यूपी और बिहार को बगैर साधे नहीं बनेगी किसी की बात

राजनीति , , शुक्रवार , 15-03-2019


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दयानंद

इतिहास गवाह है केंद्र के राजसिंहासन पर विराजमान होने के लिए बिहार और यूपी का दुर्ग बहुत ही महत्वपूर्ण रहा है। वैसे भी भारतीय राजनीति में विश्लेषकों का जुमला बेहद चर्चित रहा है।

"केंद्र की सत्ता का गलियारा बिहार और यूपी से गुजरता है।"

ऐसे में साम्प्रदायिक फासीवादी शक्तियों के खिलाफ सेक्युलर और लगभग समान विचारधारा वाले दलों का लामबंद नहीं हो पाना संविधान को अक्षुण्ण रखने की मंशा रखने वाले आम जनों में निराशा ही पैदा करता है। यूपी में गठबंधन की अंतिम आस भी अब लगभग धूमिल हो चुकी है लेकिन बिहार में आशा की किरण दिखाई पड़ रही है। नवोदित राजनेता तेजस्वी यादव ने गठबन्धन को लेकर अब तक जो प्रतिबद्धता दिखाई है वो उसे एक गम्भीर राजनेता की छवि प्रदान करता है। आइए गठबन्धन के इस महत्व को समझने के लिए लगभग एक वर्ष पूर्व हुए उपचुनाव के नतीजे और उसके बाद फासीवादी ताकतों की बौखलाहट को याद करते हैं।

पूर्वोत्तर के राज्यों में बीजेपी की बड़ी जीत के बाद बिहार और यूपी के उपचुनावी नतीजे कितने महत्व रखते हैं आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर? इसे जानने के लिए सबसे पहले मैं चुनाव जीतने के बाद बीजेपी के कट्टर हिंदुत्व के नये चेहरे के रूप में स्थापित योगी आदित्यनाथ के बयान की ओर ध्यान आकृष्ट कराना चाहता हूं।

योगी आदित्यनाथ का रिएक्शन, हाव-भाव और उनका कथन बहुत कुछ बयां कर गया था उस समय। जिस तरह से सपा-बसपा गठबंधन को उन्होंने बेमेल बताने की कोशिश की थी वो उनकी बेचैनी और गठबंधन की ताकत को बताने के लिए काफी था, इतना ही नहीं उन्होंने इशारों में ही ये भी बता दिया था कि इस गठबंधन से निपटने की योजना बनायी जाएगी। विपक्षी सेक्युलर दलों की हठधर्मिता के कारण कहीं वह योजना सफल तो नहीं हो रही? आख़िर क्या है वह योजना?

◆ सत्ताधारी दल की पहली कोशिश रही सीबीआई, ईडी, आयकर विभाग सरीखी स्वायत्त संस्थाओं के दलाल अफसरों द्वारा इन नेताओं को झूठे केसों में उलझाना। यही कारण था कि विपक्षी नेताओं को इन संस्थाओं के जरिये परेशान भी किया गया। जो बिहार में लालू यादव झेल चुके हैं। उनको निशाने पर लेने की मूल वजह यह थी कि वह राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन बनाने का प्रयास शुरू कर दिए थे।

◆ इनकी दूसरी बड़ी योजना है राम मंदिर के नाम पर फिर से हिन्दू-मुसलमान के बीच दंगा कराना। ताकि पिछड़ी और दलित जातियों को हिंदुत्व के जाल में फंसा कर गठबंधन को कमजोर किया जा सके। यह बीजेपी का सर्वाधिक प्रयोग में लाया जाना वाला अस्त्र रहा है, लेकिन माननीय सुप्रीमकोर्ट के रुख और जनता के धैर्य ने उसके इस मंसूबे पर लगभग पानी फेर दिया है।

◆ इनकी तीसरी योजना है नोटबन्दी और बैंकिंग लूट द्वारा अर्जित अवैध धन के बल पर लोकतंत्र को खरीदना। और इन सबसे कुछ हो न हो लेकिन अपनी विश्वसनीयता खो चुके निर्वाचन आयोग के माध्यम से ईवीएम सेटिंग तथा भ्रष्ट सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करना।

◆ इनकी चौथी नई योजना है चाटुकार मीडिया की मदद से फर्जी राष्ट्रवाद के गूंज तले सरकार की असफलताओं को दबा देना। 

उपचुनावों में हार बीजेपी के अति आत्मविश्वास की नहीं बल्कि उसके अति अहंकार की हार थी। पिछले 26 वर्षों का किला ध्वस्त होना बीजेपी की विभाजनकारी नीतियों का परिणाम था। सबसे आश्चर्यजनक था गोरखनाथ मठ के बूथ (योगी जी का बूथ) पर बीजेपी को मात्र 43 वोट का मिलना।

