पंडित दीन दयाल बनेंगे सरकारी दर्जे से महापुरुष

एक नज़र इधर भी , जयपुर, शनिवार , 13-01-2018


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मदन कोथुनियां

जयपुर। राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार भारतीय जनसंघ के संस्थापक पं. दीनदयाल उपाध्याय को महापुरुष का दर्जा देने जा रही है। राज्य सरकार ने तय किया है कि सरकारी कार्यक्रमों में महात्मा गांधी की तस्वीर के साथ अब उपाध्याय की फोटो भी लगाई जाएगी। इसके साथ ही उनका जन्मदिन गांधी जयंती की तर्ज पर मनाने को लेकर भी विचार किया जा रहा है।

सरकारी लेटर पैड और आदेशों में उपाध्याय का चित्र भी अनिवार्य किया जाएगा। इससे पहले प्रदेश के सरकारी विज्ञापनों में उपाध्याय की तस्वीर अनिवार्य करने के साथ ही स्कूलों की लाइब्रेरी में उनकी जीवनी रखना अनिवार्य किया जा चुका है। जानकारी के अनुसार, सरकारी विज्ञापनों की तर्ज पर लेटर पैड व आदेशों में भगवा रंग में उपाध्याय की तस्वीर वाला लोगो छापा जाएगा। इसके साथ ही भाजपा विधायकों के लेटरपैड पर भी उपाध्याय की तस्वीर छापना अनिवार्य किया गया है। सूत्रों के अनुसार, अगले कुछ दिनों में इसको लेकर राज्य के सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से आदेश जारी कर दिया जाएगा।

सचिवालय में तैनात एक आईएएस अधिकारी ने बताया कि यह आदेश जारी होने के बाद क्रियान्वयन की जिम्मेदारी जिला कलेक्टरों को सौंपी जाएगी। कांग्रेस ने वसुंधरा सरकार पर संघ के एजेंडे को लागू किए जाने का आरोप लगाते हुए कहा कि जिस तरह से शिक्षा का भगवाकरण किया गया, उसी तरह अब प्रशासन का भगवाकरण करने का प्रयास किया जा रहा है। वैसे यह दरजा देने की प्रथा कब शुरू हुई इस के बारे में मुझे ज्यादा जानकारी तो नहीं है, लेकिन भारत का पुराना इतिहास पढ़ते हैं तो मौर्यकाल में कुछ-कुछ सामने आता है।

ये दरजे पहले धार्मिक लोग बांटते थे। राजा व राज्य व्यवस्था गांव प्रमुख, जनप्रमुख आदि के रूप में नियुक्तियां जरूर की जाती थीं, जिस का काम प्रशासन का कार्य देखना, कामों में मदद करना व कर वसूली में मदद करना होता था। मौर्यकाल के समय के ब्राह्मण ग्रंथ पढ़ेंगे तो उसमें मौर्य राजाओं को क्षुद्र का दर्जा दिया गया था। बौद्ध ग्रंथ, स्तम्भ, शिलालेख आदि पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि मौर्यों को क्षत्रिय का दर्जा दिया गया था व जैन ग्रंथों में भी मौर्यों को क्षुद्र बताया गया है।

मौर्यों ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया था इसलिए उच्च दर्जा मिल गया। ब्राह्मण धर्म को किनारे कर दिया तो नाराज ब्राह्मणों ने मौर्यों को क्षुद्र का दर्जा दे दिया। जैन धर्म को भी सत्ता का सरंक्षण नहीं मिला व बौद्धों के भारी विरोध के बाद मगध से पलायन कर के कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में जा कर ठहरे थे तो इनके ग्रंथों में भी मौर्यों को क्षुद्र घोषित कर दिया था। अब इस छोटी सी ऐतिहासिक जानकारी से आप को पता चल गया होगा कि दर्जा देने की प्रथा का सच क्या है ? 

