उच्च सदन में उत्तराखंड: दिल्ली दरबार का बलूनी पर दांव

राजनीति , , सोमवार , 12-03-2018


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पवन लालचंद

उत्तराखंड की राजनीति में राज्यसभा के रास्ते अनिल बलूनी की ज़ोरदार धमक हो रही है। ऐसे समय जब पूर्व सीएम विजय बहुगुणा और बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट से लेकर दिग्गज रामलाल सहित कई हैवीवेट नेताओं के नाम सियासी फ़िज़ाओं में दौड़ रहे थे तब अनिल बलूनी ने दिल्ली दरबार में अपनी मजबूत पकड़ का अहसास करा दिया है। बलूनी की संसद के ऊपरी सदन में एंट्री के पीछे कहीं न कहीं मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की भी सहमति झलकती है। यानी प्रदेश में मोदी-शाह के करीबी त्रिवेंद्र तो दिल्ली में उत्तराखंड पर बात मोदी-शाह सिर्फ और सिर्फ बलूनी की सुनेंगे। अपने गुजरात कनेक्शन के चलते दिल्ली दरबार में संबित पात्रा से लेकर तमाम प्रवक्ताओं में संसद का रास्ता सबसे पहले अनिल बलूनी पकड़ पाये।

तो बहुगुणा कैंप को जन्नत की हक़ीक़त दिखा गये शाह!

18 मार्च 2016 की बागी कहानी के हीरो के नाते पॉलिटिकल कॉरिडोर्स में राज्यसभा की एक सीट का सबसे बड़ा दावेदार पूर्व सीएम विजय बहुगुणा को माना जा रहा था। पहले बहुगुणा के लिये राजभवन का रास्ता टटोला जा रहा था लेकिन जब ये बात सामने निकलकर आई कि अभी बहुगुणा प्रदेश की राजनीति से दूर हटना नहीं चाह रहे हैं और राज्यसभा के लिये अघोषित दावेदारी के तौर पर वे लोकसभा चुनाव न लड़ने का संदेश भी पार्टी नेतृत्व तक पहुँचा चुके थे! ऐसे में पहाड़ की पॉलिटिक्स में चर्चा गरमाने लगी कि बहुगुणा बनाम बलूनी की जंग में 'विजय' बहुगुणा की हो सकती है।

दरअसल इसके पीछे आसान लॉजिक यही लगाया जा रहा था कि मार्च बागी क्रांति कहानी की सियासी क़ीमत के एवज़ में राज्यसभा का ईनाम बहुगुणा को मिलेगा और बलूनी को संसदीय राजनीति में एंट्री के लिये एकाध साल और रुकना पड़ सकता है। लेकिन अब साफ है कि बहुगुणा का एडजस्टमेंट राजभवन या कहीं और जब होगा तब होगा फिलहाल तो बलूनी के बहाने बीजेपी में डटे कांग्रेस के बागी नेताओं को हल्का झटका दिया गया है!

टिहरी में रानी के संभलने का वक़्त! 

ऐसे में जब सूबे की खाली हो रही एकमात्र राज्यसभा सीट पर बहुगुणा पर बलूनी भारी पड़ गये हैं, तब लोकसभा चुनाव 2019 में टिहरी की सीट को लेकर भी समीकरण टटोलने की आवश्यकता हो सकती है। अब चर्चायें ये भी ज़ोर पकड़ सकती हैं कि क्या एक उपचुनाव और एक आम चुनाव में टिहरी लोकसभा सीट से ताल ठोक चुके साकेत बहुगुणा फिर टिहरी की लड़ाई में उतरेंगे! तीन-चार साल से सूबे की राजनीति से दूर रहे साकेत बहुगुणा क्या बैकडोर से दिल्ली दरबार में फ़ील्डिंग लगाकर रानी के रास्ते में बाधाएं पैदा कर सकते हैं! हालांकि अभी नहीं लगता कि साकेत इतना जल्दी चुनावी राजनीति में लौटना चाहेंगे! फिर भी सियासत कब सीधे रास्ते होकर चलती है!

युवा बलूनी को चांस तो फिर शौर्य की एंट्री भी तय!

