Sat. Apr 4th, 2020

शहादत सप्ताह: भगत सिंह ज़िंदा रहते महान शख़्सियतों में हो गए हैं शुमार- पेरियार

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ईवी रामासामी पेरियार और भगत सिंह।

[भगत सिंह भारत के उन चंद स्वतंत्रता सेनानियों में से हैं, जिनकी वैचारिक दृष्टि एकदम साफ थी। उन्हें 23 मार्च 1931 को फांसी पर लटकाया गया था। उनको मिली इस सजा की देश-भर में व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी। उस अवसर पर ईवी रामासामी पेरियार ने अपनी पत्रिका ‘कुदी अरासु’ में एक संपादकीय लिखा था, जो उसके 29 मार्च 1931 के अंक में प्रकाशित हुआ था। इसका तमिल से अंग्रेजी में अनुवाद वी. गीता और एसवी राजदुरई ने किया था। आगे उसका हिंदी अनुवाद दिया हुआ है।]

शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने भगत सिंह को दी गई फांसी की सजा पर दुख व्यक्त न किया हो। न ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जिसने उन्हें फांसी के तख्ते तक पहुंचाने के लिए सरकार की निंदा न की हो। इसी बीच, हम तथाकथित देशभक्तों और राष्ट्रवादियों द्वारा गांधी पर दोषारोपण (भगत सिंह की फांसी पर) करने के साक्षी बने हुए हैं। यह सब एक तरफ, दूसरी ओर हमने देखा है कि वही लोग (स्वयं-भू देशभक्त और राष्ट्रवादी—अंग्रेजी अनुवादक), एक तरफ सरकार के मुखिया मिस्टर इरविन को बधाई दे रहे हैं; दूसरी तरफ वही लोग मिस्टर इरविन से बातचीत की सहमति देने पर गांधी की प्रशंसा भी कर रहे हैं। 

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वे उसके प्रति अपना संतोष भी जता रहे हैं, साथ ही जीत का जश्न भी मना रहे हैं, ऐसे समझौते का जश्न जिसमें कहीं यह शामिल नहीं था कि भगत सिंह को फांसी पर नहीं चढ़ाया जाएगा। इसके अलावा हम देख रहे हैं कि गांधी, लार्ड इरविन की ‘महात्मा’ कहकर जय-जयकार कर रहे हैं, साथ ही वे देश की जनता को भी वैसा ही करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। हम इस बात के भी साक्षी हैं कि लार्ड इरविन गांधी को ‘महान आत्मा’ तथा ‘अवतार पुरुष’ कहकर संबोधित कर रहे हैं; और उन्हें आश्वस्त कर रहे हैं कि इस फैसले का अंग्रेजों में जमकर प्रचार किया गया है।

लेकिन उसके तुरंत बाद, उन्हीं लोगों ने ‘गांधीवाद मुर्दाबाद’, ‘कांग्रेस मुर्दाबाद’ और ‘गांधी मुर्दाबाद’ जैसे नारे भी लगाए थे। इन दिनों यह काफी सामान्य हो चला है कि गांधी जहां भी जाते हैं, लोग काले झंडों के साथ उनका स्वागत करते हैं; तथा भाषण के दौरान उनकी बैठकों में गड़बड़ी पैदा करते हैं।

इस सब पर विचार करने के बाद हम यह समझने में असमर्थ हैं कि राजनीतिक मसलों को लेकर, आम जनता की क्या राय है, और यदि वास्तव में ऐसी कोई राय है, तो उसके पीछे क्या कोई वैचारिक-निष्ठा भी है? हमें लगता है  कि उनके साथ ऐसा कुछ नहीं है। जबकि हो यह सकता है —गांधी द्वारा नमक सत्याग्रह की शुरुआत के दिन ही हमने संकेत किया कि इस आंदोलन से न तो जनता को कोई लाभ होगा, न ही राष्ट्र को। 

वास्तव में यह राष्ट्र की प्रगति तथा लोगों की स्वातंत्र्य-चेतना के लिए भी हानिकारक सिद्ध होगा। यह केवल हमारा विचार नहीं है, अपितु गांधी स्वयं साफ-साफ और खुलेआम कह चुके थे कि उनके आंदोलन का उद्देश्य भगत सिंह और उन जैसे क्रांतिकारियों की गतिविधियों में विघ्न डालना, उन्हें धूल में मिला देना है। इसके अलावा पड़ोसी देशों के प्रतिबद्ध समाजवादी और देशभक्त, जोर-जोर से चीख रहे हैं कि ‘मिस्टर गांधी ने गरीबों के साथ विश्वासघात किया है। 

