर जानलेवा हमला करवाएंगे? केवल इसलिए कि आज वह आपकी राजनीति के हिस्सा नहीं हैं। या फिर यह कि वह एक पिछड़े जात -जमात से आते हैं, और आपको लगता है इनकी औकात ही क्या है। यह सब यदि सच है तब यह कितना घिनावन और भयावन है !

मैं एक बार फिर अनुरोध करूँगा कि अपने आप पर विचार कीजिए। भारत -भारती की पंक्ति " क्या थे , क्या हो गए और क्या होंगे अभी " आपके सापेक्ष स्मरण करता हूँ। किस बिहार का सपना हम लोगों ने साथ-साथ देखा था। आपने उस बिहार को धूर्त -लम्पट ताकतों के हाथ गिरवी रख दिया है। अफ़सोस होता है।

एक बार खुद तमाम स्थितियों का आकलन यदि कर सकते हैं, तो कोशिश करके कीजिए। बिहार की मुक्ति से अधिक मुझे आपकी मुक्ति की चिंता है। आप बुरी शक्तियों से घिर गए हैं।

आदर के साथ,

आपका , 

प्रेमकुमार मणि








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