मोदी के बनारस में गंदगी का शीर्षासन

ग्राउंड रिपोर्ट , , सोमवार , 22-04-2019


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विशद कुमार

वाराणसी। हम बीएचयू बनारस के लिए निकले थे। गाड़ी चूंकि मुगलसराय यानी पंडित दिनदयाल उपाध्याय जंक्शन से ही मुड़ जानी थी, अत: स्टेशन पर उतरने के बाद हम बाहर निकले। स्टेशन से बाहर आते ही लंका के लिए आटो मिल गया। स्टेशन का इलाका पार करते ही एक बारगी लगा कि हम झारखंड के कोलियरी क्षेत्र में आ गए हैं। ट्रकों की लंबी कतारों के बीच पूरा आकाश काले धुंध से आच्छादित था। आटो में बैठे हमने अपनी नाक और चेहरा रूमाल से ढंक लिया था।

सड़क के दोनों तरफ स्थित घरों के अगल-बगल कचड़ों के ढेर नजर आ रहे थे। गंदगी से लिपटी इन जिन्दगियों को देखकर प्रधानमंत्री मोदी का स्वच्छ भारत अभियान का पोस्टर मानो हमें मुंह चिढ़ा रहे थे। यह एहसास शायद इसलिए ज्यादा हो रहा था क्योंकि इसी क्षेत्र की जनता ने मोदी को अपना प्रतिनिधि बनाकर विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के संसद में भेजा था, जहां उन्हें प्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। बनारस की जनता को शायद इस बात का गर्व भी होगा कि उनका चुना हुआ, उनके कीमती वोट के कारण, उनके क्षेत्र का प्रधिनित्व करने वाले मोदी जी प्रधानमंत्री हैं। मगर हमें घोर आश्चर्य इस बात पर हो रहा था कि बनारस के बारे में तस्वीर बनाई थी, वह मुगलसराय से लेकर बनारस तक जाने के क्रम में कहीं नहीं दिखी। जबकि पूरा देश मोदी जी के स्वच्छ भारत अभियान और प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर मीडिया की सुर्खियों में रहा है।

आटो में बैठे और बाहर का नजारा देखते लगभग एक घंटे के सफर में हम बीएचयू के लंका गेट पहुंच गए। बता दें कि लंका गेट से पहले आटो स्टेंड है, जिसे ड्रामा सेंटर कहा जाता है, आटो वाले ने हमें वहीं उतार दिया। शाम के अंधेरे की पतली परत छाने लगी थी। मोदी जी के स्वच्छ भारत अभियान का भेद खोलती एक और तस्वीर दिखाई दे गई। उस आटो स्टैंड की बगल में खड़ी दीवार से लगकर कई लोग लघुशंका को तल्लीन थे।

हमने अपने गंतव्य तक जाने के लिए वहीं से एक रिक्शा ले लिया, क्योंकि लंका गेट और बीएचयू के कैम्पस में आटो जाने की मनाही थी। रिक्शा हमें छत्तूपुर गेट तक लाकर छोड़ गया, क्योंकि रिक्शा को कैम्पस से छत्तूपुर जाने की इजाजत नहीं थी। हम पैदल ही अपने गंतव्य की ओर बढ़े। चलने के क्रम में कहीं गहरा अंधेरा, तो कहीं बगल की दुकानों की रोशनी के सहारे, दो मकानों के बीच खाली पड़ी जमीनों पर गंदगी के साथ—साथ गायों व सुअरों की गंदगी पर कब्जे की सहभागिता देखने को मिलती रही। सड़क किनारे स्ट्रीट लाईट की कहीं कोई व्यवस्था नजर नहीं आई।

रात के आठ बज चुके थे। मेजबानी की लोकाचार के बाद हम खाना खाकर हम सो गए। सुबह एक जरूरी काम से हम छत्तूपुर गेट आए। रात के अंधेरे का एहसास, सुबह के उजाले में और भी बदसूरत हो गया था। यह देश के सबसे तेजस्वी व ओजस्वी प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है, विश्वास ही नहीं हो रहा था। ईंट की बिछी हुई सड़क के किनारे शीर्षासन कर रहीं गंदगी हमें मुंह चिढ़ा रही थी कि, इन राजनेताओं की ढपोरशंखी घोषणाओं पर भरोसा मत करो, क्योंकि इस मामले में कश्मीर से कन्या कुमारी तक भारत एक है। दिन के उजाले में भी इन कचड़ों की ढेर पर गायों व सुअरों की सहभागिता बरकरार थी। कहीं कहीं गंदा पानी भी बहता दिखाई दे रहा था। सभी लोग अपने काम में या तो व्यस्त थे या यह गंदगी उनके जीवन का हिस्सा बन गयी थी, क्योंकि किसी को इस गंदगी की कोई परवाह नहीं थी।

जैसा कि मुझे पता है, हरेक जनप्रतिनिधि का हर क्षेत्र में एक प्रतिनिधि होता है जो उस क्षेत्र की तमाम समस्याओं और विकास की जरूरतों को जनप्रतिनिधि तक पहुंचाता है। मैंने सोचा शायद प्रधानमंत्री मोदी का भी कोई सांसद प्रतिनिधि होगा, लेकिन दूसरी बार लगा शायद नहीं, शायद इसलिए कि मोदी जी तो खुद काफी तेजस्वी व ओजस्वी हैं। 

मुझे लगा कि खुद प्रधानमंत्री अपने क्षेत्र की सुध लेते होंगे, या क्षेत्र का प्रशासन तंत्र उनके क्षेत्र का विशेष ध्यान देता होगा। मगर मेरा सारा अनुमान बनारस के कुछ घंटों के अनुभव से धाराशायी हो गया। चूंकि वापस लौटने का टिकट रात की गाड़ी के लिए पहले से तैयार था और दिन भर में कई काम भी निबटाने थे, अत: एक दिन में इतने कम समय का अनुभव मोदी जी की कथनी करनी के फर्क को साफ कर दिया था।   










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Amar nath prasad :: - 04-25-2019
Unchi dukan aur fiki Palawan Bali kahavat hai