नफरत को खत्म करने के लिए सांप्रदायिकता की नाभि संघ पर साधना होगा निशाना

गुजरात की जंग , , शनिवार , 09-12-2017


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आशुतोष रंगा

किसी भी खरपतवार को निकालने के लिए उसको जड़ से उखाड़ना ना ही केवल एक सुरक्षा प्रणाली है बल्कि बागान को बचाने का एक मात्र तरीका भी है। मेरा इशारा यहां खरपतवार साम्प्रदायिकता से है और बागान देश से, सर्वधर्म समभाव की पूरी दुनिया में मिसाल माने जाने वाला भारत आज कलंकित हो रहा है। जिस बागान में प्रेम, अमन और चैन की कलियां  खिलती थीं वह आज नफरत भय और सांम्प्रदायिकता की खरपतवार से बर्बाद हो रहा है। इस खरपतवार को फ़ैलाने और उगाने की बहुत समय से कोशिश हो रही थी लेकिन 2014 के बाद से इसका फैलाव बड़े ही सुनियोजित एवं सफलतापूर्ण तरीके से हो चुका है।

जब इस खरपतवार को जड़ से उखाड़ने की  बात कही जाती है तो इसको अंजाम देने वाली सारी मूक बधिर विपक्षी पार्टियां सोई रहती हैं। ये सब पार्टियां वही सुस्त सेना हैं जो 5 साल सोई रहती हैं और जब चुनाव आते हैं तब सेकुलरिज्म का खोखला नारा लेकर निकल पड़ती हैं। पहलू खान, अख़लाक़ से लेकर हाल ही में राजस्थान में हुआ अफ़राज़ुल प्रकरण न ही केवल हमारे देश के संवैधानिक ढांचे  का पतन दिखाता है बल्कि अपने आप को विकल्प के रूप में दर्शाने वाली विपक्ष की सुस्ती एवं लाचारी को भी नग्न करता है। आखिर क्यों हुक्मरानों की निरंतर विफलता और लाखों की अपनी जनसभाओं का फायदा विपक्ष नहीं उठा पा रहा है? विकास का फुस्स होता गुब्बारा ग़ालिब के जन्नत के ख़याल जैसा है, यह खुद सत्ताधारी भाजपा अभी चल रहे गुजरात चुनाव प्रचार में दिखा चुकी है। जो भाजपा 2014 में  विकास के गुब्बारे में हवा भरते नहीं थकती थी आज वही अपने उस गुब्बारे को कहीं किनारे रख कर सेक्स  सीडी, सांप्रदायिकता और ऑडियो टेप जैसे खिलौनों से जनता का ध्यान भटका रही है। 

जनता में ये सन्देश पहुंच रहा है कि विकास पगला चुका है बावजूद इसके सवाल ये है कि आखिर क्यों सत्ताधारी पार्टी 150 सीटें लाने का आत्मविश्वास रखती है और विपक्ष है कि उसकी घिग्घी बंधी हुई है? 

