आखिरी राजकुमार बनने की नियति और राहुल गांधी

राजनीति , , शनिवार , 12-05-2018


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डॉ. राजू पाण्डेय

 

रायगढ़। यदि परिजनों और पार्टीजनों की शुभकामनाओं से कोई चमत्कार हो पाता तो निश्चित ही राहुल गांधी आज राजनेता बन गए होते। लेकिन दुर्भाग्यवश राजनीति और जीवन के किसी भी क्षेत्र में शुभकामनाओं का ऐसा असर नहीं होता है कि एक औसत योग्यता रखने वाला व्यक्ति एक असाधारण व्यक्तित्व में बदल जाए। हाल ही में राहुल गांधी ने यह कहा कि 2019 के चुनावों में यदि कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहता है तो उन्हें प्रधानमंत्री बनने में कोई आपत्ति नहीं होगी। इस कथन से उन भयभीत कांग्रेसजनों को अवश्य आश्वासन मिला होगा जो अचानक लंबी छुट्टियों पर चले जाने वाले अपने इस नेता की राजनीति के प्रति गंभीरता को लेकर सशंकित थे। किन्तु कांग्रेस मुक्त भारत बनाने के मोदी-शाह संकल्प, कांग्रेस मुक्त तीसरा मोर्चा बनाने के साथी विपक्षी दलों के इरादों और हाल के चुनावों में रणनीतिक चूकों एवं अक्षम नेतृत्व के कारण कांग्रेस की नजदीकी पराजयों के परिप्रेक्ष्य में यह कथन एक अपरिपक्व राजनेता के आशावाद से अधिक कुछ नहीं लगता।

अब जब यह ज्ञात हो चुका है कि मोदी-शाह मैजिक को तोड़ने का एक मात्र मंत्र सम्पूर्ण विपक्षी एकता है तब यह कथन न केवल गैरजरूरी था बल्कि आगामी चुनाव में कांग्रेस की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाने वाला भी था। राहुल का ‘एकला चलो रे’ का विचार शुद्धतावाद हो सकता है कि उन कांग्रेसजनों में कुछ उत्साह का संचार करे जो गठबंधन की राजनीति में शक्तिहीन कांग्रेस पर आरोपित की जाने वाली अपमानजनक शर्तों की कल्पना से भयभीत हैं और अपने टिकट तथा राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं। कांग्रेस की शक्ति में राहुल का विश्वास उनकी विवशता है क्योंकि अन्य विपक्षी दल कांग्रेस के साथ गठबंधन के इच्छुक नहीं दिखते और मजबूरन कांग्रेस को या तो अकेले चुनाव में जाना होगा या गठबंधन में जूनियर पार्टनर की भूमिका स्वीकारनी होगी। संभवतः पहला विकल्प राहुल को अधिक वरेण्य लग रहा है।

देश के राजनीतिक पर भगवा आधिपत्य और कांग्रेस की दुर्दशा के लिए राहुल अकेले जिम्मेदार नहीं हैं अपितु वे कांग्रेस के उन रणनीतिकारों के शिकार हैं जो नेहरू-गांधी परिवार के मिथक की सर्वोच्चता को कायम रखकर कांग्रेस में अपना अपरोक्ष वर्चस्व बनाए रखने के आदी हो चुके हैं। 

कांग्रेस का इतिहास आज की मोदी सरकार के वर्तमान में देखा जा सकता है-

इंदिरा गांधी मजबूत केंद्र की हिमायती थीं। लेकिन उनकी मजबूत केंद्र की परिभाषा केवल केंद्र सरकार तक सीमित न थी बल्कि यह क्षेत्रीय दलों को कमजोर करने और कांग्रेस के अंदर भी अपनी स्वतन्त्र पहचान रखने वाले कद्दावर प्रादेशिक नेतृत्व का कद छोटा करने एवं उसके पर कतरने के आक्रामक तरीकों को खुद में समाहित करती थी। श्रीमती गांधी के बाद भी कांग्रेस में सत्ता और पार्टी पर शीर्ष नेतृत्व के एकाधिकार की यह प्रवृत्ति न केवल जारी रही अपितु और सशक्त होकर उभरी। स्पष्ट राजनीतिक प्रतिबद्धता रखने वाले राज्यपालों की नियुक्ति और इनकी पक्षपातपूर्ण कार्रवाइयों द्वारा क्षेत्रीय दलों की राज्य सरकारों को भंग करना अथवा परेशानी में डालकर उन्हें विलय के लिए मजबूर करना या उनमें तोड़फोड़ मचाना कांग्रेस की ऐसी रणनीति थी जो अनैतिक होते हुए भी बड़ी कारगर थी और आज भी कारगर है।