अब जब मोदी-शाह ने बलूनी को संसद के उच्च सदन का टिकट थमा दिया है यानी प्रदेश की राजनीति में एक नये युवा तुर्क को स्थापित करना शुरू कर दिया है तब शौर्य डोभाल की सक्रियता को आपको और गंभीरता से लेना चाहिये! एनएसए अजित डोभाल का बेटा और संघ बीजेपी थिंकटैंक से करीबी होने के साथ-साथ शौर्य पीएम मोदी के आर्थिक समझ रखने वाले युवा चेहरे के खाँचे में सटीक बैठते हैं। पौड़ी लोकसभा सीट का लंबे समय तक प्रतिनिधित्व करते आ रहे जनरल खंडूरी अब संन्यास की तरफ हैं और बीजेपी राजनीति में खाली होती खंडूरी की जगह पर जनरल बिपिन रावत और शौर्य डोभाल के नाम सबसे ऊपर चल रहे हैं। लेकिन बलूनी के बाद अब शौर्य की संभावना बढ़ती दिख रही है। कहने को सतपाल महाराज भी पौड़ी के रास्ते दिल्ली लौटने का अरमान पाले हैं लेकिन युवा राजनीति के मुक़ाबले महाराज के लिये अवसर कम ही प्रतीत होते हैं।

तो अजय भट्ट को चुनाव लड़कर ही राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान में वापसी करनी होगी!

पिछले साल पहाड़ पर चली मोदी लहर में पार्टी की प्रचंड जीत के बावजूद रानीखेत के रण में 'खेत' रहे बीजेपी के सूबेदार अजय भट्ट का नाम भी राज्यसभा को लेकर खूब चला। इसके पीछे तर्क यही था कि सत्ता में आयी पार्टी का क्रेडिट भट्ट को भी जाता है लिहाजा मोदी-शाह राज्यसभा पर फैसला लेते अजय भट्ट का ख़्याल रखेंगे! अब लग रहा है कि नैनीताल लोकसभा सीट से चुनावी लड़ाई में भट्ट को उतारा जायेगा! यानी भगतदा का नाम भी राजभवन का रास्ता देखने वाले दिग्गजों की सूची में शामिल हो सकता है!

तो बीजेपी की सूबाई त्रिमूर्ति के बल्ला टाँगने का दौर निकट!

पहले मुख्यमंत्री के तौर पर त्रिवेंद्र रावत पर दांव और अब राज्यसभा के लिये अनिल बलूनी रास आने का मतलब एक और भी है। राज्य बनने के बाद सत्ता या विरोध की राजनीति में बीजेपी की सूबे में अगुआई कोश्यारी-खंडूरी-निशंक करते आये थे। लेकिन अब दौर नयी सियासत का मार्ग प्रशस्त करने का आ चुका है। पहले मोदी मंत्रिमंडल में जगह बनाने में नाकाम रहे इन तीन नेताओं में खंडूरी पहले ही रिटायरमेंट का ऐलान कर चुके हैं, भगत दा को लेकर भी चर्चायें होने लगी हैं! विपरीत हालात के बावजूद 'चाय की प्याली' में तूफान लाने के लिये निशंक ऊर्जा खूब लगा रहे हैं। लेकिन मौजूदा बीजेपी नेतृत्व में उनकी धमक कब सुनायी देगी इस मुश्किल सवाल का जवाब शायद आज निशंक के पास भी न हो! 

अंत में..

यानी राज्यसभा के बहाने त्रिवेंद्र ही 'विजयेंद्र' का मैसेज भी!

सरकार का एक साल पूरा होने के मौके पर मुख्यमंत्री के लिये इससे राहत की खबर और क्या होगी कि संसद के ऊपरी सदन में तमाम दावेदारों को पछाड़ जो खिलाड़ी जा रहा हो वो उनकी गोलबंदी वाला हो। सरकार के कामकाज की समीक्षा सभी अपने-अपने स्तर पर आने वाले दिनों में करेंगे लेकिन एक तथ्य से बहुत लोग शायद इंकार न करें कि अभी बीजेपी की सूबाई राजनीति में मोदी-शाह के सामने त्रिवेंद्र का विकल्प बनने की कूव्वत किसी दूसरे नेता में नहीं दिख रही!

(पवन लालचंद उत्तराखंड में जी यूपी-उत्तराखंड के रेजिडेंट एडिटर हैं। ये लेख उनके फेसबुक पेज से लिया गया है।)






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