जनराजनीतिक परंपरा के सच्चे वारिस हैं राजू यादव

विशेष , , शनिवार , 13-04-2019


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सुधीर सुमन

भोजपुर जनवादी संघर्षों की जमीन है। राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गैरबराबरी के खिलाफ जनसंघर्षों का यहां का इतिहास बेमिसाल रहा है। संघर्ष के विविध रूप यहां की परिवर्तनकामी जनता की चेतना के अनिवार्य हिस्सा रहे हैं। आजादी के बाद नक्सलबाड़ी विद्रोह और नवनिर्मित वामपंथी पार्टी भाकपा-माले लिबरेशन के कामरेडों के भीषण शासकीय दमन के बाद भोजपुर की जमीन पर उस इंकलाबी स्वप्न को पुनर्जीवन मिला। यहां भी जगदीश मास्टर, रामेश्वर यादव, भाकपा-माले के दूसरे महासचिव सुब्रत दत्त उर्फ जौहर, डॉ. निर्मल, बूटन मुसहर समेत कई कामरेडों ने संघर्ष के दौरान शहादत दी। शासकवर्ग ने पुनः सोचा कि उसने क्रांति के प्रयास को खत्म कर दिया। लेकिन भूमिगत स्थिति में भाकपा-माले के तत्कालीन महासचिव का. विनोद मिश्र और भोजपुर आंदोलन के बेमिसाल नेता का. रामनरेश राम के नेतृत्व में भाकपा-माले के प्रभाव का विस्तार जारी रहा। पार्टी ने संघर्ष के विभिन्न मोर्चों पर कामकाज बढ़ाया। अस्सी का दशक बिहार में एक लोकप्रिय जनराजनीतिक मोर्चा आईपीएफ और अभूतपूर्व किसान आंदोलन का गवाह बना। 

आईपीएफ के बैनर तले ही भाकपा-माले ने चुनावी मोर्चे पर भी सक्रियता बढ़ाई। गरीबों के मतदान के अधिकार के लिए संघर्ष चलाया और 1989 में गरीब-अतिपिछड़ा समुदाय के का. रामेश्वर प्रसाद को आरा लोकसभा सीट से विजयी बनाकर संसद में पहुंचाया। रामेश्वर प्रसाद दो बार भोजपुर के संदेश विधानसभा से भी चुनाव जीते।

रामनरेश राम जिन्हें 1967 के विधानसभा चुनाव में भूस्वामियों ने बूथ कब्जा करके और उनके चुनाव एजेंट जगदीश मास्टर पर जानलेवा हमला करके पराजित किया था। वे अट्ठाइस वर्षों बाद 1995 में भारी मतों से विजयी होकर विधानसभा में पहुंचे और जीवनपर्यंत उन्हें कोई हरा नहीं सका। इन दोनों नेताओं ने संसद और विधानसभाओं में उन्हीं सवालों के लिए संघर्ष किया, जिनके लिए वे सड़कों और गांव-कस्बों पर जनसंघर्षों को संगठित करते थे। उनकी जनप्रतिबद्धता के मिसाल दिए जाते हैं। 

2019 के लोकसभा चुनाव में आरा से भाकपा-माले के उम्मीदवार राजू यादव इसी गौरवशाली संघर्ष की विरासत के वारिस हैं। सहार प्रखंड के एकवारी गांव जहां से भोजपुर आंदोलन की शुरुआत हुई थी, उसी के पास राजू यादव का गांव गोरपा है। इसी गांव के कुसुम कुंवर और रामतवक्या सिंह की दूसरी संतान के रूप में राजू का जन्म हुआ। उनकी दो बहनें हैं। बड़ी बहन का नाम रामावती देवी और दूसरी बहन का सीतासुंदर देवी है। 

राजू के पिता रामतवक्या सिंह भाकपा-माले के कार्यकर्ता थे। पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच वे आरटी सिंह के नाम से मशहूर थे। वे भारतीय सेना के जवान थे। भाकपा-माले उस समय भूमिगत पार्टी थी। उस भूमिगत दौर में पार्टी महासचिव विनोद मिश्र को भोजपुर के कायकर्ता और समर्थक राजू जी के नाम से ही जानते थे। आरटी सिंह ने उन्हीं के नाम पर अपने बेटे का नाम राजू रखा। हालांकि बीमारी से असमय उनकी मृत्यु हो गई। बचपन में ही राजू ने अपने पिता को खो दिया। राजू ने तीसरी से लेकर मैट्रिक तक की पढ़ाई आरा के हितनारायण क्षत्रिय स्कूल से की। इंटर आरा के ही महाराजा कॉलेज से, बी.ए. जैन कॉलेज से और एम.ए. वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय से किया। महाराजा विधि महाविद्यालय, आरा से उन्होंने कानून की भी पढ़ाई की। छात्र जीवन में ही राजू ने अपने पिता की राजनैतिक राह पर चलने का निर्णय ले लिया।

