आरबीआई के आईने में दिखी अर्थव्यवस्था की निराशाजनक तस्वीर

विशेष रिपोर्ट , , सोमवार , 09-10-2017


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जनचौक स्टाफ

मुंबई। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण पर विश्वास किया जाए या फिर देश के सर्वोच्च आर्थिक निकाय रिजर्व बैंक के सर्वे पर? मोदी ने कंपनी सेक्रेटरियों के सम्मेलन में अर्थव्यवस्था की चमकदार गुलाबी तस्वीर पेश की थी। लेकिन अगर आरबीआई की मानें तो ये तस्वीर बिल्कुल उल्टी है। उसने अपने स्तर पर इस बीच कई सर्वे कराए हैं। जिसमें ये बात सामने आयी है कि देश की अर्थव्यवस्था बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है। और तकरीबन सभी प्रमुख क्षेत्रों में पस्तहिम्मती की हालत है।

ये खबर इंडियन एक्सप्रेस के हवाले से आई है। आरबीआई के सर्वे की मानें तो उपभोक्ताओं का भरोसा लगातार टूट रहा है। मैनुफैक्चरिंग क्षेत्र में व्यवसायिक रूझान में गिरावट दर्ज की गयी है। इसके साथ ही मुद्रास्फीति में लगातार बढ़ोतरी हो रही है जबकि विकास दर गिरावट की ओर अग्रसर है। आरबीआई के ये नतीजे उस समय सामने आए हैं जब 4 अक्तूबर को सेंट्रल बैंक विकास दर संबंधी घोषणाएं कर रहा था। जिसमें उसने 2017-18 के लिए विकास दर के लक्ष्य को घटाकर 7.3 से 6.7 फीसदी कर दिया था।

आरबीआई का भी मानना है कि सामान्य आर्थिक स्थिति के बारे में लोगों की मौजूदा धारणाएं बेहद निराशाजनक हैं। ये सिलसिला पिछली चार तिमाहियों से जारी है। इसके साथ ही भविष्य में इसके और खराब होने की आशंका है। दो महीने की मौद्रिक नीति के खुलासे के बाद आरबीआई के 4 अक्तूबर को किए गए उपभोक्ताओं के आत्मविश्वास का सर्वे बताता है कि सामान्य आर्थिक परिस्थिति के बारे में सितंबर 2017 में 34.6 फीसदी लोग हालात में सुधार की बात कह रहे हैं पिछले साल यानी सितंबर 2016 में इनकी संख्या 44.6 फीसदी थी। 

सर्वे के मुताबिक 40.7 फीसदी लोगों का कहना है कि सितंबर 2017 में आर्थिक हालात और खराब हुए हैं। जबकि पिछले साल इसी समय ऐसा सोचने वालों की संख्या 25.3 फीसदी थी। एक साल बाद अर्थव्यवस्था में सुधार होगा ऐसी अपेक्षा करने वालों की तादाद में भी गिरावट दर्ज की गयी है। इनकी संख्या 66.3 से घटकर 50.8 पर आ गयी है।

आरबीआई का ये सर्वे बंगलुरू, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता, मुंबई और नई दिल्ली समेत छह मेट्रो पोलिटन शहरों में कराया गया है। इसमें कुल 5100 घरों ने हिस्सेदारी की। सर्वे में आमतौर पर ये बात सामने आयी है कि लोगों में आत्मविश्वास जगने निराशा की खाईं और मजबूत हो रही है।

इन प्रतिक्रियाओं में सबसे बड़ी चिंता रोजगार के हालात को लेकर थी। निराशा की तरफ ले जाने के लिए इसको सबसे बड़े कारक के तौर पर देखा जा रहा है। पिछले दो दौरों में रोजगार के हालात और खराब हुए हैं। 43.1 फीसदी लोग मानते हैं कि रोजगार की हालत बद से बदतर हुई है पिछले साल ऐसा सोचने वालों की संख्या 31.4 फीसदी थी।

गौरतलब है कि पिछले 12 महीनों के दौरान एल एंड टी, बैंक, टेलीकाम कंपनियां और तकनीकी फर्मों में नौकरियों में कटौती की गयी है। इसके अलावा लोगों की सबसे बड़ी चिंता का विषय लगातार बढ़ती महंगाई थी। इस मोर्चे पर लोग जबर्दस्त निराशा के शिकार हैं। लोगों की आय में लगातार गिरावट दर्ज की गयी है जबकि खर्चों में समय के साथ बढ़ोतरी हुई है। आर्थिक मामलों के जानकार इसके पीछे मुख्य वजह महंगाई मानते हैं।

इन्हीं सब चीजों का नतीजा देश के विकास दर पर पड़ा है और आरबीआई को अपने विकास दर के लक्ष्य को भी घटाने के लिए बाध्य होना पड़ा है। वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद और सकल घरेलू मूल्य को क्रमशः 6.8 और 6.6 कर दिया गया है जो पहले 2017-18 और 2018-19 दोनों के लिए 7.4 था।










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