उनकी गतिविधियां समाजवादी आदर्शों से दूर ले जाने वाली हैं। इसलिए ‘मिस्टर गांधी को जाना चाहिए’, ‘कांग्रेस को जाना चाहिए’। परंतु हमारे तथाकथित देशभक्त और राष्ट्रवादी, बिना किसी सोच-विचार के, और परिणामों की जरा भी परवाह किए बगैर, प्रफुल्लित थे  और उनके इर्द-गिर्द नाच-गा रहे थे। ठीक उन व्यक्तियों की तरह जो हाथों में मशाल होने के बावजूद कुंए में जा गिरे। या फिर ऐसे लोगों की तरह, जो निखालिस शर्त के वास्ते, अपने सिर को चट्टान से टकराने की परवाह न करें। 

परिणामस्वरूप वे जेल गए और जब छूटकर आए तो उनके गले में फूलों की ‘विजयमालाएं’ थीं। वे इस गर्व से फूले नहीं समा रहे हैं। फिर भी, अब, भगत सिंह को फांसी पर चढ़ाए जाने के बाद, वही लोग चिल्लाते हैं—‘गांधी मुर्दाबाद’, ‘कांग्रेस मुर्दाबाद’ और ‘गांधी को मार डालो’। इस सबके पीछे उनका उद्देश्य क्या है, हम यह समझ नहीं पा रहे हैं।

सच बात तो यह है कि ऐसे देश में जहां ऐसे मूर्ख, पागल और गैर-जिम्मेदार लोग हैं, जिन्हें केवल अपने स्वार्थ और पद-प्रतिष्ठा की चिंता करते हैं, ऐसे लोग जो अपने कार्यों के परिणामों की ओर से बे-परवाह रहते हैं—हमें यही लगता है कि बजाए लंबी उम्र जीने तथा उनके कारनामों का साक्षी बनने, कदम-कदम पर उनके द्वारा उत्पन्न बाधाओं का सामना करने, तथा कामयाबी के प्रत्येक अवसर पर यंत्रणा भोगने के—भगत सिंह के लिए अच्छा यही था कि अपने जीवन की दिशा तय कर, स्वयं को ‘शांति’ के हवाले कर दें। हमें खेद है कि हम ऐसे अंत को प्राप्त नहीं कर पाए।

असली सवाल तो यह है कि : किसी व्यक्ति ने अपना कर्तव्य पूरा किया है या नहीं? यहां हम उसके परिणामों के प्रति गंभीर नहीं हैं। हम मानते हैं कि कर्तव्यनिष्ठ-कर्म  समय और स्थान से संगति रखता है, लेकिन हम मानते हैं  कि वे सिद्धांत जिनके प्रति भगत सिंह समर्पित थे, वे समय, स्थान और कर्तव्यनिष्ठा की कसौटी के विपरीत नहीं थे। हमें यह लग सकता है कि अपने आदर्शों को मूर्तरूप देने के लिए उन्होंने जो रास्ता चुना था, शायद वह कहीं न कहीं गलत था, लेकिन बावजूद इसके हम यह दावा नहीं करेंगे कि उनके आदर्शों में ही खोट था। उनका आदर्श विश्व-शांति था।

यदि भगत सिंह ने सचमुच अपने दिल से, संपूर्ण विश्वास के साथ, अपने आदर्शों तथा उनके अनुरूप रास्ते को चुना था, यह सोचकर चुना था कि उससे उन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त करने में मदद मिलेगी—तो हम उसके कार्यों की सराहना के सिवाय कुछ नहीं कर सकते। बल्कि हम तो साहस बटोरकर यह भी कहना चाहेंगे कि यदि वे अपने चुने गए मार्ग पर चलने में असफल सिद्ध होते तो कोई मुश्किल से ही उन्हें महान व्यक्ति कह पाता। 

परंतु अब हम दावे के साथ कह सकते हैं कि वे ईमानदार शख्सियत थे। हम जोर देकर, पूरे विश्वास के साथ कहना चाहेंगे कि भारत को भगत सिंह के आदर्शों की ही आवश्यकता है। जहां तक हम जानते हैं, वे समधर्म (बहुआयामी समानता) और साम्यवाद के आदर्श में विश्वास रखते थे। इसका प्रमाण उनके द्वारा पंजाब के गवर्नर को लिखे गए पत्र के ये वाक्य हैं—

‘हमारी लड़ाई उस समय तक जारी रहेगी, जब तक साम्यवादी दल सत्ता में नहीं आ जाते और लोगों के जीवन-स्तर और समाज में जो असमानता है—वह पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती। यह लड़ाई हमारी मौत के साथ समाप्त होने वाली नहीं है। यह प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से लगातार चलती रहेगी।’ 