इस अजीबो गरीब ‘सच्चाई’ के ढांचे के नीचे बहुत पुरानी परन्तु मज़बूत नींव पड़ी हुई है और हां ये वही जड़ है जो हिंदुस्तान को भी खोखला कर रही है, और वो है संघ परिवार। बार-बार संघ परिवार का ज़िक्र यहां इसीलिए हो रहा है क्योंकि वह एक आक्रामक एवं सफल प्रचारक के रूप में हमारे सामने आया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि संघ परिवार अपने हर कदम और narrative को आगे बढ़ाने में सफल रहा है, यूपी विधानसभा चुनाव इसका प्रमाण है। आप सोच रहे होंगे कि जीत का सारा श्रेय संघ परिवार को क्यों जा रहा है, मोदी के प्रचार को क्यों नहीं ? तो यहां पर आपको ये जानना ज़रूरी है कि यूपी चुनाव से 2 साल पहले ही संघ यूपी को अपनी प्रयोगशाला बनाने के लिए खूंटे गाड़ के बैठ गया था। और जी हां यहां आपको यही बताने की कोशिश हो रही है कि कितने संगठित तरीके से संघ परिवार अपने काम को अंजाम देता है। दरअसल भाजपा का प्रचार सिर्फ चुनावी मौसम में नहीं होता, परन्तु बारह मास और 5 साल तक यह प्रक्रिया चलती है। जो काम नेता नहीं कर पाता वह काम एक स्वयं सेवक कर डालता है। दरअसल ये स्वयंसेवक बड़े ही सामाजिक होते हैं, अपनी व्यवहार कुशलता और विशाल संपर्क के सहारे ये समाज के अंदरूनी हिस्सों में भी पहुंच बना लेते हैं। याद रहे एक नेता वोट मांगने आपके घर की चौखट तक ही पहुंच सकता है, परन्तु एक स्वयं सेवक जो कि आपके मित्र, सम्बन्धी या शुभचिंतक के रूप में आता है, आपकी चौखट से आपके बेडरूम और बेडरूम से पूजा घर में जाकर आपसे किसी पार्टी विशेष को वोट देने की कसम दिलवा सकता है। 

राजस्थान के बीकानेर जिले में एक प्रत्याशी महाशय एवं उनके परिवार की महिलायें लोगों से शालिग्राम (भगवान् विष्णु का एक रूप) पर हाथ रखकर उन्हीं को वोट देने की कसम खिलवा रहे थे। और यह बात उतनी ही सच है जितनी आपके मोबाइल फ़ोन में आ रहे व्हाट्सप्प नोटिफिकेशन की घंटी। मोबाइल और व्हाट्सप्प से यहां तात्पर्य साफ़ है कि कैसे सोशल मीडिया का इस्तेमाल और narrative का फैलाव सफलता पूर्वक और आसानी से किया जाता है, क्योंकि सोशल मीडिया में आयी हर बात हमें धर्म ग्रन्थ से भी ज़्यादा सच्ची लगती है। भाजपा इन्ही हथकंडों और तरीकों से समाज के हर वर्ग को एक narrative रुपी खिलौना पकड़ा देती है। गरीब और अनपढ़ वर्ग को हिन्दू-मुस्लिम का झुनझुना, मध्यम वर्ग और थोड़े पढ़े लिखों को विकास का झुनझुना और अमीर वर्ग को सुपर पावर वाला झुनझुना पकड़ाने में पूरा संघ परिवार बेहद सफल रहा है। और हां यही है इस ढाँचे की नींव!!

विपक्ष का केवल नेताओं पर वार करना एवं विरोध करना दशानन के बहुतेरे सिरों में से एक सिर को काटने के समान है। अगर इस दशानन को पराजित करना है तो इसकी शक्ति केंद्र नाभि पर वार करना होगा उसी प्रकार सत्तारूढ़ दशानन की नाभि यानी संघ परिवार और उसकी विचारधारा पर सवाल करना होगा। जब तक संघ परिवार पर कोई सवाल नहीं उठाएगा या फिर विरोध नहीं करेगा तब तक यह दशानन ऐसे ही अट्टहास करता रहेगा भले ही विपक्ष विभीषणों की फौज  लगा दे। इस जड़ को ही विपक्ष को काटना होगा। यहां मकसद केवल सत्तासीन को हटाना या सिर्फ सरकार बदलना नहीं बल्कि भारत समाज में फ़ैल रही नफरत की आग को बुझाना है, जो कि हर निरंकुश प्रबल शासक द्वारा लगाई जाती है। भले ही वो इमरजेंसी काल जैसी हो या किसी सांप्रदायिक दंगे जैसी। जैसा कि हम जानते हैं गुजरात चुनाव भारत के भविष्य को तय करेगा, हमको ये भी जानना ज़रूरी है कि इस भविष्य के निर्माता हम ही होंगे। 










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