Mon. Sep 23rd, 2019

एशियन गेम्स में अर्बन नक्सलियों का हुआ पर्दाफ़ाश; रिक्शे वाले की बेटी ने जीता गोल्ड

1 min read
वीना

आप सोच रहे होंगे कि एशियन गेम्स 2018 में भारत के प्रदर्शन से अर्बन माओवादियों का क्या लेना-देना? तो मैं आपको बता दूं कि लेना-देना ही नहीं गहरा लेना-देना है। अर्बन माओवादी स्टेन स्वामी वहां झारखंड में बैठकर आदिवासियों को भड़का रहे हैं -‘‘जिसकी ज़मीन उसका खनिज’’ अब ये नारा देशद्रोह कैसे बन जाता है मैं आपको बताती हूं।

जैसे कि देश को बताया गया है कि हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बचपन में चाय बेचते थे। उनके चाय बेचने का ही परिणाम है कि आज वो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री हैं। अब आप कहेंगे कि देश में और भी बहुत से चायवाले हैं फिर तो सबको प्रधानमंत्री बन जाना चाहिये।

देश दुनिया की अहम खबरें अब सीधे आप के स्मार्टफोन पर Janchowk Android App

पर जिन चाय वालों की आप बात कर रहे हैं पता करें कि वो बचपन से ही संघ की शाखा मे जाते रहे हैं या नहीं। अपने गुरु को लंगी मारना सीखा कि नहीं। झूठ पर झूठ बोलकर भाषण फेंकना जानते हैं कि नहीं। गद्दी पाने के लिए क्रूरता की सभी हदें पार करते हुए कलेजा तनिक भी न घबराए, ऐसे 56 इंच सीने के मालिक हैं कि नहीं। अगर चाय बेचने के साथ ये सब खूबियां हैं तो फिर किसी चाय वाले को कोई प्रधानमंत्री बनने से नहीं रोक सकता।

तो, हम बात कर रहे थे कि भारत को खेलों में मिलने वाले गोल्ड मेडल कैसे साबित करते हैं कि अर्बन माओवादियों के किए गए काम देश की गरिमा के दुश्मन हैं।

स्टेन स्वामी की मांग अनुसार अगर ‘जिसकी ज़मीन उसका खनिज’ का अधिकार दे दिया गया तो क्या होगा? आदिवासी जो अब तक ज़िन्दगी की मामूली ज़रूरतों के लिए भी तरस रहे हैं, वे अंबानी-अडानी की तरह अमीर हो जाएंगे!

क्या आपने कभी सुना है कि अंबानी-अडानी, टाटा-बिरला आदि-आदि के बच्चों को फलाने स्पोर्ट्स में गोल्ड मेडल या लोहे का भी मेडल मिला हो? नहीं ना। क्यों? क्योंकि खेलना उनके बस की  बात नहीं। वो मजे़ से आरामदायक बिस्तरों पर सोते हैं। एक से एक बढ़िया खाना खाते हैं। कपड़े-जूते हर तरह के ऐशो-आराम भोगते हैं। ऐसी ऐश काटने वाले बच्चे पसीना बहाना नहीं, पसीना लूटना जानते हैं। 

अब अगर किसानों को उनकी मेहनत का भरपूर मेहनताना मिलने लगेगा, मज़दूरों को वाजिब मज़दूरी, आदिवासियों को उनकी ज़मीन के हीरे-लोहा-कोयला, खनिजों की हिस्सेदारी मिलने लगी तो गई स्पोर्ट्स की भैंस पानी में!

एशियन गेम्स 2018 में अपने यहां गोल्ड पाने वाले दो विजेताओं के उदाहरण मैं आपके सामने रखती हूं, इससे आपको सही-सही समझ आ जाएगा।

इंडोनेशिया के जकार्ता में चल रहे एशियन गेम्स में हिस्सा ले रही स्वप्ना बर्मन ने हैप्टाथ्लॉन में भारत को पहली बार गोल्ड दिलवाया है। इस मौके़ पर स्वप्ना बर्मन ने बताया –

“हाई-जंप इंवेट के लिए पैरों में सही फिट होने वाले जूते भी एशियन गेम्स के पहले मुझे नहीं मिल पाए”