इसके साथ-साथ हम जानते हैं कि वे ऐसे इंसान थे, जो ईश्वर या उन चीजों में जिन्हें ईश्वर चाहता है—विश्वास नहीं रखता। हमारा विश्वास है कि इस तरह के विचारों में आस्था कानूनन अपराध नहीं है। और यदि इसे अपराध माना भी जाता है, तो किसी को भी इससे डरने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि हमारा दृढ़ विश्वास है कि इस तरह के सिद्धांत जनसाधारण को न तो किसी प्रकार की हानि पहुंचाते हैं, न ही ये उन्हें किसी भी वस्तु से वंचित करते हैं। 

यदि संयोगवश, इस तरह की संभावना भी हो कि यह सिद्धांत लोगों के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है, तब भी हम बिना किसी व्यक्ति, जाति या राष्ट्र से घृणा किए, बगैर किसी व्यक्ति-विशेष को शारीरिक कष्ट पहुंचाए, इसे जानबूझकर साकार करने का प्रयत्न करेंगे। इसके साथ-साथ, उस समय खुद को किसी भी दुख, पीड़ा, क्षोभ या बलिदान-भाव से दूर रखते हुए, हम वह सब करना चाहेंगे जिससे इस आदर्श को लोगों के जीवन में अमल होते देख सकें। इसलिए किसी को भी चिंता करने अथवा डरने की आवश्यकता नहीं है।

गरीबी के अंत की इच्छा रखने वाला विचार, अस्पृश्यता के उन्मूलन की कामना रखने वाले विचार का करीबी होता है। छूआछूत का नाश करने के लिए जैसे ऊंची और नीची जाति के बोध को मिटाना आवश्यक है, उसी प्रकार गरीबी मिटाने के लिए समाज को पूंजीपतियों और मजदूरों में बांटने वाले विचारों को दूर कर देना चाहिए । ठीक यही आदर्श समधर्म और साम्यवाद के हैं, भगत सिंह के हैं—और जो व्यक्ति इन न्यायसंगत और जरूरी आदर्शों में यकीन रखता है, स्वाभाविक रूप से कांग्रेस और गांधीवाद की निंदा भी करता है। 

लेकिन हमें यह देखकर हैरानी है कि जो लोग इन आदर्शों का समर्थन करते हैं, वे भी ‘गांधी जिंदाबाद’, ‘कांग्रेस जिंदाबाद’ के नारे लगाते हैं….जिस क्षण से गांधी ने दावा किया था कि वे ईश्वर द्वारा निर्देशित हैं, कि वर्णाश्रम धर्म दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धर्म था, और दुनिया में जो कुछ भी घटता है, उसके पीछे ईश्वरीय इच्छा होती है—हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि गांधीवाद और ब्राह्मणवाद में कोई अंतर नहीं है। और जब तक कांग्रेस, जो इस विचारधारा से ऊर्जा ग्रहण करती है, का खात्मा नहीं हो जाता—इस देश को कोई लाभ होने वाला नहीं है। अभी तक हमारे देश के कुछ ही लोग इस सत्य को स्वीकार करते हैं, उनमें इतना बोध और साहस आ चुका है कि गांधीवाद का बहिष्कार कर सकें। यह हमारी विचारधारा की बड़ी जीत है।

यदि भगत सिंह को फांसी नहीं होती, यदि वे अपने जीवन का बलिदान नहीं करते, तो (हमारी विचारधारा के लिए) ऐसी गौरवशाली जीत हासिल करने का दूसरा कोई आधार नहीं होता। यदि भगत सिंह फांसी पर नहीं लटकाए गए होते, तो गांधीवाद और अधिक महिमामंडित हो रहा होता। बजाय इसके कि जीवन को लोगों के लिए उपयोगी बनाकर, दुनिया में शांति और समानता स्थापित करने का कारण बने—आम जीवन देखते ही देखते बीमारी या दुर्घटना के कारण समाप्त होकर राख में बदल जाता है। 

भगत सिंह ने उत्कृष्ट, असाधारण और गौरवशाली मौत अपने लिए चुनी थी, जिसे साधारण इंसान आसानी से प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए हम हाथ उठाकर, अपने सभी शब्द-सामर्थ्य  के साथ और मन की गहराइयों से उनकी प्रशंसा करते हैं। इस बारे में हमारी सरकार से अपील है कि प्रत्येक प्रांत में, इसी तरह के आरोपों वाले, फांसी के लिए इसी तरह से उत्साहित और साहसी, कम से कम चार क्रांतिकारियों की पहचान कर, हर महीने उन्हें फांसी पर लटकाए।

(ईवी रामासामी पेरियार ने 29 मार्च 1931 को ‘कुदी अरासु’ में यह लेख संपादकीय के तौर पर लिखा था। वी गीता और एसवी राजदुराई ने इसका तमिल से अंग्रेज़ी में अनुवाद किया था। अंग्रेज़ी से इसका हिंदी अनुवाद ओम प्रकाश कश्यप ने किया है।) 

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