व्यथा राष्ट्रनिर्माता की

मुद्दा , , बुधवार , 05-09-2018


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राष्ट्र के राष्ट्रनिर्माता शिक्षकों के लिए राष्ट्र के पास "शब्दों की श्रद्धांजलि" के आलावा कुछ भी नहीं है। देश के भविष्यनिर्माताओं का भविष्य अंधेरे में दम तोड़ रहा है लेकिन राष्ट्र के भविष्य में आभा बिखेरती चकाचौंध की चाह है कि बढ़ती ही जा रही है। "आत्मा का इंजीनियर" कहलाने वाले शिक्षक आज अपने आत्मसम्मान के सहारे किसी तरह अपने अस्तित्व को बनाये रखने का प्रयास तो जरूर कर रहे हैं लेकिन उसमें भी उन्हें सिवाय नाकामी के कुछ हाथ लगता नहीं दिख रहा है।

आज जहां एक ओर विश्व के विकसित देशों में शिक्षकों को सबसे ज्यादा मान-सम्मान और सुविधाएं मिलती हैं, कई देशों में वीवीआईपी व्यक्ति के रूप में शिक्षकों को रखा गया है, वहीं हमारे देश में सरकार की नीतियों के कारण शिक्षक सबसे निरीह प्राणी के रूप स्थापित हो चुका है। आज यहां के शिक्षक जनगणना कर्मी, मतदान कर्मी, पशुगणना कर्मी, 

मध्याह्न भोजन प्रबन्धनकर्ता, पोलियो उन्मूलन कर्मी, विद्यालय सफाईकर्मी के रूप में जाने जाते हैं। आज भले ही शिक्षक दिवस के नाम पर कुछेक हजार रुपये के टिकट बांट कर कुछ धन इकठ्ठा कर लिया जाए या दिल्ली दरबार में सरकार द्वारा शिक्षकों को बुलाकर कुछेक ताम्रपत्र और प्रशस्ति पत्र बांट कर शिक्षकों को सम्मनित करने का ढोंग कर लिया जाए। लेक़िन इससे वस्तुस्थिति पर पर्दा नही पड़ सकता है। 

आज औसत सरकारी शिक्षक निर्धन, अभावग्रस्त एवं उपेक्षित है ये बात किसी से छिपी हुई नहीं है, ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करना बेमानी और हास्यास्पद ही है। मैं मानता हूं कि वर्तमान बदलते शैक्षणिक माहौल में शिक्षकों में व्याप्त खामियां भी काफी दुखद हैं लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर इसका निष्पक्ष होकर आकलन किया जाए तो इसके लिए भी सबसे अधिक जिम्मेदार सरकार की नीतियां, बदलते सामाजिक परिदृश्य की मानसिकता और अन्य कई कारण पहले दिखेंगे और शिक्षक बाद में।

दिलचस्प बात ये है कि शिक्षा के क्षेत्र में भी सरकार की नीतियां शिक्षा और बच्चों को ध्यान में रखकर नहीं बनायी जातीं बल्कि शैक्षणिक नीतियां भी वोट बैंक को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाती हैं। आज शिक्षकों को अपने हक़ और अपने सम्मान जनक जीवन के लिए हड़ताल, तालाबंदी, कार्य बहिष्कार, धरना-प्रदर्शन जैसे कार्यों को करना पड़ता है। व्यवस्था की बरसती लाठियों के सामने अपनी पीठ आगे करनी पड़ती है।

"समान काम समान वेतन" के नाम पर सरकार के पास पैसे नहीं हैं और झोला भर-भर कर नीरव मोदी, माल्या जैसे लूटेरों को देश से बाहर भेजा जा रहा है। अपनी नीतियों और अक्षमताओं को छिपाने के लिए शिक्षा के निजीकरण की दुहाई दी जा रही है। जो पूंजीवाद को बढ़ावा देने और आने वाली नस्लों को निरक्षर व निकम्मा बनाने की नवीन योजना से इतर कुछ दिखता ही नहीं है। शिक्षकों को सड़कों पर पीटकर "भारत को विश्वगुरु" बनाने की मुहिम सरकार द्वारा बड़े ज़ोर-शोर से किर्यान्वित की जा रही है।

आप भले ही शिक्षकों की जितनी आलोचना कर लें लेक़िन मेरे एक प्रश्न का उत्तर ज़रूर दें - "आज की श्रेष्ठ प्रतिभाएं इंजीनियर, डॉक्टर वगैरह-वगैरह चपरासी तक बनाना चाहतें है लेकिन शिक्षक नहीं, आखिर क्यों?" और अगर धोखे से या अति उत्साह में शिक्षक बन भी जाते हैं तो उसके जीवन मे सीखने-सिखाने की लौ को ये व्यवस्था जल्द ही बुझा देती है और आखिर में वो घिसी-पिटी प्रणाली का निरर्थक अंश मात्र बनकर रह जाते हैं। 

(दयानंद अकादमिक क्षेत्र से जुड़े हैं और आजकल मधुबनी में रहते हैं।)








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