क्या राहुल गांधी के नेतृत्व में एक नयी कांग्रेस बनेगी?

राजनीति , , रविवार , 19-11-2017


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अखिलेश अखिल

माना जा रहा है कि गुजरात चुनाव से पहले ही राहुल गांधी की पार्टी अध्यक्ष पद पर ताजपोशी हो जाएगी। इस लिहाज से सोमवार को कांग्रेस की वर्किंग कमेटी की बैठक पर लोगों की नजरें लगी हैं। गुजरात में मृतप्राय हो चुकी कांग्रेस को जीवित करने में जिस तरह से राहुल गांधी ने अहम भूमिका निभायी है और उसके लिए सूबे के अलग-अलग समुदायों के तीन युवा नेताओं हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी और अप्लेश ठाकोर को एक किया है। उससे नेतृत्व के साथ-साथ उनकी रणनीतिक क्षमता भी स्थापित हुई है। पटेल, पिछड़े और दलित तबके से आने वाले इन तीनों युवा नेताओं को अपनी राजनीति से प्रभावित करने वाले राहुल गांधी की राजनीति, रणनीति और कूटनीति गुजरात चुनाव में कितनी सफल होती है ये अभी भविष्य के गर्भ में है। लेकिन ये बात अब पक्की हो गयी है कि अपनी अपनी मांगों और अपने अपने समाज के हितों के लिए लड़ाई के मैदान में उतरे इन तीन नेताओं को एक मंच पर लाकर राहुल गांधी ने देश को एक बड़ा संदेश दिया है। 

इसमें कोई शक नहीं कि राहुल गांधी धर्मनिरपेक्षता के चैंपियन हैं लेकिन इसके साथ ही वो इसे नये तरीके से परिभाषित करते हुए भी दिख रहे हैं। उनकी धर्मनिरपेक्षता अपनी मां से बिल्कुल जुदा हो सकती है। सोनिया गांधी के कार्यकाल में कांग्रेस पर बहुसंख्यकों की अनदेखी करने का लेबल लग गया था। ऐसी अवधारणा बना दी गयी थी कि वो सिर्फ़ अल्पसंख्यकों के बारे में सोचती है। इससे कांग्रेस को काफी नुक़सान हुआ।  राहुल गांधी इसको बदलने की कोशिश कर रहे हैं। और माना जा रहा है कि ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। राहुल का गुजरात चुनावों में मंदिर-मंदिर घूमना उसी रणनीति का हिस्सा है। इसके पहले राहुल को इस रूप में कभी नहीं देखा गया था। हालांकि उतनी ही आस्था के साथ वो गुरुद्वारों और मस्जिदों पर भी दस्तक दे रहे हैं। इसी का नतीजा है कि राहुल की चुनावी रैलियों में जय सरदार के साथ-साथ जय भवानी का भी नारा लग रहा है। 

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी के अध्यक्ष बन जाने से गुजरात की चुनावी राजनीति पर कोई असर पड़ेगा? इस पर अभी बहुत कुछ कह पाना मुश्किल है। लेकिन इस बात में कोई शक नहीं कि गुजरात में कांग्रेस की जीत या फिर हार की पूरी जिम्मेदारी अब राहुल गांधी के कंधे पर होगी। इसके साथ ही कांग्रेस में संक्रमण काल की अपनी जो परेशानियां होती हैं उससे भी निजात मिल जाएगी। अब पूरी कांग्रेस राहुल गांधी के पीछे और उनके नेतृत्व में गोलबंद होगी। सोनिया और राहुल के तौर पर सत्ता के दो केंद्र होने के चलते जो अभी तक संभव नहीं हो पा रहा था। गुजरात में एक नये राहुल गांधी दिखे हैं। जो चीजों को बड़े फलक पर देख रहे हैं और लोगों को भी उस पर खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल के भाषणों की धार भी तेज़ हुई है। 

राजनीतिक विश्लेषकों के एक हिस्से का मानना है कि राहुल की ताजपोशी का गुजरात चुनावों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इसके पहले सोनिया के सामने होने से मोदी समेत बीजेपी को विदेशी मूल और इटली जैसे-जैसे कई मुद्दे मुफ्त में मिल जाया करते थे। लेकिन राहुल के साथ चाहकर भी मोदी-शाह की जोड़ी ऐसा कुछ नहीं कर पा रही है। 

आर्थिक नीतियों को लेकर भी राहुल का एक नया पक्ष सामने आ रहा है। आमतौर पर सोनिया गांधी आर्थिक नीतियों के मामले में मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम के भरोसे रहती थीं। जबकि राहुल गांधी नोटबंदी हो, जीएसटी या फिर ग्रोथ से जुड़ी बातें, सब पर बेबाक राय दे रहे हैं।  शायद वो इस बात को जान रहे हैं कि कारोबारी राज्य गुजरात में आर्थिक मसले कितने अहम होते हैं। इसी का नतीजा है कि मौका मिलते ही वो आर्थिक नीतियों पर मोदी को घेरने से नहीं चूक रहे हैं। 

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

 






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