सत्ता का मृदंग बजाने वाले मीडिया से बेमानी है न्याय-अन्याय की समझ की उम्मीद करना

ज़रूरी बात , , बृहस्पतिवार , 18-01-2018


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स्पर्श उपाध्याय

जिस देश को अपने प्रधानमंत्री को प्रेस वार्ता करते देखने की आदत न हो उसे शायद 4 जजों का मीडिया से मुखातिब होना अजीब लग सकता है। देश में जिस प्रकार के हालात हैं उसमें ऐसा लगता है कि हमें 'बोलते बुद्धजीवी' मुनासिब नहीं ठहर रहे हैं। हमे हमारे न्यायाधीशों को अदालत की चार दीवारी में बैठे कैदी के तौर पर देखने की आदत हो गयी है। यह आश्चर्यजनक है की किस प्रकार से तमाम मीडिया चैनलों ने एवं कट्टरपंथी विचारधारा के लोगों ने इन जजों के प्रेस वार्ता के निर्णय को गलत ठहराया। जबकि यह देखने वाली बात है कि 4 जज मीडिया से नहीं बल्कि राष्ट्र से, मसलन नागरिकों से  मुखातिब हो रहे थे। क्या न्यायधीशों द्वारा राष्ट्र से बात करना तर्कसंगत नहीं है? क्या राष्ट्र की परिकल्पना में न्यायतंत्र की एक अहम हिस्सेदारी नहीं है? हमें यह बात समझनी होगी की जिस तरह की गंभीर शिकायतें, वरिष्ठ न्यायधीशों द्वारा जारी किये गए पत्र में की गयी हैं वो किसी प्रकर से न्यायतंत्र का अंदरूनी मामला नहीं हो सकता।

अगर मुकदमों के आवंटन में किसी प्रकार की अनियमितता की बातें जाहिर की गयी हैं तो यह कोई मामूली बात बिल्कुल नहीं है। हम यह देखते हैं कि सरकार जब 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC)' बिल लाती है तो गोदी मीडिया इस बात पर जोर देता है कि न्यायालय में कोई भी कार्य होने की, भले ही वो न्यायाधीशों की नियुक्ति क्यों न हो, प्रक्रिया आम होनी चाहिए। उसमें पूर्णतया पारदर्शिता बरती जानी चाहिए। लेकिन आज जब 4 न्यायाधीश मुकदमों के आवंटन में तर्कसंगतता बरतने और पूरी प्रक्रिया में मुख्य न्यायाधीश से पारदर्शिता रखने की बात करते हैं तो वो अचानक से उसी गोदी मीडिया के निशाने पर आ जाते हैं।

मुझे स्मरण होता है 'बड़े साहेब', जिनकी मौखिक हिफाज़त करने में गोदी मीडिया दिन रात लगा रहता है, के 1 जुलाई 2017 को दिए गए भाषण का। वो दिल्ली में चार्टर्ड अकाउंटेंट की एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा था कि, "हमें पारदर्शिता को अपनी देशभक्तिपूर्ण सेवा के रूप में देखना होगा"। मुझे उन्हीं के द्वारा दिया गया एक और भाषण याद आता है जब 16 अक्टूबर 2015 को वो 10 वें केंद्रीय सूचना आयोग वार्षिक सम्मलेन में बोल रहे थे। उन्होंने कहा था कि "सिस्टम में कमियां या तो पालिसी के कारण होती हैं या पर्सन के कारण"। वो आगे कहते हैं कि, "दूसरा होता है पर्सन के कारण, कि भई जो व्‍यक्ति वहां बैठा है उसके nature में ही है। इसलिए ऐसी स्थिति पैदा होती है वो जवाब नहीं देता है, ढीलापन रखता है, ऐसे ही चलता है। तो फिर पर्सन पर सोचने का सवाल आएगा भई। एक ही पर्सन से संबंधित इतने सारे इश्यू क्‍यों खड़े होते हैं, तो कहीं न कहीं कोई कमी होगी, उसको ठीक कैसे किया जाए? उस पर सोचना चाहिए।"

अगर पारदर्शिता की उम्मीद करना, देशभक्ति है तो हमारे 4 न्यायाधीश देशभक्ति की बेहतरीन मिसाल पेश कर रहे हैं। देशभक्ति का 'राष्ट्रीय लेबल' देना आज के मौजूदा समय में बेहद जरूरी हो गया है। गोदी मीडिया 'बड़े साहेब' के इन बयानों से न्यायाधीशों को जोड़ कर क्यों नहीं देखता, यह समझने में हमें वक़्त नहीं लगना चाहिए। दरअसल अगर न्यायाधीशों को देशभक्त करार देना पड़ जायेगा तो गोदी मीडिया का राष्ट्रीय एजेंडा पूरा नहीं हो सकेगा।