राजू यादव के राजनीतिक सफर की शुरुआत सन 2000 में हुई। उन्होंने छात्र-संगठन आइसा की सदस्यता ली और उन्हें आइसा का आरा नगर संयोजक बनाया गया। एक साल के बाद ही 2001 में वे आइसा के जिलाध्यक्ष बना दिए गए।  2002 वे भाकपा-माले के आरा नगर कमेटी का और 2005 में भाकपा-माले के जिला कमेटी का सदस्य बने। 2007 से 2011 तक उन्होंने आइसा, बिहार के राज्य अध्यक्ष की जिम्मेवारी निभाई। 2012 में इंकलाबी नौजवान सभा के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए। 2016 में वे भाकपा-माले की राज्य कमेटी के सदस्य बनाए गए और इसी साल अखिल भारतीय किसान महासभा का राष्ट्रीय कार्यकारणी सदस्य बने। 2018 में पंजाब के मानसा में हुए भाकपा-माले के 10 वें राष्ट्रीय महाधिवेशन में राजू यादव को पार्टी की केन्द्रीय कमेटी का सदस्य बनाया गया। इस तरह देखें तो लगभग उन्नीस साल के राजनैतिक सफर में उन्होंने छात्र, युवा और किसान मोर्चे पर नेतृत्व की महत्वपूर्ण जिम्मेवारियां निभाई हैं। वे चुनावी संघर्षों के अनुभव से भी गुजरे हैं। 2010 में संदेश विधानसभा क्षेत्र से वे भाकपा-माले के प्रत्याशी रहे।

2014 के पिछले लोकसभा चुनाव में बतौर भाकपा-माले प्रत्याशी राजू यादव को भाजपा और राजद के बीच तीखे धु्रवीकरण के बावजूद लगभग एक लाख वोट मिले। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें पुनः उम्मीदवार बनाया है। इस बार उन्हें राजद समेत महागठबंधन का समर्थन भी मिल रहा है। मोदी और भाजपा-संघ शासन की निरंकुश प्रवृत्ति, कारपोटरपरस्ती तथा सामंती-सांप्रदायिक-वर्णवादी उन्माद और उत्पात तथा लूट और झूठ की राजनीति के खिलाफ संघर्ष की एक विश्वसनीय आवाज के तौर पर वे भोजपुर आंदोलन के अंतर्वस्तु और सपनों के प्रतिनिधि के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं। सामाजिक न्याय, हर तरह की समानता, भाईचारा, स्वतंत्रता और विकास की सच्ची आकांक्षा रखने वाले मतदाता उनके पक्ष में गोलबंद हो रहे हैं। 

राजू यादव छात्रों, नौजवानों, शिक्षकों तथा किसान-मजदूरों और मेहनतकश महिलाओं के बीच खासे लोकप्रिय रहे हैं। छात्र-हित में उन्होंने कई सफल आंदोलनों का नेतृत्व किया। उनकी अगुवाई में आंदोलन और भूख हड़ताल के बाद वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय को यूजीसी की मान्यता मिली। उन्होंने संघर्षों के जरिए विश्वविद्यालय में आरक्षण को हर स्तर पर लागू करवाया।  उनके नेतृत्व में चले संघर्षों की बदौलत महाराजा विधि महाविद्यालय बंद होने से बचा और वहां आरक्षण के नियमों के पालन की गारंटी हुई। जब देश भर के शिक्षा संस्थानों में फीस वृद्धि का सिलसिला जारी था, तब राजू यादव की अगुवाई में चले संघर्षों के कारण ही वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय में फीस नहीं बढ़ी। आइसा-इंकलाबी नौजवान सभा के बैनर तले राजू यादव की अगुवाई में दलित छात्रावासों की भयानक खस्ताहाली के खिलाफ और ब्रहमेश्वर मुखिया की हत्या के बाद गरीब-दलित छात्रों पर रणवीर सेना के गुंडों के हमलों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी गई। 

पूरे देश में चले बेखौफ आंजादी आंदोलन में राजू यादव अगली कतार में थे। भोजपुर में यौन हिंसा, महिलाओं के उत्पीड़न और मान-मर्यादा के हनन की हर घटना के खिलाफ संघर्षों में वे शामिल रहे हैं। छोटी बच्चियों से लेकर महादलित महिलाओं के साथ हुई गैंगरेप के दोषियों को सजा दिलवाने के संघर्षों का उन्होंने नेतृत्व किया है। हाल के दिनों में आशाकर्मियों और रसोइया सेवकों आदि के आंदोलनों, मुजफ्फरपुर शेल्टर होम कांड के खिलाफ उभरे राज्यव्यापी आंदोलन की अगली कतार में वे रहे हैं। सिंचाई, नहरों में पानी, डीजल अनुदान, फसल क्षति मुआवजा, धान की बिक्री आदि सवालों पर इन्होंने आंदोलनों का नेतृत्व किया है। आरा में इन सवालों को लेकर वे आमरण अनशन पर भी बैठे थे। बिजली, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि बुनियादी सुविधाओं के लिए चलने वाले संघर्षों में राजू यादव हमेशा शामिल रहे हैं। भोजपुर और आरा में आपराधिक घटनाओं और हत्याओं के खिलाफ प्रतिवादों में हमेशा उनकी मौजूदगी देखी जा सकती है।

