भाजपा की भूतकाल की राजनीति

गुजरात की जंग , अहमदाबाद, शनिवार , 02-12-2017


rahul-modi-election-gujrat-bjp-congress

स्पर्श उपाध्याय

राजनीति का आधिकारिक रूप से 'जुमला-करण' किया जा चुका है। राजनीति को बंद कमरे में कैद कर दिया गया है जहां नारे ही नारे गूंजा करते हैं। जिस कमरे के सस्ते बल्ब वाले बनावटी उजाले को हमारे देश की राजनीति और हम जनता ने सच मान लिया है। उस बल्ब की अप्राकृतिक रोशनी के परे दुनिया को ख़त्म किया जा रहा है। हम यह भूल गए हैं की बाहर एक सूरज भी उगता है जिसकी रोशनी असल में अन्धकार को दूर करती है। हम जनता को उस कमरे से केवल उस वक़्त बाहर निकलने की आज़ादी मिलती है जब सूरज ढल चुका हो, और अन्धकार दूर-दूर तक फ़ैल गया हो। ऐसी स्थिति उत्पन्न की जा रही है जहां हमे रोशनी की तलाश में, वापस उस कमरे की ओर लौटना पड़ रहा है, उन्हीं जुमलों, उन्ही नारों को सुनने और सच मानने के लिए। हमारे वास्तविक उजाले की समझ को सरकार निगल चुकी है। यह दौर ‘कृत्रिम को कुदरती’ घोषित कर डालने का है।

हर चुनाव प्रचार में भव्य मंच सजता है, जहां देश के सबसे ताकतवर नेता पहुंचते हैं और अपनी बात रखते हैं, उसी बीच से जन्म होता है ‘जुमलों’ का; वह जुमले जिनकी दूरदर्शिता, उपयोगिता, वास्तविकता और सार्थकता साबित करने की कोई जरुरत नहीं होती है। प्रतीत होता है कि हम प्राइम-टाइम पर कोई सास-बहू सीरियल देख रहे हैं जिसमें उमड़ी भीड़ सरीखे दर्शकों के बीच काल्पनिकता फैलाई जा रही है। हमें बार-बार महसूस कराया जाता है कि 'मिहिर मर कर फिर जिन्दा हो सकता है'। 'अच्छे दिन' का जुमला उसी खेल, उसी डेली-सोप का एक अभिन्न अंग है। गौरतलब है कि मौजूदा केंद्र सरकार का सफर 'अच्छे दिन आने वाले हैं' से शुरू होकर 'कांग्रेस ने 60 साल इस देश को लूटा है' से होते हुए 'कांग्रेस मुक्त भारत' पर खत्म होता है।

मालूम पड़ता है, देश भविष्य में नहीं बल्कि भूतकाल सरीखे कुँए में झाँक रहा है और पीछे से हमें वर्तमान को भूल जाने की सलाह दी जा रही है। कहना गलत नहीं होगा कि मौजूदा केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार ने हमें 'भविष्य का सपना दिखाकर, भूतकाल भेंट कर दिया है', 3.5 साल इस बात को और प्रमाणित करते हैं। हमें हर मंच से उन 60 सालों को धिक्कारने के लिए प्रेरित किया जा रहा है जिन 60 सालों में भारत एक वैश्विक-शक्ति के रूप में उभरा है, उन 60 सालों को कोसने के लिए कहा जा रहा है जिसमें जनता अंततः देश के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाली कांग्रेस पार्टी को पूरी तरह नकार देती है और एक चाय बनाने वाले को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा देती है, और जनतंत्र की यही ताकत है। ध्यान रहे, हमें 60 साल को नहीं अपितु जनतंत्र को नकारने के लिए बोला जा रहा है।   

हाल ही में प्रधानमंत्री ने जिस तरह उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान तत्कालीन समाजवादी पार्टी की सरकार पर हिन्दू और मुसलमान के बीच बिजली देने में भेदभाव करने का आरोप लगाया था और कहा था की प्रदेश में 'अगर कब्रिस्तान को जमीन दी जाती है तो श्मशान को भी मिलनी चाहिए।' वह उसका उदहारण था कि कैसे हमे भूतकाल का अन्धकार दिखाकर एकमात्र सत्य की ओर ले जाने का झूठा वादा किया जाता है। गुजरात चुनाव में प्रधानमंत्री का ऐसी ही शैली में भाषाण देने का सिलसिला बहुत मुखरता से सामने आने लगा है।

गुजरात चुनाव में जिस प्रकार भाजपा ने 'हूं छु विकास, हूं छु गुजरात' का नारा दिया है उससे यह साबित होता है की भाजपा ने अपने विकास वाले ट्रम्प कार्ड को एकबार फिर से चुनावी मैदान में फेंक दिया है। लेकिन जिस तरह से गुजरात में विकास की असलियत हमारे सामने आयी है, वह भाजपा के इस जुमले पर कई सवालिया निशान खड़ा करती है। खेती, रोजगार और शिक्षा तीनों मसलों में प्रदेश में 22 सालों से विफल रहने के बाद, भाजपा ने जिस तरह से 'विकास' को अपना हथियार बनाया है वह प्रदेश की जनता का उपहास उड़ाने से ज्यादा कुछ नहीं है।  

वहीं दूसरी ओर जिस तरह से प्रधानमंत्री एवं भाजपा द्वारा कांग्रेस पर लगातार प्रहार किये जा रहे हैं, उससे मुख्यतः तीन सवाल उभरते हैं। पहला, क्या वाकई कांग्रेस को इस चुनाव में भाजपा अपना चिर-प्रतिद्वंदी मान रही है? अगर हां तो भाजपा के 150 + सीटों पर काबिज़ होने का अनुमान एक मजाक साबित होगा। दूसरा, 22  साल सत्ता में रहने के बाद भी भाजपा का कांग्रेस को निशाना बनाना किस ओर संकेत करता है? कहीं यह कांग्रेस की बहुमत लाने की आशंका तो नहीं। तीसरा, जिस हार्दिक पटेल को लुभाने में चुनाव से चंद महीनों पहले तक भाजपा जुटी थी, वह आज उसी हार्दिक पटेल को निशाना क्यों बना रही है? यह तीन अहम् सवाल आज प्रदेश की जनता को जानने का इंतज़ार बेसब्री से है। अब देखना यह होगा की किस हद तक प्रदेश और देश में गुजरात का चुनाव अमूल चूल तब्दीली ला पाने में कामयाब रहता है। यह चुनाव 2019 के पहले भाजपा और कांग्रेस दोनों के भविष्य के लिए काफी अहम है, जहां एक ओर भाजपा को 2019 में एक बार फिर 'अबकी बार, मोदी सरकार' का जुमला उछालने के लिए गुजरात से मैंडेट मिलना अनिवार्य होगा वहीं गुजरात का यह चुनाव राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता का असल परीक्षण भी होगा। 

अगर गुजरात, कांग्रेस की झोली में जाता है, तो 2019 में कांग्रेस के पास भी एक मौका होगा भाजपा से यह कहने का कि 'जनता माफ़ नहीं करेगी'।

(स्पर्श उपाध्याय युवा पत्रकार हैं और आजकल अहमदाबाद रहते हैं।) 






Leave your comment