बीजेपी के लिए राजनीतिक तुषारापात का समय

राजनीति , इलाहाबाद, बुधवार , 14-03-2018


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जनचौक ब्यूरो

अभी ठीक से बसंत नहीं बीता है लेकिन भाजपा के लिए यह राजनीतिक तुषारापात का समय है. भाजपा अपनी विजय दुंदुभि बजा ही रही थी, कि उसने त्रिपुरा में वामपंथ को धराशाई कर दिया है, मेघालय में कांग्रेस को बाहर कर दिया है, , इसी बीच उत्तर प्रदेश में लोकसभा के उपचुनाव ने उसे जोर का झटका बहुत जोर से दे दिया है.

वह फूलपुर और गोरखपुर में चुनाव हार गयी। फूलपुर में तो अफवाह थी कि खुद भाजपा का एक धड़ा चाहता था कि यहां पर भाजपा हार जाए जिससे उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या का प्रभाव कम हो जाए और योगी आदित्यनाथ के आगे खुला मैदान रहे। लेकिन यहां तो और भी उल्टा हो गया ! खुद गोरखपुर में भाजपा हार गयी। यह योगी आदित्यनाथ केलिए खतरे की घंटी है। उनकी कुर्सी खतरे में पड़ सकती है। भाजपा को अपने को बचाये रखने के लिए यदि किसी अन्य विकल्प पर विचार करना पड़ा तो वह कर सकती है।

इन दोनों सीटों को सपा ने जीता है। इस जीत का श्रेय बसपा के समर्थन को जाता है। उपचुनाव से ठीक पहले बसपा ने सपा को समर्थन दिया तो भाजपा से जुड़े लोगों ने कहा कि इस गठबंधन की गति वहीहोगी जो राहुल गाँधी  और अखिलेश यादव के गठबंधन की 2017 में हुई थी लेकिन इस बार अखिलेश यादव ने शांत चित्त होकर चुनाव लड़ा। मायावती से गठबंधन के संकेत उन्होंने सार्वजानिक रूप से कई बार दिये, दूसरी तरफ अखिलेश यादव ने कोई बड़ी गलती नहीं की।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नरेंद्र मोदी की तर्ज़ पर बड़बोलापन दिखाया और हिमाचल प्रदेश के चुनाव में जाकर कहा कि उन्होंने एक वर्ष के भीतर उत्तर प्रदेश में छह लाख लोगों को रोजगार दियाहै. उत्तर प्रदेश के युवाओं ने उनकी इस बात के लिए सोसल मीडिया रखिंचाई की। उधर नरेंद्र मोदी का पकौड़ा कमेंट था ही। एक सरकारी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि प्रदेश सरकार की उनके कोर वोटर ग्रुप तक उन योजनाओं की कोई उपयोगिता भी नहीं है जो सरकार ने चलाने का प्रयास किया है।  सरकारी कर्मचारी विभिन्न भत्तों की कटौती से अलग नाराज हैं। स्वयं इलाहाबाद शहर खुदा पड़ा है जो केंद्र और राज्य सरकार के दावों की पोल खोलता है। नकल रोकने का अभियान भी इस सरकार पर भारी पड़ा है।

भाजपा को वोट देने वाले एक नौजवान वकील ने इस बार कांग्रेस को वोट दिया और कहा कि इलाहबाद के शहर उत्तरी में पचीस प्रतिशत से कम की वोटिंग बता रही है कि पढ़े लिखे-भाजपा समर्थकों के बीच इस पार्टी कि जमीन दरक रही है। उन्होंने कहा कि निश्चित ही नीरव मोदी इफेक्ट काम कर रहा है और नरेंद्र मोदी की ईमानदारी की दलीलें अपनी चमक खो रही हैं।

विश्लेषक बताते हैं कि यह जल्दबाजी होगी कि यह कहा जाय कि भाजपा 2019 में चुनाव हारने जा रही है लेकिन अखिलेश यादव और मायावती की समझदारी ने एक ऐसे मॉडल को सामने रख दिया हैजिससे न केवल चुनाव जीता जा सकता है बल्कि इसे एक राष्ट्रीय चुनावी सफलता में तब्दील किया जा सकता है। इससे मतों का बिखराव भी कम होता है। लेकिन अभी राहुल गांधी राजनीतिक दृश्य में हैं और वे भविष्य की किसी भी राजनीतिक कार्य योजना में अपने आपको कम नहीं आंक रहे हैं।

फिलहाल भाजपा के कार्यकर्ताओं की नींद महाराष्ट्र में विकसित हुए किसान आंदोलन और उत्तर प्रदेश उपचुनाव में मिली करारी हार ने उड़ा दी है।

 






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