सहारनपुर में मायावती के भाषण के निहितार्थ

राजनीति , , रविवार , 07-04-2019


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यूसुफ किरमानी

सहारनपुर में आज यूपी के महागठबंधन की पहली रैली हुई। जिसमें बसपा सुप्रीमो मायावती के अलावा सपा के अखिलेश यादव और रालोद के अजित सिंह ने संबोधित किया। रैली में भारी भीड़ थी और काफी तादाद में लोग भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद का पोस्टर भी लहरा रहे थे।

मायावती का भाषण मुख्य रूप से मुसलमानों के वोट पर रहा। उन्होंने मुसलमानों को सावधान करते हुए कहा कि इस चुनाव में उनका वोट बंटना नहीं चाहिए। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह मुसलमानों का वोट बांटने के लिए तमाम सीटों पर मुसलमान प्रत्याशी लेकर आई हैं।

मायावती के भाषण से साफ पता चलता है कि वह बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस को लेकर चिंतित हैं। यह चिंता बड़ी है। क्योंकि मायावती और अखिलेश को पहली बार अपने ही समुदाय के वोट बैंक के एसिड टेस्ट से गुजरना पड़ेगा। इस चुनाव से साफ हो जाएगा कि कितना दलित वोट अखिलेश के प्रत्याशियों को ट्रांसफर होगा और कितना दलित वोट बसपा या रालोद के प्रत्याशियों को ट्रांसफर होगा। मायावती, अखिलेश और कांग्रेस की बचकानी हरकतों से पिछले लोकसभा चुनाव और बाद में यूपी विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटर को हाशिए पर धकेल दिया गया। उसे लगभग महत्वहीन बना दिया।

इसके बाद मुसलमानों ने अपनी रणनीति खुद ही बनाई। वो अपनी बेसिक राजनीति की तरफ लौटते दिख रहे हैं। यूपी के तमाम शहरों में प्रियंका गांधी के रोड शो में मुसलमानों की जुटती भीड़ संकेत दे रही है कि वो कांग्रेस को माफ करने को तैयार हैं और उसे फिर से अपना सकते हैं। पिछले चुनाव में जिस तरह दलित और यादव वोटरों ने सेकुलर प्रत्याशियों को धोखा देकर भाजपा को वोट दिया, उससे इनके नेतृत्व की कलई भी खुल गई। ऐसे में अगर इस चुनाव में मुस्लिम वोटर कुछ नया प्रयोग करना चाहते हैं तो मायावती या अखिलेश का चिंतित होना स्वाभाविक है।

हालांकि मुसलमानों को चाहिए कि वह हर सीट पर अलग-अलग रणनीति के तहत मतदान करे। उसे कहीं कांग्रेस तो कहीं महागठबंधन की पार्टियों के प्रत्याशियों को वोट देना होगा। बसपा, सपा, रालोद अगर कांग्रेस को निशाने पर ले भी रहे हैं तो उस पर ध्यान न दें, क्योंकि ऐसा करना मजबूरी है। भाजपा पर जिस तरह की आक्रामकता की उम्मीद महागठबंधन की पार्टियों से है, उसमें वो पीछे जा रही हैं। इस मामले में कांग्रेस ज्यादा आगे है।

इस चुनाव में अगर यूपी में कांग्रेस बेहतर कर सकी तो भारतीय लोकतंत्र और मजबूत होगा। अभी जो हालात हैं भाजपा के खिलाफ किसी एक राष्ट्रीय पार्टी का मजबूत होना जरूरी है। अगर मुसलमान राष्ट्रीय हित में किसी पार्टी को मजबूत बनाने का काम करता है तो यह उसका सही कदम है।

इस चुनाव के बाद मायावती, अखिलेश, अजित सिंह को शायद अफसोस हो कि उन्होंने कांग्रेस को कुछ सीटें देकर महागठबंधन में क्यों नहीं शामिल किया। हालांकि यूपी में कई समीकरण काम करते हैं, हो सकता है मेरी बात गलत निकले लेकिन अभी तो हालात यही कह रहे हैं।

भाजपा को हराने के लिए आपको दलित, यादवों और अन्य ओबीसी को तैयार करना पड़ेगा लेकिन जब-जब उसकी परीक्षा ली जाती है तो वह दोहरेपन का सबूत देता है। दलितों, यादवों, जाटों के प्रत्याशियों को दूसरे समुदाय के लोगों का वोट चाहिए होता है लेकिन अपना वोट वो दूसरे समुदाय के प्रत्याशियों को ट्रांसफर नहीं करते।

(यूसुफ किरमानी पत्रकार हैं। यह रिपोर्ट उनके फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।) 








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