“लेकिन गेम तो खेलना ही थाए सो काम चलाऊ जूतों में मैंने वो खेल खेला और देश के लिए गोल्ड जीत कर लाई”

सोचिये, अगर स्वपना मुकेश अंबानी की बेटी ईशा अंबानी होती तो सोने-हीरे की पोशाकें लटकाती, ईधर-उधर बेवजह इतराती फिरती।

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी की 21 साल की स्वपना के दोनों पैरों में 6-6 उंगलियां हैं। उन्हें सामान्य जूते फिट नहीं आते और खेलते वक़्त बहुत तकलीफ़ से गुज़रना पड़ता है। हेप्टाथलॉन में सात 7 अलग-अलग तरह के खेल  खेले जाते हैं। 100 मीटर हर्डल, हाई जंप, शॉट पुट, लॉन्ग जंप, 200 मीटर दौड़, जेवलिन थ्रो, 800 मीटर दौड़। 

मुंह में इनफेक्शन का असहनीय दर्द और पैरों में अनफिट जूतों की पीड़ा। फिर भी हर इम्तिहान पार कर स्वपना गोल्ड लेकर ही मानी। दर्द के ऐसे इम्तिहान वही बच्चे दे सकते हैं जो अभावों-अत्याचारों से गुज़रे हों। अंबानी-अडानी के बच्चे नहीं।

बॉक्सिंग में गोल्ड लाने वाले 22 साल के अमित पांघल पर एक समय ऐसा आया कि उनके पास नेशनल एकेडमी तक पहुंचने के लिए टिकट के पैसे भी नहीं थे। गांव वालों,  रिश्तेदारों से मांग कर काम चलाया।अमित का बड़ा भाई भी बॉक्सर है। पर पैसे की कमी के कारण खेल नहीं पाया। अपने खेल की कुबार्नी देकर छोटे भाई को आगे बढ़ाया। और छोटे अमित ने पिता-भाई, गांव-रिश्तेदारों के साथ-साथ देश को सम्मान दिलाकर बदला चुकाया। अंबानी के बेटे को एकेडमी जाने के लिए ना किसी से उधार लेने की ज़रूरत है ना चुकाने की टेंशन लेने की। 

दरअसल देशभक्ति ग़रीबी में ही जन्म लेती है। और अभावों में ही परवान चढ़ती है। देश के लिए मैडल लाती है। सरकारें इस सत्य को भलि-भांति जानती-समझती हैं। इसलिए आदिवासी, किसान, मज़दूरों, दलितों, अल्पसंख्यकों को अभावों-यातनाओं में जीने की ट्रेनिग देती रहती हैं। बिना रुके, बिना रहम किये।

ऐसा नहीं है कि जीतने के बाद खिलाड़ियों को चाय पिलाते हुए फोटो खिचवाने वाले खेलमंत्री राज्यवर्धन राठौर को पता नहीं होगा कि स्वपना बर्मन के पास सही जूते तक नहीं हैं। वो असहनीय पीड़ा झेलते हुए देश को गोल्ड दिलाने की जद्दोजहद कर रही है। या मुक्केबाज अमित पांघल के पास पैसे की इतनी तंगी थी कि वो नेशनल एकेडमी पहुंच ही न पाते। 

ज़रूर पता होगा। मोदी-राठौर दोनों को ये सब पता होगा। अगर मोदी का नेटवर्क एक अनाम ईमेल से ये पता लगा सकता है कि कवि वरवर राव, वकील सुधा भारद्वाज, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण फ़रेरा, बुद्धिजीवी गौतम नवलखा और वरनॉन गोंज़ाल्विस अर्बन माओवादी हैं। इन सबका भीमा कोरेगांव से कोई वास्ता नहीं पर फिर भी ये सब वहां होने वाली हिंसा के जिम्मेदार हैं। ये वो लोग है जो आदिवासियों-दलितों-वंचितों के अधिकारों के लिए बरसों से अपनी ज़िन्दगी और चप्पले अदालतों की चौखटों पर घिस रहे हैं। इन पर इल्ज़ाम है कि ये प्रधानमंत्री मोदी की राजीव गांधी की तरह हत्या कर देंगे – उस मोदी की, जो जनता के हज़ारों करोड़ रुपये सिर्फ़ अपनी सुरक्षा पर फूंक रहे हैं। और जिनके कोसों दूर तक फैले सुरक्षा घेरे में कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता।

