क्या कश्मीर में जनवादी एकता की पहल होगी?

राजनीति , , शनिवार , 23-06-2018


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वीना

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की नेता और जम्मू कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री रहीं महबूबा मुफ़्ती के सिर पर बीजेपी ने गठबंधन तोड़ने का डंडा अचानक दे मारा।

जब महबूबा से पूछा गया कि क्या भाजपा के सरकार के बाहर होने के फ़ैसले से उनको झटका  लगा है? तो उन्होंने कहा "नहीं, मुझे किसी बात का शॉक नहीं लगा क्योंकि ये अलायंस सत्ता के लिए नहीं था। इसका बड़ा मकसद था।"

गठबंधन पर सफ़ाई देते हुए कहती हैं कि, "लोगों के मिजाज़ के ख़िलाफ़ ये अलायंस बना था। मुफ़्ती साहब ने फिर भी ये गठबंधन किया क्योंकि केंद्र में मज़बूत सरकार बनाने वाली पार्टी के साथ हाथ मिला रहे थे। हम इसके ज़रिए जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ संवाद और पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध चाहते थे। उस समय अनुच्छेद 370 को लेकर घाटी के लोगों के मन में संदेह थे लेकिन फिर भी हमने गठबंधन किया था ताकि संवाद और मेलजोल जारी रहे।’’ 

अब महबूबा मुफ्ती ये भी कह रही हैं कि जब चुनाव हुए थे तो हमें नेशनल कांफ्रेंस ने भी समर्थन का ऑफर किया था और कांग्रेस ने भी। लेकिन हमने बीजेपी के साथ जाना चुना क्योंकि जम्मू के लोगों की जो भावनाएं थीं उनको भी शामिल करना था।

महबूबा के बयानों से एक बात समझ में नहीं आती। अगर वो जम्मू कश्मीर की भलाई के लिए बीजेपी से गठबंधन कर सकती हैं तो बीजेपी के धोख़ा देने के बाद अब उसी जम्मू-कश्मीर की भलाई के लिए उन्हें कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस नज़र क्यों नहीं आई? क्यों उन्होंने बीजेपी के गठंबधन तोड़ने के बाद ये एलान कर दिया कि वो किसी और के साथ गठबंधन में नहीं जाएंगी? 

वहीं 15 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर रही नेशनल कांफ्रेंस पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के हिसाब से अब सिर्फ़ राज्यपाल शासन ही एकमात्र विकल्प है। श्रीनगर में एक संवाददाता सम्मेलन में उमर अब्दुल्ला कहते हैं -  "नेशनल कांफ्रेंस को 2014 में सरकार बनाने का जनादेश नहीं मिला था। आज 2018 में भी हमें सरकार बनाने का जनादेश नहीं है। हम किसी भी तंज़ीम के साथ सरकार बनाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।" तब क्या महबूबा मुफ़्ती झूठ बोल रही हैं कि नेशनल कांफ्रेंस ने चुनाव के बाद उन्हें सहयोग देने की बात की थी? और अगर वो सही कह रही हैं तो अब क्या हो गया? जबकि कश्मीर को आज इन हालातों में इस गठबंधन की ज़्यादा ज़रूरत है। उमर अब्बदुल्ला साहब क्या आपके ये तेवर खुले तौर पर अपनी सत्ता लालसा की नाक को लंबी करने के लिए बेरहमी से कश्मीर की जनता को बीजेपी की धर्मान्धता का शिकार होने के लिए उनके आगे नहीं फेंक़ रहे हैं?

12 सीट हासिल करने वाली और जम्मू कश्मीर पर चौथे नंबर पर रही कांग्रेस पार्टी ने भी साफ कर दिया कि वो पीडीपी को समर्थन देने नहीं जा रही है। पार्टी नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद का कहना है -- "जो हुआ ठीक हुआ। जम्मू-कश्मीर के लोग आगे तबाही से बच गए।"  कोई गुलाम नबी आज़ाद साहब से ये पूछे कि आप अपने इन तल्ख बयानों से किसे आज़ादी दे रहे हैं? गवर्नर रूल में जम्मू कश्मीर में किसकी चलेगी? 

