किसी लायक नहीं रह गया है राज्य और उसका कानून, संभालनी होगी हमें व्यवस्था

मुद्दा , , शनिवार , 08-06-2019


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संदीप नाईक

मेहरबानी करके बलात्कार, हत्या या किसी भी अपराध में धर्म, जाति या सम्प्रदाय खोजना बन्द कीजिये, यह राज्य और दलगत राजनीति आखिर में हमारा ही नुकसान करेगी, सबके आईटी सेल हैं और समाज में हिंसा फैलाना इनका धर्म है। 

सत्ता और सरकार के अपने अपने स्वार्थ हैं और जो सरकारें अपने बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, पोषण, भ्रूण हत्या, सही समय पर विवाह या बलात्कार से रक्षा नहीं कर सकतीं वह सरकार निकम्मी और घोर लापरवाह है। वह कोई भी हो- फिलिस्तीन, अमेरिका, सीरिया, पाकिस्तान, नेपाल या भारत जैसे संस्कारी और धार्मिक देश की बात हो- सरकारें सिर्फ़ चुनाव जीतने और आर्थिक लाभ लेने के लिए ही लोकतंत्र में बनाई जाती हैं बाकी के समय ये निकम्मे गैर जिम्मेदार और हद दर्जे तक हरामखोरी में व्यस्त रहते हैं इसलिए इन पर विश्वास करना छोड़िए और हमारी न्यायपालिका और कार्यपालिका इनकी चाटुकार और गुलाम हैं इसलिये इन गिरगिटों पर भी भरोसा मत कीजिये जिनकी प्रतिबद्धता संदिग्ध है। 

अलीगढ़ हो, कठुआ या कल उज्जैन में हुई 5 साल की बच्ची की रेप के बाद नृशंस हत्या, उज्जैन में तो जगत स्वामी राजा महांकाल मन्दिर के ठीक पास यह घटना  घटित हुई, हत्यारे बलात्कारी ने बच्ची का रेप कर उसके साथ नृशंस कृत्य किये और पवित्र क्षिप्रा में फेंक दिया शव। 

मुझे लगता है ;- 

◆ हमें अब राज्य और कानून व्यवस्था पर भरोसे बैठने के बजाय सोशल पुलिसिंग या देखरेख करनी होगी इसके लिए। 

◆ बेटियों को बचपन से तैयार करें कई लोग और सामग्री मौजूद है गुड टच बैड टच, वेनिडो, कराटे जूडो, चिली स्प्रे आदि जैसे ट्रेनिंग माध्यम से।

◆ लड़कों को शिक्षा दें, जीवन कौशल शिक्षा की बहुत जरूरत है। 

◆ युवाओं को कानून और जेंडर समानता की ट्रेनिंग दें। 

◆ घर परिवार में इन मुद्दों पर खुलकर बात करें।

◆ सेक्स, यौनिकता, हवस और जघन्यता की बातें खुलकर करें। 

◆ पब्लिक ट्रांसपोर्ट, आम रास्तों और सूनी गलियों में निगाहें मुस्तैद रखें।

◆ बुजुर्ग लोग मोहल्लों, चौराहों और सार्वजनिक जगहों पर सतर्कता से निगरानी करें। खास करके बेटियों तरुणियों के स्कूल - नौकरी पर आने जाने के समय। 

◆ महिला पुलिस की संख्या बढ़ाई जाए। 

◆ नगरीय निकाय की संस्थाओं को सीसीटीवी कैमरों के लिए बजट में प्रावधान किया जाये।

◆ परिवारों में जब छोटी बच्चियां, किशोरियां हों तो घर में आने जाने वाले परिचितों को ऐसा मौका ना दें कि वे अकेले में इनसे मिलने की कोशिश करें या बाहर ले जायें गोली बिस्किट या चॉकलेट दिलाने। 

◆ खेत-खलिहानों में सतत निगरानी करें और गांव देहात के सूने स्थानों, खलिहान, खन्तियों पर कड़ी निगरानी रखें। 

◆ स्कूल कॉलेज कोचिंग में किशोरों, युवाओं के लिए ट्रेनिंग, संवेदनाशील बनाने के ट्रेनिंग हो।

◆ सोशल मीडिया पर अपने घर की बच्चियों, महिलाओं के फोटो डालना बन्द करें (कुछ असहमत हो सकते हैं पर लोग आजकल फोटोशॉप कर उनका बेजा इस्तेमाल करते हैं और अपने मोबाइल में सेव करके रखते हैं, शादी ब्याह, मेहंदी, नृत्य आदि हम सब पोस्ट कर देते हैं बगैर यह जाने कि दुनिया सिर्फ हमारे 300 से 5000 वर्चुअल दोस्तों तक सीमित नहीं है।) 

कई उपाय, सुझाव आप भी जोड़ सकते हैं

एक बार समानुभूति से विचार करके देखिए कि यदि आपकी बेटी, नाती, पोती होती तो 

और आखिर में पुनः कि इन मामलों को धर्म सम्प्रदाय और जाति से ना जोड़ें। यह सिर्फ हवस, वहशीपन, कामुकता और महिला को सिर्फ और सिर्फ भोग्या समझ कर इस्तेमाल करने के आशय वाली बात और मानसिकता है। 

हम सब विजिलेंट हैं और महिला को बराबरी का मानते हैं,  ये देवी - वेवी जैसी फालतू और घटिया बातें नहीं मानते, जब तक हम एक समता मूलक समाज की बात नहीं करेंगे तब तक कोई हल नहीं निकलेगा।

 (संदीप नाईक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और आजकल भोपाल में रहते हैं। लेख में दिए गए विचार उनके निजी हैं।)

 








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