अभी नहीं छोड़ी है सुमित्रा महाजन ने टिकट पाने की आस

राजनीति , , शुक्रवार , 05-04-2019


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अनिल जैन

इस बार लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारी हासिल करने में अब तक नाकाम रहीं लोकसभा अध्यक्ष और इंदौर की सांसद सुमित्रा महाजन ने अभी भी हार नहीं मानी हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से मिले तमाम संकेतों के आधार पर पार्टी में आमतौर पर माना जा रहा है कि उम्र के लिहाज से पार्टी के मार्गदर्शक नेताओं की श्रेणी में शुमार हो चुकीं 76 वर्षीय सुमित्रा महाजन की राजनीतिक पारी अब समाप्त हो गई है। लेकिन खुद सुमित्रा महाजन और उनके गिने-चुने करीबी कार्यकर्ता ऐसा मानने को तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि महाजन ने जहां एक ओर अपने कार्यकर्ताओं और समर्थक वर्गों के नेताओं से मिलने-जुलने का सिलसिला जारी रखा हुआ है, वहीं दूसरी ओर वे टिकट हासिल करने की कोशिशों में भी जुटी हुई हैं। 

सुमित्रा महाजन इंदौर से अब तक लगातार आठ मर्तबा लोकसभा का चुनाव जीत चुकी हैं। उन्होंने अपने संसदीय जीवन की शुरुआत 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेता और देश के गृह मंत्री रह चुके प्रकाशचंद्र सेठी को हरा कर की थी। इंदौर लोकसभा सीट पर यह भाजपा की पहली जीत थी। इससे पहले तक इस सीट को कांग्रेस की सबसे सुरक्षित सीट माना जाता था। हालांकि दो बार इस सीट पर उसे हार का मुंह भी देखना पड़ा लेकिन यह हार उसे जनसंघ या भाजपा से नहीं बल्कि वामपंथी और समाजवादी उम्मीदवारों से मिली थी।

पहली बार 1962 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दिग्गज नेता कॉमरेड होमी एफ दाजी ने और दूसरी बार 1977 में जनता पार्टी के उम्मीदवार की हैसियत से समाजवादी नेता कल्याण जैन ने कांग्रेस को हराया था। प्रकाशचंद्र सेठी इंदौर से चार बार लोकसभा का चुनाव जीते लेकिन पांचवीं बार 1989 में कांग्रेस विरोधी लहर के चलते सुमित्रा महाजन के मुकाबले हार गए। तब से अब महाजन ही लगातार आठ चुनाव जीतकर लोकसभा में इंदौर का प्रतिनिधित्व करती आ रही हैं। हालांकि इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्र की जरुरतों और समस्याओं को लेकर बहुत संवेदनशील और सक्रिय रही हैं। उनकी हर जीत में उनकी पार्टी की चुनाव मशीनरी और बेहतर प्रबंधन का तो योगदान रहा ही लेकिन ज्यादातर चुनावों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और कांग्रेस के स्थानीय नेताओं की आपसी सिर फुटौवल का भी भरपूर योगदान रहा है। 

हर चुनाव में सुमित्रा महाजन की दावेदारी पार्टी में चुनौतीविहीन रही और उन्हें आसानी से टिकट मिलता रहा। लेकिन इस बार उन्हें टिकट हासिल करने के लिए जबदरदस्त संघर्ष करना पड़ रहा है। हालांकि उन्हें कामयाबी मिलने के आसार बहुत ही धुंधले हैं, क्योंकि पार्टी ने 75 वर्ष से अधिक की उम्र वाले नेताओं को टिकट न देने का फैसला किया है। यही वजह है कि लालकृष्ण आडवाणी,  मुरली मनोहर जोशी,  भुवनचंद्र खंडूरी,  भगतसिंह कोश्यारी,  शांता कुमार और कलराज मिश्र जैसे नेताओं को पार्टी ने इस बार उम्मीदवार नहीं बनाया है। ये सभी नेता 75 वर्ष की उम्र को पार कर चुके हैं। 

