लोकतंत्र के लिए यूपी यात्रा: खेतों-खलिहानों और विश्वविद्यालयों के दर्द को कर रहे साझा

इंसाफ की मांग , , शनिवार , 01-09-2018


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जनचौक ब्यूरो

लखनऊ/जौनपुर। देश राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। सत्तारूढ़ दल से जुड़े कार्यकर्ता देश भर में माॅब लिंचिंग कर रहे हैं। असहमति के स्वर को दबाया जा रहा है। दलित, महिला, अल्पसंख्यक और आदिवासियों पर हमले तेज हुए हैं। सरकार संवैधानिक संस्थाओं,राजनीतिक दलों और विश्वविद्यालयों तक को अपने इशारे पर नचाना चाहती है। इसके लिए वह हर तरह के तिकड़म और दमन का रास्ता अख्तियार कर रही है। सरकारी दमन का असर समाज पर व्यापक रूप से पड़ रहा है। इस दौर में संवैधानिक संस्थाएं कमजोर हुई हैं तो राजनीतिक दल खामोश हैं। ज्ञान -विज्ञान के केंद्रों पर हमले के साथ ही सामाजिक भाईचारे को भी नष्ट करने की पुरजोर कोशिश हो रही है। ऐसे में कई संगठन देश की संवैधानिक संस्थाओं और सामाजिक ताने-बाने पर हो रहे हमले के खिलाफ आगे आए हैं। रिहाई मंच ने कई संगठनों के साथ उत्तर प्रदेश में एक यात्रा निकाली है।

संविधान, लोकतंत्र, न्याय, समानता और बन्धुत्व की रक्षा के लिए यह यात्रा 30 अगस्त को लखनऊ से शुरू हुआ है। लखनऊ प्रेस क्लब में पत्रकारों को संबोधित करते हुए यात्रा संयोजक राजीव यादव ने कहा कि इस यात्रा का उद्देश्य गांव-कस्बों के आंदोलनों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की एक कोशिश है। यह अभियान यूपी में चार चरणों में होगा। पहले चरण में लखनऊ से प्रारम्भ होकर सुल्तानपुर, जौनपुर, आज़मगढ़, मऊ, बलिया, गाज़ीपुर, वाराणसी, भदोही, इलाहाबाद, प्रतापगढ़, रायबरेली होते हुए बुधवार, 5 सितंबर को लखनऊ में समाप्त होगा। गांव-कस्बों से होते हुए कोई दो हजार किलोमीटर का रास्ता तय किया जाएगा।

यात्रा की शुरुआत के मौके पर आयोजित प्रेस वार्ता में यात्रा से जुड़े लोगों ने कहा कि इस समय देश में  मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकारवादी नेताओं को गिरफ्तार किया जा रहा है। सरकार लोकतंत्र पर हमला कर असहमति के स्वर को कुचल रही है। ये आवाजें लोकतंत्र की नींव हैं और सुप्रीम कोर्ट ने भी इनका समर्थन किया है। गांव-कस्बों तक पहुंचकर सामाजिक न्याय, संविधान जैसे सवालों पर बात करना आज के वक्त की जरुरत है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश में अपराध, सांप्रदायिक-जातिगत हिंसा जैसे सवालों पर खुलेआम झूठ बोल रहे हैं। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि महिला संरक्षण गृहों तक में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। मानवाधिकार आयोग तक ने यूपी में मुठभेड़ों के नाम पर हत्याओं पर सवाल किया है। राजनीतिक विरोधियों और खास तौर पर दलित-मुस्लिम लोगों पर रासुका लगाया जा रहा है। आज खानपान के नाम पर भी विभाजन की कोशिश की जा रही है।  

यात्रा के संयोजक गुफरान सिद्दीकी ने कहा कि-

यूपी के बड़ा राज्य होने की वजह से दूर-दराज के गांव-कस्बों क्या, जिलों तक के सवाल सामने नहीं आ पाते। चार चरणों की यूपी यात्रा इन्हीं सवालों को उठाने की एक कोशिश है। जौनपुर, आजमगढ़, बलिया में लगातार वंचित समाज के अधिकारों पर हमले हुए हैं। यात्रा के पहले चरण में इसके अलावा बीएचयू, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, बीबीएयू के छात्रों-नौजवानों के सवाल पर भी बात होगी। पूर्वांचल कृषि संकट और बेरोजगारी से जूझ रहा है। यह दृश्य सुलतानपुर में देखने को भी मिली। स्थानीय स्तर पर युवाओं ने बढ़ते रोजग़ार के संकट और साम्प्रदायिक-जातिगत तनाव और सामंती उत्पीड़न पर चिंता ज़ाहिर की। युवाओं ने शिक्षा और रोज़गार के सवाल पर बोलते हुए कहा कि कस्बों और गांव में शिक्षा के लिए बेहतर व्यवस्था न होने की वजह से दूसरे शहरों में दाखिला लेना होता है और खर्च भी आता है। अगर आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है तो उच्च शिक्षा पर आने वाले खर्च को आम तौर पर परिवार वहन नहीं कर पाते और पढ़ाई अधूरी छोड़ कर काम धंधे में लग जाते हैं जिससे उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है। 

लंभुआ कस्बे में व्यापारियों का कहना है कि बड़ी-बड़ी कंपनियों ने हमारे ग्राहक कम कर दिए हैं। खुदरा बाजार टूट गया है। स्थानीय स्तर पर हथकरघा उद्योग बंद हो रहे हैं जिससे छोटे बाज़ार बेरौनक हो गए हैं।  

जौनपुर में दलित उत्पीड़न पर जनसुनवाई

पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर में यूपी यात्रा के समक्ष दलित उत्पीड़न के कई मामले आए। यात्रा में शामिल लोगों ने जौनपुर अम्बेडकर लीगल रिसोर्स सेंटर में दलित उत्पीड़न पर प्रेस वार्ता की।

जिले में 2017-18 से लगातार दलितों पर हो रही हिंसा एवं उत्पीड़न की घटनाओं पर बहुत मुश्किल से एफआईआर दर्ज हो रहा है। संगीन मामलों में भी गिरफ्तारी नहीं हो रही है। पीड़ितों पर उल्टे क्रास एफआईआर दर्ज किया जा रहा है, उदहारण के लिए 10 मई 2018 की घटना को अगर हम देखें तो उसमे सामंती तत्वों ने गैरी खुर्द थाना बक्शा के मजदूरी करने वाले दलित युवक अभिषेक उर्फ़ करन की चाकू मार कर हत्या कर दी लेकिन नामजद एफआईआर होने के बाद भी पुलिस अभियुक्तों को गिरफ्तार नहीं कर पायी न्यायलय में चार्जशीट दाखिल होने के बाद अभियुक्तों ने न्यायलय में आत्मसमर्पण कर जेल की राह पकड़ी।

यही नहीं वहां यह भी पता चला कि  थाना महराजगंज, चंदवक, बदलापुर, सिंगरामऊ आदि थानों की पुलिस पीड़ितों का सहयोग करने के बजाए पीड़ितों का ही उत्पीड़न कर रही है जिस कारण घटनाओं को अंजाम देने वाले लोगों का मनोबल लगातार बढता जा रहा है। थाना सराय ख्वाजा गांव नेवादा ईश्वरी सिंह में सांड को खेत से हटाने के विवाद को लेकर दलितों को एक खेत से दूसरे खेत में दौड़ा-दौड़ा मारा पीटा गया और उनके घरों में तोड़ फोड़ की गयी। यहां तक की गांव में पीएसी तैनात होने के बावजूद भी दलितों के साथ मार-पीट की घटना को अंजाम दिया गया और इलाज के दौरान ही पीड़ितों पर क्रास एफआईआर भी दर्ज कर 20 दिनों से अधिक समय तक उनकों जेलों में रहने के लिए मज़बूर किया गया। अधिकतर घरों से उस समय लोग गिरफ़्तारी के डर से गांव छोड़ कर सुरक्षित स्थानों पर चले गए थे।  

जौनपुर में दलित मुस्लिम उत्पीड़न चरम पर है और सामंती ताकतों के हौसले बढ़ें हुए हैं जिनका संरक्षण मौजूदा सरकार कर रही है। एक अन्य घटना में थाना बदलापुर में नाबालिग अल्पसंख्यक लड़की के साथ बलात्कार होता है लेकिन बेटी बचाओ का नारा देने वाली सरकार की पुलिस कोई मुकदमा पंजीकृत नहीं करती है। मुकदमा दर्ज कराने के लिए जिले के सामाजिक संग़ठनो को आगे आना पड़ता है। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के आदेश पर पुलिस एफआईआर दर्ज होती है।


 

 








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