प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए दोनों बयानों को लीजिये और न्यायपालिका और 4 न्यायाधीशों द्वारा की गयी प्रेस कांफ्रेंस से जोड़ कर देखिये, क्या 4 न्यायाधीशों द्वारा मुख्य न्यायाधीश से पारदर्शिता और तर्कसंगतता की उम्मीद करना जायज़ नहीं हैं? क्या अगर 'एक ही पर्सन' से जुड़े मसले आ रहे हैं, उस पर सवाल उठ रहे हैं, तो उस पर सोचना सही नहीं है? क्या न्याय पालिका राष्ट्र का एक स्तम्भ नहीं है? 'बड़े साहेब' से मीडिया हर कुछ सीखता है, तो फिर उनकी कही हुई बातों को कैसे भूल जाता है? दरअसल चुनिंदा विरोध करने के चक्कर में गोदी मीडिया अपने 'बड़े साहेब' को नकारने में देरी नहीं करता है। या शायद ऐसा भी हो सकता है की ऐसी गुस्ताखियां सरकारी तौर पर आजकल मान्य कर दी हों।

जैसा कि हम सभी जानते हैं की ‘न्यायपालिका’, ‘विधायिका’ और ‘कार्यपालिका’, शासन/सत्ता/सरकार  के अटूट हिस्से होते हैं। भले ही तीनों स्तम्भ के कार्य करने का ढंग भिन्न हो, लेकिन पारदर्शिता और तर्कसंगतता से अलगाव किसी भी स्तम्भ में नहीं हो सकता। कल तक जो न्यायाधीश हमारे लिए 'ऑनरेबल जज साहेब' जैसे थे वो आज या तो 'कांग्रेस मुख्यमंत्री का बेटा' बन गए हैं, या 'कम्युनिस्ट पार्टी के नेता का दोस्त' बन गए हैं, या 'क्रिश्चियन धर्म का व्यक्ति' हो गए हैं। आज मीडिया में हर जगह उन्हें 'बागी' बोला जा रहा है।

अगर गौर से इस बात पर विचार किया जाए तो वास्तव में हमारा देश बहुत कठिन दौर से गुजर रहा है। जहां न्यायाधीश लाचार हो जाएँ, वहां लोकतंत्र को क्यों खतरा नहीं होगा? हमे समझना होगा, और वाकई में यह आत्मसात करना तार्किक भी है कि न्यायपालिका की बड़ी जिम्मेदारियों में से एक यह भी होती है की वह विधायिका और कार्यपालिका पर जरूरी अंकुश लगाएं और उन्हें संविधान द्वारा तय की गयी सीमाओं में बाँध कर रखें।

दूसरे शब्दों में कहूं तो विधायिका और कार्यपलिका के पास उनकी लाचारी में यह विकल्प जरूर होता है कि वो अपनी समस्याओं का हल न्यायपालिका से मांगे। लेकिन न्यायपालिका ऐसी लाचारी में किसकी ओर देखेगा? आपके मन में जो जवाब आये, वही इस प्रेस कांफ्रेंस का सीधा सा सार होगा। जनता के सामने आकर न्यायाधीशों ने लोकतंत्र की एक बेहतरीन मिसाल पेश की है जहाँ वो अराजक न होकर संयमित रूप से अपनी बात रखकर बिना मुद्दों का राजनीतिकरण किये अपने अपने काम की ओर लौट चुके हैं।

अब एक दूसरे पहलू पर गौर करते हैं; जो गोदी मीडिया जस्टिस चेलमेश्वर का कम्युनिस्ट पार्टी के नेता डी. राजा से मिलने को 'सियासी संकेत' करार देता है उसे हाल ही में (उक्त प्रेस कांफ्रेंस के बाद) मुख्य न्यायाधीश द्वारा देश की दिशा और दशा बदलने वाले मसलों पर गठित की गयी 5 सदस्यीय संवैधानिक बेंच में किसी भी 4 'बागी' न्यायाधीश को जगह न देने के मसले में कोई संदेह या सियासी संकेत नहीं मिलता। हमारा मीडिया अगर वास्तव में स्वतंत्र होता तो इस मुद्दे को उतने ही सनसनीखेज रूप से उठाता। सच और झूठ का फैसला करने न मीडिया बैठा है न मैं स्वयं, लेकिन हां इतना जरूर है कि हम अपनी चुप्पियों को चुनिंदा नहीं होने दे सकते। अगर हमे सवाल पूछने हैं, तो ईमानदारी बरतनी होगी। यही मीडिया का उचित कर्त्तव्य है।

(स्पर्श उपाध्याय कानून के विद्यार्थी हैं और जनचौक से जुड़े हुए हैं।)










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