तो, प्रधानमंत्री और उनका तंत्र ज़रूर पता लगा सकते थे स्वपना बर्मन और अमित पांघल जैसों के ज़ख़्मों-अभावो का। और सरकार के पास पैसे की भी कमी नहीं है। पर जानबूझकर खिलाड़ियों की तकलीफ़ों को दूर करने की बजाय धन मोदी के टैलेंट हंट विज्ञापन पर लगा दिया गया। क्योंकि गोल्ड लाने वाले खिलाड़ी ऐसे ही तैयार किए जाते हैं।

और ये बदमाश-देशद्रोही अर्बन माओवादी चिल्लाए जाते हैं कि इन्हें सुविधाएं दो। जल-जंगल, ज़मीन में हक़ दो। इन्हें कौन समझाए कि पढ़ने-लिखने वाले, सहूलियत पाने वाले इनके जैसे माओवादी बनते हैं। जो मनुवाद को कोसते हैं। जबकि अनपढ़, आराम से राष्ट्रभक्ति के नाम पर अपने भक़्त बनाए जा सकते हैं। मनुवाद के सिपाही बनाए जा सकते हैं। अगर सभी को बढ़िया पढ़ाई- नौकरी मिल जाए तो फिर राष्ट्रभक्त ट्रोल रोज़गार का क्या होता?

बिना रिकॉर्ड के ऐसे ट्रोल भक्त रोज़गार के लिए कोई अर्बन माओवादी आवेदन देगा क्या? नहीं ना। तो ये निकम्मे लोग हैं असल में। जो भारत के  किसी काम के नहीं। और चाहते हैं कि बाक़ी भी इन्हीं की तरह हो जाएं। और ये अंबानी-अडानी, मोदी आदि-आदि होने नहीं देंगे।

पश्चिम के विकसित देशों में सुविधाओं ने ही तो नागरिकों के संस्कृति संस्कार हर लिए हैं। भारत अभी तक इसी वजह से बचा हुआ है कि यहां नागरिकों को आज़ादी-अधिकारों की लत नहीं लगने दी।

132 गोल्ड लाकर चीन भले इतरा ले। पर उसका भी हश्र पश्चिमी मुल्क़ों जैसा ही होना है। हमने 1951 के पहले एशियाड में 15 गोल्ड जीते थे। आज 67 साल बाद भी उसी पर क़ायम हैं। ज़्यादा गोल्ड मतलब ज़्यादा लोगों की अभावों से मुक्ति। संस्कृति-सभ्यता को ख़तरा। अमित पांघल के घर में पैसों का अभाव न होता तो उसका भाई भी बाक्सिंग में गोल्ड ले आता। उसे अपने भाई के लिए त्याग करने का मौक़ा ही नहीं मिलता। त्याग जैसे महान नैतिक कर्म, अभावों में ही फल-फूल सकते हैं। 

इसलिए हे देशद्रोही अर्बन माओवादियों, तुम्हारी एक नहीं चलेगी। तुम देश के प्रत्येक नागरिक को शिक्षित-समृद्ध बनाकर यहां से त्याग-अभाव, पीड़ा सहन करने, गै़र बराबरी बर्दाश्त करने की सहन शक्ति को ख़त्म करना चाहते हो। सस्ते अंधराष्ट्रभक्त ट्रोल सेंटरों को बंद करवाना चाहते हो। तुम्हारी इन चालों को कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। केवल चोर-लुटेरे नेता-अफसरशाहों, अडानी-अंबानी आदि-आदि के परिवारों को ही आलसी होने, ऐशो-आराम भोगने की इजाज़त है।

( वीना पत्रकार, फिल्मकार एवं व्यंग्यकार हैं।)

Donate to Janchowk
प्रिय पाठक, जनचौक चलता रहे और आपको इसी तरह से खबरें मिलती रहें। इसके लिए आप से आर्थिक मदद की दरकार है। नीचे दी गयी प्रक्रिया के जरिये 100, 200 और 500 से लेकर इच्छा मुताबिक कोई भी राशि देकर इस काम को कर सकते हैं-संपादक.

Donate Now

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *