अमीरों का राष्ट्रवाद! बड़ी तेजी से विदेश फुर्र हो रहे हैं देश के करोड़पति

विशेष , रपट, बुधवार , 07-02-2018


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लोकमित्र गौतम

साल 2015 में 4000, साल 2016 में 6000 और साल 2017 में 7000।  यह आंकड़ा है उन करोड़पतियों का जो साल दर साल बहुत तेजी से देश छोड़कर विदेश जाकर बसते जा रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि 2014 के पहले हिन्दुस्तान के तमाम करोड़पति देश छोड़कर विदेश में बसने नहीं भाग रहे थे, तब भी ये ऐसा कर रहे थे। लेकिन नवंबर, 2014 में विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अशोक सिंघल जी ने कहा था कि दिल्ली की गद्दी पर 800 सालों बाद अब एक स्वाभिमानी हिंदू सरकार आसीन हुई है, इसलिए अब देश में राष्ट्रवाद फले-फूलेगा। लेकिन यहां तो उल्टा होता लग रहा है।

न्यू वर्ल्ड वेल्थ की ताजा रिपोर्ट से हालांकि यह भी मालूम हो रहा है कि हमसे ज्यादा चीन के करोड़पति चीन छोड़कर विदेश भाग रहे हैं। हम देश छोड़कर विदेश में जा बसने वाले करोड़पतियों की संख्या में दूसरे नंबर पर हैं। लेकिन चीन से पूंजीपतियों का भागकर दुनिया के दूसरे देशों में बसना तो समझ में आ रहा है कि कम्युनिस्ट सरकार है, किसी दिन मूड खराब हुआ तो सारी पूंजी छीन सकती है। लेकिन हिन्दुस्तान से क्यों भाग रहे हैं? यहां तो कम्युनिस्टों की सरकार नहीं है। उल्टे आठ सौ सालों बाद स्वाभिमानी हिन्दुओं की सरकार बनी है, फिर इन करोड़पतियों पर राष्ट्रवाद का कोई असर क्यों नहीं हो रहा? 

गौरतलब है कि 1% हिन्दुस्तानियों के पास देश की कुल 58% सम्पत्ति है। जब से नई आर्थिक नीतियों के रास्ते पर देश चल रहा है तब से अमीर और गरीब के बीच 300 से 3200% का फासला हो चुका है। इतना कमा लेने के बाद भी अमीर करोड़पतियों में राष्ट्रवाद हिलोरे नहीं मार रहा। जैसे ही मौका मिलता है पहली फुर्सत में ये देश छोड़कर भाग खड़े होते हैं।

पिछले 14 सालों में 61,000 करोड़पति देश छोड़कर विदेश में जा बसे हैं। याद रखिये इनमें से सबके सब वह हैं जिन्होंने संपत्ति देश में यानी हिन्दुस्तान में कमाई है। बहुत सारे अब भी कमा रहे हैं लेकिन रहना उन्हें इस देश में गवारा नहीं है। केंद्र में एक राष्ट्रवादी सरकार आने के बाद अगर बंद नहीं होता तो कम से कम इस करोड़पति पलायन की रफ़्तार तो धीमी होती? लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, उल्टे रफ्ताए तेज हो गयी है। 

2016 में 2015 के मुकाबले देश छोड़कर विदेश में जा बसने वाले करोड़पतियों की संख्या में 50% का इजाफा हो गया। थोड़ी कमी के साथ लगातार अगले साल भी यह सिलसिला बना रहा। 

मन खराब करने वाली भविष्यवाणी यह है कि अभी यह सिलसिला और तेज होगा। क्योंकि हैरान करने वाली एक सच्चाई यह है कि हिन्दुस्तान का 3% ऊपरी तबका जिसमें 70% राजनेता, 97% कारपोरेट और 80 % प्रोफेशनल शामिल हैं। इनके परिवार का एक हिस्सा या एक बड़ा हिस्सा विदेशों में जा बसा है या साल के 365 में से 200 से ज्यादा दिन विदेशों में रहता है। 

न्यू वेल्थ रिपोर्ट के मुताबिक़ ये करोड़पति थोड़े नहीं अच्छे खासे धन के मालिक हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़ ये करोड़पति हाई नेट वर्थ इंडीविजुअल्स यानी अच्छी खासी निजी सम्पत्ति वाले हैं। क्योंकि 90 के दशक से जिस नई आर्थिक नीति के गुणगान गाये जा रहे हैं उससे देश में अमीरी तो आयी है लेकिन ज्यादा से ज्यादा अमीरी का फायदा एक बहुत छोटे से तबके को मिला है। इसी के बाद से भारत तेजी से धनवान देश में तब्दील हुआ है और आज धन के लिहाज से दुनिया के सबसे धनी देशों की सूची में भारत छठवें स्थान पर है। हिन्दुस्तान की मौजूदा कुल संपत्ति 8,230 अरब डॉलर है। इस सूची में अमेरिका 64,584 अरब डॉलर के साथ शीर्ष स्थान पर काबिज है। 

न्यू वर्ल्ड वेल्थ की वर्ष 2017 की रिपोर्ट में यह बात कही गई है। कुल संपत्ति से मतलब प्रत्येक देश या शहर में रहने वाले सभी व्यक्तियों की निजी संपत्ति से है। इसमें उनकी देनदारियों को घटाकर सभी संपत्तियां (प्रॉपर्टी, नकदी, शेयर, कारोबारी हिस्सेदारी) शामिल है। आज देश में 3,30,400 करोड़पति हैं। ये नई आर्थिक नीतियां ही हैं कि देश में करोड़पतियों के धन में ही नहीं उनकी संख्या में भी भारी इजाफा हो रहा है। 

पिछले साल जब देश का आम आदमी तरह तरह की आर्थिक दिक्कतों से दो-चार था तब करोड़पतियों की संख्या में 27% का इजाफा हुआ। कहने का मतलब साफ़ है कि कुछ लोगों और समुदायों को नीचा दिखाने के लिए भले पिछले कुछ सालों से राष्ट्रवाद की अलख जगाई जा रही हो,  हकीकत यह है कि प्रभावशाली और अमीर इस देश को दोनों हाथ लूटकर जितना जल्दी हो सुकून और सुरक्षा की जिंदगी जीने के लिए विदेश का रुख कर रहे हैं। मोदी जी की सरकार आने के बाद ऐसे करोड़पतियों की संख्या में तो भारी तादाद में इजाफा हुआ है। अजब है कि हिंदू सरकार का राष्ट्रवाद भी इन्हें देश में रख पाने में कारगर नहीं हो रहा। क्यों? इस पर दिल्ली और नागपुर को सोचना चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)





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