सुमित्रा महाजन भी अपने जीवन के 77 वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी हैं। इसके बावजूद वे अपनी दावेदारी से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि महाजन ने पिछले एक महीने से पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थक वर्गों के नेताओं से मिलने-जुलने का सिलसिला जारी रखा हुआ है। हालांकि इसी दौरान पिछले रविवार को वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंदौर सहित देश के विभिन्न शहरों में हुए मैं भी चौकीदार कार्यक्रम में उन्होंने शिरकत नहीं की। इस बारे में उनके करीबी समर्थकों की ओर से मासूम दलील दी गई कि सुमित्रा महाजन चूंकि इस समय भी लोकसभा अध्यक्ष हैं, लिहाजा उन्होंने औपचारिक तौर पर पार्टी के कार्यक्रम में शामिल होना उचित नहीं समझा। इस बारे में इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार और स्टेट प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल का कहना है कि लोकसभा अध्यक्ष रहते हुए सुमित्रा महाजन पिछले पांच वर्षों के दौरान कभी भी खुद को पार्टी की राजनीतिक गतिविधियों से दूर नहीं रखा और अब जबकि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और वे खुद पार्टी के टिकट के लिए दावेदारी जता रही हैं, उनकी ओर से दी जा रही दलील पर कौन भरोसा करेगा? 

महाजन के समर्थकों को भी पूरा यकीन है कि इंदौर से महाजन ही पार्टी की उम्मीदवार होंगी। महाजन के संसदीय प्रतिनिधि अशोक डागा ने पिछले दिनों तो बाकायदा सोशल मीडिया में लिखा भी कि इंदौर से सुमित्रा महाजन ही चुनाव लडेंगी, कुछ लोग नाहक ही अफवाह फैलाकर भ्रम की स्थिति पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल उनके समर्थकों का मानना है कि लोकसभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद पर रहते हुए भी सुमित्रा महाजन ने पांच साल तक एक निष्ठावान कार्यकर्ता के रूप में जिस तरह पार्टी की सेवा की है और सदन में भी कई मौकों पर विपक्ष की आलोचना सहते हुए भी सरकार की मदद की है, उसके मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह उनकी दावेदारी को नजरअंदाज नहीं करेंगे। बताया जाता है कि खुद सुमित्रा महाजन भी पार्टी नेतृत्व के समक्ष अपनी सेवाओं की दुहाई दे चुकी हैं लेकिन पार्टी की ओर से उन्हें अभी तक कोई अनुकूल संदेश नहीं मिला है।

अब उन्होंने अपनी आखिरी कोशिश के तहत 'चितपावन कार्ड' का इस्तेमाल किया है। चितपावन ब्राह्मण समुदाय से आने वाली महाजन ने अपने टिकट के सिलसिले मे अपने सजातीय पूर्व राज्यपाल जस्टिस वीएस कोकजे और संघ नेतृत्व के विश्वस्त माने जाने वाले विनय सहस्त्रबुद्धे को मोर्चे पर तैनात किया। कोकजे इस समय विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष हैं और सहस्त्रबुद्धे राज्यसभा सदस्य होने के साथ ही पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की हैसियत से मध्य प्रदेश के प्रभारी हैं। दोनों ने पिछले एक सप्ताह के दौरान संघ के वरिष्ठ नेताओं के साथ ही भाजपा के संगठन महासचिव रामलाल और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से मुलाकात कर सुमित्रा महाजन को ही इंदौर से उम्मीदवार बनाने की पैरवी की है।

उल्लेखनीय है कि जस्टिस कोकजे पिछले दो दशकों में विधानसभा चुनावों के दौरान इंदौर से कुछ बदनाम 'आधुनिक जमींदारों' भू माफिया को भी भाजपा की उम्मीदवारी दिलाने के प्रयास करते रहे हैं। यह अलग बात है कि उनकी सिफारिशों को भाजपा नेतृत्व ने कभी भी तवज्जो देने लायक नहीं समझा। इसके बावजूद इस बार उन्होंने सुमित्रा महाजन को टिकट दिलवाने का बीड़ा उठा रखा है।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)








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