घाटा सरकारी उपक्रमों के मत्थे और मुनाफा कॉरपोरेट यारों की जेब में

काम की बात , , सोमवार , 25-06-2018


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गिरीश मालवीय

कंपनियों को बिकते बहुत बार सुना था पर मोदी जी बैंक बेचने निकले हैं। जी हां आईडीबीआई बैंक मोदी सरकार बेच रही है। अभी तक जो लोग 'एयर इंडिया खरीद लो' वाले जोक भेज रहे थे उन्हें अब आईडीबीआई बैंक खरीद लो वाले मैसेज भी तैयार कर लेना चाहिए।

दरअसल आईडीबीआई एकमात्र ऐसा सरकारी बैंक है, जो बैंक राष्ट्रीयकरण कानून के दायरे में नहीं है। इसलिए सरकार को उसमें अपना हिस्सा बेचना अपेक्षाकृत आसान है। क्योंकि इसके लिए कानून में बदलाव की जरूरत भी नहीं है।

आईडीबीआई बैंक का सरकारी बैंकों में सबसे बदतर खराब लोन का रेशियो है, आईडीबीआई बैंक का घाटा पिछले एक साल में 62 फीसदी बढ़ा है। वित्तीय वर्ष 2016-17 में उसका नुकसान 5158 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2017-18 में 8237 करोड़ रुपये हो गया है। उसका एनपीए भी इस दौरान 32 फीसदी बढ़कर 55 हजार 588 करोड़ रुपये पहुंच गया है।

सरकार अपना हिस्सा बेच कर इसलिए अलग होना चाहती है क्योंकि निजीकरण के बाद सरकार पर घाटे और एनपीए से जूझ रहे आईडीबीआई को दोबारा पूंजी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी नहीं होगी।

आईडीबीआई बैंक के निजीकरण के प्रस्ताव में एक विकल्प इसकी 86 फीसदी हिस्सेदारी एलआईसी जैसे सरकारी उपक्रम को बेचने की है। फ़िलहाल आईडीबीआई बैंक में 40 से 43 फीसदी हिस्सेदारी भारतीय जीवन बीमा निगम को बेचने के प्रस्ताव पर सरकार विचार कर रही है।

बीमा नियामक संस्था, आईआरडीए (इरडा) का नियम है कि कोई भी बीमा कंपनी किसी भी लिस्टेड कंपनी की इक्विटी में 15 फीसदी से ज्यादा निवेश नहीं कर सकती। ऐसा प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि बीमा धारकों को अनावश्यक जोखिम से बचाया जाए लेकिन एलआईसी के पास आईडीबीआई के 10.82 प्रतिशत हिस्सेदारी पहले से ही है। और यदि यह इस बैंक के शेयर खरीदती है तो पहले कानून में संशोधन करना होगा, जिसके लिए सरकार आतुर दिखाई दे रही है,

यानी घाटे वाला सौदा खरीदना हो तो एलआईटी खरीदे और फायदे का सौदा हो तो अम्बानी-अडानी-वेदांता को जाए, क्या अब भी किसी को शक है कि ये सरकार पूंजीपतियों के हितों में काम नहीं कर रही है?

(गिरीश मालवीय आर्थिक मामलों के जानकार हैं और आजकल इंदौर में रहते हैं।)

 








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