उत्पीड़न और अत्याचार पड़ा जिंदगी पर भारी, राजस्थान में कांस्टेबल गेनाराम ने दी परिवार समेत जान

ज़रा सोचिए... , जयपुर, सोमवार , 22-01-2018


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मदन कोथुनियां

जयपुर। अभी तो हम ठीक से आज़ाद भी नहीं हो पाए। संविधान प्रदत्त अधिकारों को ले भी नहीं पाये कि पूरा मुल्क ही मानो हमारी कब्रगाह बन गया है। हत्याएं और आत्महत्याएं, हर दिन जानें जा रही हैं। खून बह रहा है, मारकाट मची हुई है, ऐसा लगता है कि एक अंतहीन गुलामी और अंधकार की तरफ धकेलने का पूरा प्रबंध इस व्यवस्था ने हमारे लिए कर दिया है।

यहां अब कौन सुरक्षित है? जब राजस्थान पुलिस के एक जवान को निरन्तर हो रही प्रताड़ना से हार कर पूरे परिवार सहित फांसी के फंदे पर झूल कर खुदकुशी करनी पड़े तो यह समझ लेना चाहिए कि सबके गले के नाप के फंदे तैयार हैं। आज गेनाराम मेघवाल का परिवार झूला, कल हममें से किसी का भी नम्बर आ सकता है।

गौरतलब है कि नागौर जिले के सुरपालिया थाना क्षेत्र के बाघरासर गांव में पेशे से पुलिसकर्मी गेनाराम मेघवाल ने अपने परिवार के साथ फांसी का फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। मृतक गेनाराम नागौर जिले के डीडवाना अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक की गाड़ी चलाते थे। गेनाराम के साथ उनकी पत्नी संतोष, 22 साल की बेटी सुमित्रा और 20 साल के बेटे गणपत सिंह ने भी अपनी जान दे दी है। आत्महत्या से पहले गेनाराम ने एक सुसाइड नोट भी सोशल मीडिया पर जारी किया था। सुसाइड नोट में गेनाराम ने नागौर एसपी कार्यालय में लंबे समय से जमे कर्मियों पर खुद को प्रताड़ित करने, धमकाने और मारपीट करने जैसे कई संगीन आरोप लगाए हैं। और उन सबको ही पूरे परिवार की मौत का जिम्मेदार बताया है। सुसाइड नोट में उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। 

कोई इंसान जब तक पूरी तरह से नाउम्मीद नहीं हो जाए, तब तक जान नहीं देता है। इससे यही जाहिर होता है कि गेनाराम का परिवार काफी वक्त से सताया जाता रहा था। और इंसाफ की कोई किरण नहीं पा कर पूरे परिवार ने मौत को गले लगा लिया। अपने 6 पेज के सुसाइड नोट में आत्महत्या करने वाले परिवार की पूरी व्यथा नामजद लिखी गई है। मरने से पहले यह नोट सोशल मीडिया पर इस आशा और अपेक्षा के साथ मृतक ने पोस्ट किया कि गुनाहगारों को छोड़ा नहीं जाए।

 हम इन हत्याओं और सुनियोजित आत्महत्याओं को देखते रहने के लिए अभिशप्त हो चुके हैं। हर दिन अन्याय, उत्पीड़न, अत्याचार, खून-खराबा, हत्याएं और आत्महत्याएं सम्बन्धी खबरें सुनने को मजबूर हैं। आखिर यह सिलसिला कहीं जा कर रुकेगा या यह अनंतकाल तक जारी रहेगा? क्या कोई तरीका है इस अत्याचार से मुक्ति का?

हर घटना हमें उद्वेलित करती है, उद्विग्न करती है, आंदोलित करती है, हम सड़कों पर उतरते हैं, हम मोर्चरी के बाहर बैठते हैं, हम सही, निष्पक्ष जांच की मांग करते हैं, सीबीआई की गुहार लगाते हैं, जो आंदोलन में हमारे साथ शरीक होते हैं, उन्हें सलाम भेजते हैं, जो नहीं आते, उन्हें गलियाते हैं। थोड़े दिन जांच पड़ताल, चालान, सुनवाई, गवाही, फैसला या समझौता हो जाता है। हम अगले कांड में न्याय पाने के लिए फिर सड़कों पर होते हैं। विगत 3-4 सालों से सड़कें ही हमारी युद्धभूमियां बनी हुई हैं।