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी मन की भड़ास निकालने ट्विटर मैदान में कूदे और ट्वीटियाए -  "बीजेपी-पीडीपी के अवसरवादी गठबंधन ने जम्मू कश्मीर को आग में झोंक दिया। कई निर्दोष लोग मारे गए जिनमें हमारे बहादुर सैनिक भी शामिल हैं। राष्ट्रपति शासन के दौरान भी क्षति जारी रहेगी। अक्षमता, घमंड और नफ़रत हमेशा विफल होती हैं।"

तो राहुल जी को पता है कि राष्ट्रपति शासन के दौरान जम्मू कश्मीर में क्या होने वाला है? क्या ये कांग्रेस की अवसरवादिता, घमंड और नफ़रत की राजनीति नहीं है कि वो जम्मू-कश्मीर को राष्ट्रपति शासन के हवाले से बीजेपी को 2019 चुनाव के लिए भरपूर इस्तेमाल करने का मौक़ा दे रही है? 

कश्मीर की जनता पर ये वक़्त ऐसा है जिसने उसे दिखा दिया है कि चाहे पीडीपी हो, नेशनल कांफ्रेंस हो या कांग्रेस। सब जम्मू कश्मीर पर गिद्ध बन कर उड़ने को तैयार हैं। बीजेपी देश के अंधराष्ट्रवादियों के लिए - ‘‘दूध मांगोगे खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे चीर देंगे।’’ की तर्ज पर कश्मीर घाटी के बच्चों-महिलाओं, नौजवानों, बुर्जुगों का शिकार करेगी और बाक़ी तीनों गिद्ध पार्टियां इन लाशों-अत्याचारों को गिन-चुन कर अपने वोट बैंक में जमा करती जाएंगी!

अगर ऐसा नहीं है तो ये जवाब दे कि जब पीडीपी-बीजेपी का गठबंधन हो सकता है तो इन सबका क्यों नहीं? अगर ये तीनों पार्टियां अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा को भूलकर एक साथ हो जाएं तो मुमकिन है कि बीजेपी के 2019 के चुनाव के हवन कुंड में राष्ट्रपति शासन के हवाले से सैकड़ों-हज़ारों सेना के जवानों और निर्दोष आम कश्मीरियों की आहूति दिए जाने से बचाई जा सकती है। कश्मीर एक बड़े आघात-विनाश से बच जाएगा। 

आम कश्मीरियों को शिक़ायत है कि भारत को कश्मीर की ज़मीन चाहिये कश्मीरी नहीं। तो इससे बेहतर वक़्त और क्या हो सकता है उन आहत, हर मोर्चे पर लुटे-पिटे, लोगों को ये बताने का कि हमें सत्ता से नहीं कश्मीरियों से, कश्मीरियत और जम्हूरियत से मोहब्बत है। लो हम तुम्हारे साथ हैं। क्या ऐसा करना मुश्किल है? मुझे लगता है बहुत आसान है इंसानों के लिए। 

"देश हित में मोदी जी का साथ दो।" की भीख मांगना मोदी सरकार के ट्रोल और गोदी मीडिया ने शुरू कर दिया है।

जिस पाकिस्तान में बिना बुलाए घुस कर बिरयानी खाने पहुंचे, ज़बर्दस्ती नवाज़ शरीफ़ के गले पड़ गए, पेट से चिपक गए अब उसी पाकिस्तान को सबक सिखाने के जुमलों पर वोट की भीख़ चाहिए।

अम्बानी-अडानी को लाखों करोड़ क्यों दिया? कोई मत पूछो। रोज़गार कहां है? 15 लाख़ कहाँ हैं? ये बेकार के सवाल हैं। अगर कश्मीर भारत का हिस्सा है तो कश्मीरी भी भारत के नागरिक हुए। और जो जवान कश्मीर में तैनात हैं वो भी भारत के नागरिक हैं। तो भारत के नागरिक सैनिकों से भारत के कश्मीरियों को गोली-पैलेट गन से मरवाकर-अंधा, घायल कवाकर पकिस्तान से "बदला" लिया जाएगा।

अब सवाल उनसे है जो ख़ुद को कश्मीर का खैरख्वाह बताते हैं, वो अब कश्मीर के बारे क्या फैसला लेते हैं?

(वीना फिल्मकार और व्यंग्यकार हैं।)

 








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Kdsainani :: - 06-23-2018
Yes ,Arrival 370 must be abolished amicably & Kashmir should be made intigral part of India immediately ......