भाजपा और संघ ने भोजपुर के इलाके में भी लगातार सांप्रदायिक उन्माद भड़काने की कोशिश की है। चाहे रानीगंज में गाय के नाम पर सांप्रदायिक उन्माद भड़काने की साजिश हो या गड़हनी और सहार में दंगा भड़काने की, भाकपा-माले के नेता के रूप में राजू यादव ने इसे विफल करने का काम किया है। आम तौर पर बहुसंख्यकवाद के चक्कर में राजनीतिक पार्टियां ऐसे मुद्दों से घबराती हैं, पर अल्पसंख्यकों पर हो रहे सांप्रदायिक हमलों का प्रतिवाद भी सामाजिक न्याय का ही सवाल है और इसके लिए राजू यादव ने संघर्ष किया है। बेरोजगार नौजवानों, छात्रों, दलित-पिछड़ों, गरीब-मेहनतकशों, मजदूर-किसानों और महिलाओं के अधिकार और सम्मान के लिए संघर्षरत राजू यादव की लोकप्रियता हर तबके के बीच है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि प्रगतिशील-लोकतांत्रिक लोगों की वे उम्मीद हैं। जनता के हर सुख-दुख में साथ रहते हैं। भाजपा उम्मीदवार आरके सिंह के नौकरशाहाना मिजाज के विपरीत राजू यादव जनता को अपने घर-परिवार के सदस्य की तरह लगते हैं। चुनावों में इस्तेमाल हो रहे भारी धनबल के विपरीत राजू यादव जनबल के प्रतिनिधि हैं। वे इस जनराजनीतिक परंपरा के सच्चे वारिस हैं, जहां जनता के सहयोग के बल पर चुनाव लड़ा जाता है और चुने जाने पर उन्हीं के हित में काम किया जाता है। 

राजू यादव सामाजिक-राजनैतिक और आर्थिक बदलाव के लिए चल रहे एक वामपंथी जनराजनैतिक आंदोलन की उपलब्धि हैं, उसके नेतृत्व का एक प्रतिनिधि चेहरा हैं। और वे अकेले नहीं हैं। राज-समाज के जनविरोधी चरित्र के बदल देने के लिए प्रतिबद्ध ऐसे नौजवानों की पूरी एक कतार उनके साथ है, जो समाज के दलित-वंचित-पिछड़े और गरीब समुदायों के बीच से जननेता के रूप में विकसित हुए हैं। यह भोजपुर के आंदोलन की ही देन है। इसी आंदोलन से जुड़े गरीब भूमिहीन मां-बाप की बेटी चिंटू कुमारी जेएनयू छात्र संघ के चुनाव में महासचिव बनती है, यहीं मनोज मंजिल, शिवप्रकाश रंजन, कयामुद्दीन अंसारी, अजित कुशवाहा जैसे दर्जनों नौजवान नेता हैं, जो सामाजिक-राजनीतिक ढांचे को बदलने की लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं। यही भोजपुर है, जिसके बारे में जनकवि बाबा नागार्जुन ने ‘भोजपुर’ कविता में लिखा था- 

‘‘भगतसिंह ने नया-नया अवतार लिया है

अरे यहीं पर

अरे यहीं पर

जन्म ले रहे

आजाद चन्द्रशेखर भैया भी

यहीं कहीं वैकुंठ शुक्ल हैं

यहीं कहीं बाधा जतीन हैं।’’

फिलहाल संघर्ष का मोर्चा चुनाव का है और इसमें राजू यादव का मुकाबला नफरत, उन्माद, अन्याय, उत्पीड़न, गैरबराबरी और कत्लेआम को बढ़ावा देने वाली फासिस्ट राजनैतिक शक्ति से है, जिसके खिलाफ जितने ज्यादा प्रतिनिधि संसद में पहुंचेगे, इस देश के संविधान और लोकतंत्र की रक्षा और उसे मजबूत करने का संघर्ष उतना मजबूत होगा। कारपोरेटपरस्त मनुवादी निजाम के खिलाफ आरा की जनता एक जनवादी आवाज को संसद में पहुंचाएगी, इसकी उम्मीद है। 

(लेखक सुधीर सुमन संस्कृतिकर्मी हैं और आजकल आरा में रहते हैं।)

 








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