अंतर केवल इतना है कि आज इसका उपयोग नरेन्द्र मोदी कर रहे हैं जिनकी कार्यप्रणाली पर इंदिरा गांधी की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।

क्षेत्रीय दलों की उपेक्षा और उनके दमन की इस प्रवृत्ति ने तात्कालिक तौर पर कांग्रेस को सत्ता अवश्य दिलाई लेकिन धीरे धीरे इन प्रदेशों की जनता की कांग्रेस से दूरी बढ़ती चली गई। जिन प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारें थीं वहां कई प्रादेशिक नेता भी अपना व्यापक जनाधार रखते थे। यह नेता कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के लिए कभी चुनौती न बन सकें इसलिए कभी इन्हें राज्य से हटाकर केंद्र में बुलाया जाता, कभी संगठन में भेजा जाता तो कभी राज्यपाल तक बना दिया जाता। इस प्रकार प्रादेशिक नेतृत्व को कभी उभरने नहीं दिया गया और स्थानीय मुद्दों को भी हाशिए पर डाला गया।

इससे असन्तुष्ट होकर अनेक प्रदेशों में स्थानीय प्रभाव रखने वाले कांग्रेस नेताओं ने विद्रोह किया और नए दल भी बनाए।

जब तक नेहरू- गांधी परिवार का करिश्मा अपने चरम पर था तब तक इन नेताओं का विद्रोह अपनी छाप न छोड़ पाया और चुनावों में असफलता के कारण इन्हें घर वापसी करनी पड़ी। किन्तु धीरे धीरे स्थिति बदली है। नेहरू-गांधी परिवार की लोकप्रियता में उत्तरोत्तर ह्रास हुआ है और कांग्रेस से विद्रोह करने वाले क्षेत्रीय नेताओं ने अपनी पहचान कायम करते हुए सत्ता भी प्राप्त की है।

कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इन सारी कवायदों से खुद को पार्टी में ताकतवर बनाए रखने में भले ही सफल रहा किन्तु इसका दुष्परिणाम अनेक प्रदेशों में घटते जनाधार के रूप में उसे भोगना पड़ा। 

राहुल को पार्टी की कमान एक ऐसे समय मिली है जब भारतीय राजनीति में संभवतः पहली बार नेहरू-गांधी परिवार का सदस्य होना एक अयोग्यता माना जा सकता है। जनता में इस परिवार के प्रति दीवानगी कम हुई है और नरेन्द्र मोदी इस परिवार को देश की दुर्दशा के लिए उत्तरदायी ठहराकर अपनी अक्षमता, कुशासन और भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने में सफल रहे हैं।

राहुल आज मैच विनर के बजाए टीम की कमजोरी बन कर रह गए हैं। प्रदेशों में कांग्रेस संगठन की स्थिति खराब है। अभी भी कद्दावर प्रादेशिक नेताओं की उपेक्षा और उनके दल त्याग का सिलसिला जारी है। राहुल यह समझ पाने में असमर्थ रहे हैं कि अब उन्हें अपने पुरखों के स्टारडम को पाने के लिए सहायक भूमिकाओं में अच्छा प्रदर्शन कर अपनी पहचान बनानी पड़ेगी।

जब राहुल पार्टी अध्यक्ष पद की कमान संभालने के बाद आम कार्यकर्ता की आवाज को पार्टी की आवाज बनाने की बात करते हैं और चुनावों में टिकट प्राप्त करने की उसकी उतनी ही संभावना बताते हैं जितनी वर्तमान कांग्रेस कल्चर के किसी बड़े नेता की है तब उनके शब्द खोखले और हास्यास्पद लगते हैं। राहुल के पास यह अवसर था कि वे यह सिद्ध कर पाते कि कांग्रेस अध्यक्ष का पद नेहरू-गांधी परिवार से हटकर किसी सुयोग्य कांग्रेस नेता को मिल सकता है और यदि वे स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष हैं तो किसी परिवार विशेष का सदस्य होने के कारण नहीं बल्कि समकालीनों में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण उन्हें इस पद के लिए चुना गया है। किन्तु उन्होंने बन्द कमरों की गुप्त राजनीतिक मंत्रणाओं पर अधिक भरोसा किया और जिस तरह वे पार्टी अध्यक्ष बने वह उनकी ताजपोशी बन कर रह गया। इस पूरी प्रक्रिया में कोई पराजित हुआ तो वह पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र था जिसकी स्थापना को राहुल अपनी पहली प्राथमिकता बताते हैं।

