हड़ताल प्रदेश बन गया है रमन का छत्तीसगढ़

मुद्दा , , मंगलवार , 24-07-2018


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तामेश्वर सिन्हा

रायपुर। रमन सरकार के वादाखिलाफी के चलते छत्तीसगढ़ इन दिनों हड़तालों का गढ़ बन चुका है। किसान, बेरोजगार युवा, कोटवार, शिक्षक संघ, विद्या मितान, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, स्वास्थ्य कार्यकर्ता, डाटा एंट्री आपरेटर, संजीवनी वाहन चालक, आदिवासी, पत्रकार यहां तक कि पुलिसकर्मियों के संगठन भी सड़क पर उतर आए हैं। इन सब का कहना है कि रमन सरकार ने अपने चुनावी वादे नहीं पूरे किए इसलिए उन्हें मजबूरन सड़क पर आना पड़ा है। 

हालांकि सरकार अपनी दमनात्मक कार्रवाई के जरिये आन्दोलनरियों को डरा धमका कर चुप कराने की कोशिश जरूर कर रही है लेकिन उसका कोई नतीजा निकलता हुआ नहीं दिख रहा है। और अब कोई तरकीब काम आती न देख सरकार भी परेशान हो गयी है। सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि लोकलुभावने वादे कर सत्ता में आई बीजेपी ने आखिरकार जनता से मुंह क्यों मोड़ लिया? 15 सालों से छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है। लेकिन उपलब्धियों के नाम पर गिनाने के लिए उसके पास ढेला भी नहीं है। लिहाजा अब लोगों के सब्र का भी बांध टूट गया है। और अब कोई चारा न देख जनता ने अपना वाजिब हक मांगना शुरू कर दिया है। 

आप को बता दें कि इस समय न्यूनतम मानदेय समेत अपनी कई दूसरी मांगों को लेकर संजीवनी और महतारी एक्सप्रेस के कर्मचारी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं। इनके तकरीबन 4 हजार कर्मचारी पिछले एक सप्ताह से प्रदर्शन कर रहे हैं। अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए विरोध स्वरूप उन्होंने अपना मुंडन तक कराया। 

छत्तीसगढ़ कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन भी इसी कतार में है। फेडरेशन के पदाधिकारियों ने बताया कि बीजेपी द्वारा 2013 के चुनावी घोषणा पत्र में किए गए वायदों को पूरा कराने के लिए संभाग, जिला एवं तहसील स्तर पर आंदोलन चल रहा है। कर्मचारियों की हड़तालों के चलते सरकारी कार्यालयों में ताले लग गए हैं। इस कड़ी में कई जिलों में अधिकारियों-कर्मचारियों ने रैलियां निकालीं और धरना-प्रदर्शन किए है। हालांकि कार्यालयों में कामकाज न होने से आम लोगों को तमाम किस्म की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। फेडरेशन की मांगों में सातवें वेतनमान के तहत 18 महीने का एरियर, महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी, बकाया डीए का भुगतान और पेंशन की योग्यता 33 की जगह 25 साल करना शामिल है। कोटवार एसोसिएशन भी राजधानी रायपुर में सरकार के खिलाफ वेतन वृद्धि सहित अपनी सात सूत्रीय मांगों को लेकर धरना प्रदर्शन किया। 

रायपुर में विरोध प्रदर्शन।

ये घटनाएं और आंदोलन बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार के खिलाफ जन असंतोष बढ़ता जा रहा है और सरकार के दमन के लाख प्रयासों के बावजूद वो अब दबने वाला नहीं है। पुलिसकर्मियों के परिवारों के पूरे प्रदेश को हिला देने वाले आंदोलन के बाद अब बारी सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की है। 

हड़ताल और सरकार शीर्षक से छत्तीसगढ़ के पत्रकार शैलेन्द्र ठाकुर लिखते हैं कि पिछले कुछ दिनों से हड़ताल ही हड़ताल चल रही है, सरकार और हड़तालियों के बीच रस्साकशी जारी है, और इन सबके बीच आम जनता पिसने को मजबूर है।

आखिर सरकार संविदा और अस्थाई नियुक्ति पर जिनसे काम लेती है, उन्हें अच्छा पैकेज क्यों नहीं देती? जबकि निजी क्षेत्र में भी 10 से ज्यादा कर्मचारी वाले संस्थानों के कर्मचारियों के लिए ईपीएफ कटौती और अन्य सुविधाएं देने का नियम खुद सरकार ने बनाया हुआ है। यह नियम स्वयं पर लागू करने में सरकार कतराती है। यह दोहरा मापदंड नहीं तो और क्या है? सरकार को चाहिए कि इस समस्या का स्थायी निराकरण करे। महंगाई के इस दौर में या तो पर्याप्त पैकेज देकर कर्मचारियों से काम ले या फिर उन्हें कोई दूसरा स्थाई रोजगार दिलाए।

छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने ट्वीट कर कहा है कि रमन सरकार के खिलाफ आक्रोश चरम पर है। शिक्षाकर्मी, पुलिस परिजन, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, नर्स इत्यादि के बाद हजारों अनियमित कर्मचारी भी अपने हक एवं अधिकारों के लिए सड़कों पर उतर आए हैं। हक की इस लड़ाई में कांग्रेस पार्टी अनियमित कर्मचारियों के साथ है।

(तामेश्वर अपनी जमीनी रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं और आजकल बस्तर में रहते हैं।)








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