अब जरा नजर दौड़ाते हैं सियासत की सत्ता के सूत्रधार राज्य बिहार की, लालू यादव को जेल भेजकर राजद को मिटाने वाली ताकतों को तेजस्वी ने एक अच्छी बात कही है। लालू यादव केवल एक व्यक्ति नहीं एक विचारधारा का नाम है। और विचारधारा कभी मरती नहीं। सुशासन बाबू द्वारा जिस तरह से जनता के मैंडेट का अपमान किया गया। उसका हिसाब होना अभी बाकी था। अररिया सीट पर बीजेपी की बढ़त का समाचार मिलते ही जिस तरह से जदयू नेता उत्साहित हुए और सुशासन बाबू का महिमामंडन करने लगे। सारे नतीजे आने के बाद वही लोग मुंह छुपाते देखे गए। 

इस चुनावी नतीज़े का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा ये रहा कि सबसे ज्यादा नकुसान कांग्रेस और जदयू को हुआ। बीजेपी जैसी साम्प्रदायिक और अहंकारी अलोकतांत्रिक तानाशाह पार्टी की हार ने निस्संदेह हर धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दल को मुस्कुराने का मौका प्रदान किया है लेक़िन कांग्रेस अपनी पीठ भी तो नहीं थपथपा पा रही थी। 

केजरीवाल को वोटकटवा कहने वाले कांग्रेसी यह नहीं बता पा रहे थे कि फूलपुर और गोरखपुर का चुनाव उनकी पार्टी क्यों लड़ी।  उस समय भी अगर कांग्रेस इन दोनों सीटों पर सपा का समर्थन करती तो पूरे देश में तमाम धर्मनिरपेक्ष दलों को एक अच्छा संदेश जाता कि साम्प्रदायिक शक्तियों के मुक़ाबले के लिए कांग्रेस कृतसंकल्प है। इसके साथ ही तमाम धर्मनिरपेक्ष दलों की अगुवाई भी कांग्रेस को आसानी से मिल जाती। परन्तु ऐसा हुआ नहीं और जो हुआ वह कांग्रेस को कतई फ़ायदा पहुचाता नहीं दिखाई दे रहा है। 

उसी समय सियासत के धुरंधरों ने अंदेशा जाहिर कर दिया था कि आगामी लोकसभा चुनाव में अगर बसपा और सपा में चुनावी गठबंधन हुआ तो कांग्रेस अपना दबाव नहीं कायम कर पायेगी।  इस गठबंधन पर कांग्रेस बैकफुट पर होगी और ऐसी स्थिति में उसे सपा-बसपा द्वारा प्रसाद स्वरूप दी गई सीट से संतोष करना पड़ेगा। ऐसे में अगर कांग्रेस सख़्ती दिखा कर महागठबंधन से खुद को किनारे कर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला करती है तो सीटों का लाभ तो मिलने की कोई बात ही नहीं होगी उल्टे धर्मनिरपेक्ष मतों के बंटवारे का इल्ज़ाम कांग्रेस के सिर जरूर चढ़ेगा।

हालांकि प्रियंका गांधी के रूप में कांग्रेस ने अपना तुरुप का इक्का भी चल दिया है, चंद्रशेखर के बहाने दलित वोटबैंक में सेंधमारी के भी प्रयास हो चुके हैं, मुलायम सिंह यादव के कारनामों ने अल्पसंख्यकों के विश्वास को भी जरूर कमजोर किया है पर अकेले लड़कर कांग्रेस अगर अपना मत प्रतिशत बढ़ाने में कामयाब भी हो गयी (जो असम्भव है ) तो इसका मतलब होगा बीजेपी को सीटों का लाभ। और ये कांग्रेस के लिए कतई शुभ संकेत नहीं होगा।

उम्मीद फिर भी है कि कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व चाटुकारों से अलग होकर अपने राजनैतिक रुख को स्पष्ट करते हुए जनता के बीच आयेगी और क्षेत्रीय दलों से लड़ने की बजाय बीजेपी को सत्ता से बेदखल करने की रणनीति पर चलेगी। राहुल गांधी की राजनैतिक भूल ने जिस लालू यादव को राजनीति से दूर करने का काम करवा लिया वही लालू यादव वर्तमान परिदृश्य में सभी क्षेत्रीय दलों में कांग्रेस के सबसे भरोसेमंद सहयोगी के रूप में अब तक साथ है। हालांकि मीडिया के गलियारों में तैरती खबरों के अनुसार वाम दलों के साथ अभी तक राजद का रवैया कुछ सवाल जरूर खड़ा कर रहा है लेकिन फिर भी बिहार में सबसे बड़ा दल होने के नाते तेजस्वी यादव ने जो सूझबूझ दिखाई है वह काबिले तारीफ़ जरूर है। देश के किसी भी प्रदेश की तुलना में बिहार में गठबन्धन की गणित सबसे ज्यादा पेचीदा है, अगर यह गणित सुलझती है और वाम दल सहित सभी उदार ताकतें एक मंच पर आती हैं तो यकीनन यह बीजेपी को सत्ता से बेदखल करने वाला राजनैतिक ब्रह्मास्त्र साबित होगा।

(लेखक दयानंद स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

 










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