यह दर्जों का दौर भारतीय इतिहास में हमेशा रहा है। लेकिन मुगलों के समय एकाएक बदलाव आया था। पहले धार्मिक लोग सत्ता को इस तरह के दर्जे देते थे, लेकिन मुगलकाल में सत्ता की तरफ से भी दर्जा देने की शुरुआत हुई थी। आप को याद ही होगा कि अकबर के 9 रत्न थे। ये दर्जे ही थे जो अकबर को खुश कर देते थे उन को रत्न घोषित कर देते। बाकी जो क्षत्रिय राजा लोग थे उन को दिए दर्जों पर विस्तार से नहीं लिखूंगा क्योंकि मैं इसके माध्यम से कुछ और बताना चाहता हूँ।

अंग्रेजों के समय दर्जे का रूप बदल कर उपाधियां कहा जाने लगा था। अंग्रेजों ने भी खूब उपाधियां बांटी। वैसे अंग्रेजों द्वारा वितरित उपाधियां सारी गलत तो नहीं थी, क्योंकि चापलूसों को ही सारी उपाधियां मिलतीं तो सबसे पहले महात्मा गांधी को मिलती या पंडित नेहरू को मिलती। अंग्रेजों में न्यायिक चरित्र तो था,  इससे इंकार नहीं किया जा सकता। बाकी लूटा तो है इस देश को उससे मैं इनकार नहीं कर रहा हूँ, क्योंकि वो आये ही व्यापारी बन कर थे तो मुनाफा तो कमाएंगे ही। 

सरकारी आदेश।

जब सत्ता की तरफ से मुगलों ने दर्जा देने की शुरुआत कर दी तो आगे बढ़ते-बढ़ते आजादी के बाद भारत की लोकतांत्रिक सरकार ने भी इसे उचित समझ कर जारी रखा। सत्ता दर्जा या उपाधियों की रेवड़ियां बांटेगी तो हमारे आप जैसे लोगों को तो मिलेगा नहीं, क्योंकि सत्ता पर कब्जा एक जाति विशेष का है जिसको अंग्रेजों ने यह कह कर जज बनाने से इंकार कर दिया कि "ब्राह्मणों में न्यायिक चरित्र ही नहीं है, जो खुद भेदभाव की जड़ों में है वो कभी न्याय कर ही नहीं सकते। " 

अब दोबारा मौर्यकाल याद करिये, जहां ब्राह्मणों ने दान न देने के कारण मौर्यों को क्षुद्र का दर्जा दिया था। अब धर्म व सत्ता दोनों पर कब्जा ब्राह्मणों का है। दर्जा चाहे धर्म दे या सत्ता दे। देने वाले तो ब्राह्मण ही हैं। अब आप को समझ आ गया होगा कि दर्जा या उपाधियां कैसे व किस को दी जाती होगी। जो लोग जनता पर अत्याचार करके सत्ता की मजबूती के लिए काम करते हैं, सत्ता की तरफ से उन को दर्जा दिया जाता है और ब्राह्मण धर्म दान देने वालों को आशीर्वाद के रूप में दर्जा देते हैं। 

आजादी के बाद कांग्रेस सरकार ने खूब पुरस्कार, दर्जा, उपाधियां बांटी थी व अब बीजेपी भी उसी अंदाज में बांट रही है। हाँ, कांग्रेस के समय ईमानदारी का नाटक करने के लिए इक्के-दुक्के अच्छे लोगों को भी उपाधि, दर्जा, पुरस्कार दिया गया था, लेकिन बीजेपी वाले ऐसी गलती भी नहीं कर रहे हैं, चाहे बीमारी से मरे मुरदों को भी महापुरुष क्यों न बताना पड़े, लेकिन देंगे अपने लोगों को ही।  

रेलवे स्टेशनों पर कितने लोग बीमारी से तड़प कर मर जाते हैं, कौन सुध लेता है, लेकिन नाम के आगे पंडित लगा था इसलिए मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम भी बदल कर इनके नाम कर दिया गया। अब राजस्थान की सरकार इतिहास बदलने में लगी है तो हल्दी घाटी का युद्ध तो जितवा ही दिया है और अब पंडितजी को महापुरुष बना कर ही छोड़ेगी। आप इंतजार करते रहिए। 

एक भी राजपूत राजा अपनी कुर्सी नहीं बचा सका, लेकिन गौरव गाथाएं गाई जाती रही हैं। अब 8 सौ साल बाद सब जीत जाएंगे। जो काल्पनिक किताबें ले कर घूमते-घूमते बीमारियों से मर गए थे, उन सब मुर्दों को ढूंढ-ढूंढ कर महापुरुष घोषित किया जाएगा। 

(मदन कोथुनियां पत्रकार हैं और जयपुर में रहते हैं।)






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