यहां किसको जीने दिया जा रहा है? किसी को भी तो नहीं। हमारे विश्वविद्यालय के विद्यार्थी बड़ी संख्या में सुसाईड कर रहे हैं। रोहित वेमुला अकेले नहीं है, हर यूनिवर्सिटी में कई कई रोहित हैं? जिनके गलों के लिए फंदे तैयार हैं। हमने रोहित वेमुला, डेल्टा मेघवाल, मुथुकृष्णन, रविन्द्र मेघवाल जैसे दर्जनों होनहार नौजवान खो दिए हैं। जो मरे नहीं, उनको मार दिया गया है। नजीब जैसों को गायब कर दिया गया है। 

 पूरा देश ही रणभूमि बन चुका है। संविधान द्वारा दिये गए आरक्षण को लेकर टॉर्चर किया जा रहा है। सीबीआई और एन्टी करप्शन ब्यूरो दलित अधिकारियों, कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों के पीछे पागल कुत्ते की तरह पड़ा हुआ है। जरा सा बोलो और जेल जाने की तैयारी कर लो। न बोलने की, न लिखने की, न ही खाने की, न ही प्यार करने की, किसी भी चीज़ की आज़ादी नहीं बची है। हर तरफ दुष्चक्र है, दमन है और चीख चीत्कार है, लोकतंत्र सिर्फ कहने भर को रह गया है। 

क्या वजह है कि फूलन देवी का हत्यारा सारे देश में आज़ाद घूम रहा है और भीम आर्मी का मुखिया रासुका में अंदर सड़ाया जा रहा है? क्या हम इतने मूर्ख हैं कि हम समझने में नाकामयाब हैं कि पूरे राजस्थान में सामंतवाद, ब्राह्मणवाद और बनियावाद अपने चरम पर है और हम सब कुछ समझ कर भी नासमझ बने हुए हैं। आखिर हम कब जान पाएंगे कि हमारे वर्ण शत्रु सदियों बाद फिर से सत्ता संसाधनों पर काबिज हुए हैं। और उनका एक महाभियान चल रहा है कि किस तरह इस देश को एक धर्म विशेष के नाम पर मनुवादी राष्ट्र बना दें। जिसमें या तो हम गुलाम, दास और सेवक की भांति रहेंगे अथवा हमें मरने पर मजबूर किया जाएगा। जो रोहित वेमुला और गेनाराम परिवार की तरह खुदकुशी नहीं करेंगे, उनको मार दिया जाएगा। 

राजस्थान के नागौर जिले के सुरपालिया थाना क्षेत्र के बागरासर गांव की यह घटना सिर्फ एक दलित परिवार की आत्महत्या नहीं है, यह हमारी सामूहिक चेतना की हत्या है। यह व्यवस्था के सुव्यवस्थित मारक उत्पीड़न का सबसे ताज़ा उदाहरण है। देश अज़ीब से विरोधाभासी तथ्यों से रूबरू है। एक तरफ राष्ट्रपति भवन इस वर्ग के हवाले है तो दूसरी तरफ गेनाराम जैसे लोगों की ज़िन्दगी के लाले हैं। समझ ही नहीं आता कि हम गेनाराम के परिवार की इस सांस्थानिक हत्या के खिलाफ लड़ें या सामूहिक शोक में डूबकर विलाप करें। 

मुझे गेनाराम के परिवार से सहानुभूति तो है, मगर आक्रोश भी है। आत्महत्या के बजाय संघर्ष का रास्ता लेना था। इस पत्र को सुसाईड नोट बनाने के बजाय ऐलाने जंग का खत बना लेना था। जैसा मर कर बताया, जीते जी बता देना था। इतना घुटन अकेले क्यों सही ? क्यों नहीं सबको अपनी पीड़ा बताई। कुछ ही सही अभी लोग ज़िंदा है जो आखिरी दम तक लड़ते। गेनाराम आप लोग क्यों मरे, जो आप लोगों की मौत के ज़िम्मेदार है, उन्हें डूब मरना था।

आत्महत्या के रास्ते का मैं समर्थन नहीं करता, मेरी जीते जी संघर्ष में रुचि है। कमजोर नही होना है, आखिरी सांस तक लड़ना है। जब मरना ही है तो अंत तक लड़ते हुए मरना होगा। बिना डिप्रेशन में आये, बिना थके, अगर हम नहीं लड़े तो आने वाली कई पीढ़ियां बर्बाद हो जाएंगी। इसलिए खुदकुशी के बजाय लड़ाई की राह लेना ही श्रेयस्कर है। 

(मदन कोथुनियां पत्रकार हैं और जयपुर में रहते हैं।)                      










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