देश में मोदी सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर असन्तोष बढ़ा है। उनकी लोकप्रियता और जनाधार में धीमी किन्तु स्पष्ट कमी परिलक्षित हो रही है। वर्तमान सरकार स्वतन्त्र भारत की सर्वाधिक कॉरपोरेट परस्त सरकार है। पूरे देश में साम्प्रदयिक वैमनस्य बढ़ा है और सरकार अप्रत्यक्ष रूप से यह जताने का कोई भी मौका नहीं छोड़ रही है कि वह इस स्थिति को लेकर लज्जित नहीं अपितु गौरवान्वित है। व्यक्ति और पार्टी के विरोध को राष्ट्रद्रोह माना जा रहा है। इन परिस्थितियों से अनेक प्रबुद्धजन इतने भयभीत और चिंतित हैं कि वे राहुल में मोदी का विकल्प तलाश रहे हैं। इन बुद्धिजीवियों का यह राहुल प्रेम कहीं मोदी को मजबूत कर पुनः सत्ता में पहुंचाने का कारण न बन जाए।  

राहुल एक आम नौजवान हैं- खुशमिजाज, थोड़े बेपरवाह,पढ़ाई में जरा कमजोर, हल्के तारीफ पसंद, आजाद ख्यालों वाले नौजवान। राजनीति उनकी हॉबी नहीं है। लेकिन असुरक्षा की भावना उन्हें राजनीति का मोह छोड़ने नहीं देती। उनके छोटे से राजनीतिक जीवन के इन लंबे वर्षों में शायद उनके हिस्से में जीत की तुलना में हार ही अधिक आई है।

अपने पूर्वजों और पार्टी का इतिहास उन्हें पता नहीं है यही कारण है कि जब विरोधी उनके पूर्वजों और पार्टी पर झूठे आरोप लगाते हैं तो वे उनका खंडन नहीं कर पाते। उनके भाषण लेखकों को हमेशा उनके हिंदी ज्ञान की सीमाओं और उनकी तथ्यों को स्मरण न रख पाने की कमजोरी का ध्यान रखना पड़ता है।

उनकी कार्यकर्ताओं और जनता से मुलाकात के कार्यक्रम प्रभाव नहीं छोड़ पाते। संसद में वे प्रायः अनुपस्थित और निष्क्रिय होते हैं। संसद में उनके द्वारा दिया गया एक भी भाषण ऐसा नहीं है जो स्मरण रखा जा सके। वर्षों से वे राजनीति में अपना मन रमाने की कोशिश कर रहे हैं और राजनीति के गुर सीखने की चेष्टा में लगे हैं।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि राहुल का टेम्परामेंट राजनीतिक नहीं है। उन्हें प्रशिक्षित कर राजनीतिज्ञ बना भी दिया जाए तो भी वे स्वाभाविक राजनीतिज्ञों से पीछे ही रहेंगे। कांग्रेस और अन्य दलों के युवा नेताओं मसलन अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी के साथ तुलना करने पर योग्यता का यह अंतर स्पष्ट दिखता है।  

कर्नाटक के चुनावी नतीजों से राहुल का पास फेल निकालने के पहले सिद्धारमैया के परिश्रम और जमीनी पकड़ पर अवश्य विचार किया जाना चाहिए। पंजाब में कांग्रेस को जीत कैप्टन अमरिंदर सिंह के प्रयासों से ही मिली थी और कर्नाटक में भी यदि कांग्रेस अच्छा करती है तो इसमें सिद्धारमैया की बड़ी भूमिका होगी। जनाधार वाले क्षेत्रीय नेताओं के महत्व की स्वीकारोक्ति कांग्रेस को मजबूत बनाने वाला पहला कदम बन सकती है। लेकिन इस सत्य को स्वीकार करने योग्य बनने के लिए राहुल को उन चाटुकारों की फौज से निजात पानी होगी जिसने उन्हें बंधक बना रखा है। यदि कांग्रेस का आखिरी राजकुमार बनना राहुल की नियति है तब भी वे इसमें सुखद हस्तक्षेप कर सकते हैं। बजाए पराजित होकर जबरन अपदस्थ किए जाने की प्रतीक्षा करने के। 

                              ( डॉ. राजू पाण्डेय छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में रहते हैं और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)  

 








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