Sun. Sep 15th, 2019

पूंजीपतियों की संपत्ति में इजाफे का खेल है एनपीए

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वीना

नई दिल्ली। कहा जा रहा है कि दिन पर दिन देश की ग़रीब जनता का लाखों करोड़ रुपया अंबानी-अडानी, माल्या, चोकसी, मोदी आदि की तिजोरियों में जाकर नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट यानी एनपीए बनता जा रहा है। मेरा मानना है कि रुपये को एनपीए कहना धन-रुपये का अपमान है, उस पर कलंक है। सच्चाई ये है कि धन कभी भी नॉन परफॉर्मिंग नहीं हो सकता। अगर ओलम्पिक में धन को दौड़ाया जाए, तो सारे धावक मैडल भारत के धन की ही झोली में गिरेंगे। इतनी तेज़ रफ़्तार से दौड़ता है हमारा रुपया!

देश के बैंको से निकल कर कब स्विस और पनामा आदि-आदि हज़ारों मील दूर विदेशी बैंकों की तिजोरियों में आराम करने पहुंच जाता है पता भी नहीं चलता। मेहुल चोकसी एंटिगुआ के स्वर्ग में विचर रहे हैं। विजय माल्या इंग्लैंड में मजे़ लूट रहे हैं। नीरव मोदी शायद अभी तय नहीं कर पाए कि कौन सा देश बेहतर है चुराए धन पर पसर कर विश्राम करने के लिए। ये तो रहा विदेशों में प्रदर्शन। अब देश में रुपये का कमाल देखिये – कब लोगों की जेबों, बैंक एकाउंटों से दौड़-दौड़कर करोड़ों रुपया दिल्ली में बीजेपी के मल्टी स्टार मुख्यायल में जड़ गया किसी को भनक भी नहीं लगी। पानी पर हेलिकॉप्टर दौड़ाने का मज़ा। चुनावों में प्राइवेट जेट सभा। 600 सौ करोड़ का रफाल सौदा 1600 सौ करोड़ में आदि-आदि।और नासमझ लोग हैं कि फिर भी रुपये-पैसे पर एनपीए की तोहमत लगाए जाते हैं!

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अब लोग कहेंगे कि पैसा अगर इतना ही मेहतनी है तो जितनी तेज़ी से नेताओं-अफ़्सरानों, उद्योगपतियों के ठाट-बाट में लग जाता है देश के टैक्स देने वाले नागरिक-वोटर की सेवा वैसी मुस्तैदी से क्यों नहीं करता? क्यों किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हैं? क्यों मेहनतकश-मज़दूर भूखा-नंगा फुटपाथों पर पड़ा सड़ता है? जिनके ज़हन में ऐसे बेकार ख़्याल आते हैं क्या वो नहीं जानते कि –

‘‘पैसा पैसे को खींचता है।’’ये सिर्फ़ एक कहावत नहीं सच्चाई है। अंबानी-अडानी, मोदी, चोकसी, टाटा-बिड़ला आदि-आदि पहले पार्टियों के चुनाव प्रचार में नोटों की गड्डियों पे गड्डियां  फेंकते हैं। जीत-हार की रेस लगाने वाली पार्टियों के कुर्तें-सूटों के पीछे इन गड्डियों के मालिकों से किए गए कसमें-वादों की चिप चिपकी रहती है। जो भी सरकार में पहुंचे उसे आम लोगों के ख़ज़ाने तक इस चिप को पहुंचाना होता है। सरकार और उसके कारिंदे जिधर, जिस सरकारी महकमें-ख़जाने में जाते हैं ये चिप वहां रखी बाक़ी गड्डियों को खींचकर अपने मालिक तक पहुंचा देती हैं। 

तो पहले पैसा इनवेस्ट करना पड़ता है। किसान-मज़दूर सोचते हैं कि उनका खून-पसीना, महीनों-सालों की मेहनत से सींची फसल पैसा खींच लाएगी! ऐसा सोचना-मानना उनका बचपना नहीं है तो और क्या है? ग़लती आपकी है कि इतनी छोटी सी बात आपको समझ नहीं आती मज़दूरों-किसानों कि पैसा पैसे को खींचता है। इसके लिए चिल्ला-चिल्लाकर सरकारों को दोष क्यों देते हो?

जो पैसे से पैसा बनाना जानता है उसी को जीने का और शान से जीने का हक़ हासिल है। अभी तक यही दस्तूर है दुनिया में। मज़दूर-किसानों, आदिवासियों में अगर इतनी बुद्धि नहीं है कि पैसे को खींचने के लिए पैसा कहां से जुटाया जाए तो ज़िन्दा तो वो रह नहीं पाएंगे। खुशहाल जीवन की तो कल्पना ही नाजायज़ मांग है।

अब क्योंकि जी नहीं सकते तो ज़ाहिर है मरना पड़ेगा। यहां पर बीजेपी सरकार ग़रीब वोटरों के वोट का एहसान चुकाने के लिए एक मौक़ा मुहैया करवा रही है। हाय पेट्रोल महंगा कर दिया…हाय गैस की क़ीमते बटुए में छेद कर रही हैं…हाय भूखे मर गए…कफ़न भी न मिला…आदि-आदि रोना रोकर कुत्ते की मौत मरने से बेहतर है कि राष्ट्रवादी, देशभक्त बनकर, एक-दूसरे का गला, हाथ-पैर काट-पीसकर शहीदों की गौरवपूर्ण मौत मरो। ऐसी मृत्यु की इच्छा रखने वालों को सरकार शहीद का तमगा देगी और साफ़-सफ़े़द कफ़न भी मुहैया करवाएगी।

अगर कोई सरकार की इस स्कीम को अपनाता है तो उसे ऐसी कुछ डिमांड रखने का अधिकार भी मिल सकता है जिसे सरकार ख़ुशी-ख़ुशी मान ले। मसलन जैसे अंग्रेज़ों ने हिंदुस्तानियों को मरवाकर उनका नाम इंडिया गेट पर ख़ुदवा दिया। ऐसा कोई गेट-वेट बनवाने की मांग पर ग़ौर किया जा सकता है। रोज़गार-रोटी की हाय-तौबा छोड़ने पर इतना हक़ तो बनता है।

इस स्कीम को चुनने वालों के लिए सरकार एक और सुविधा दे रही है। जो वोटर अब मोदी-शाह, योगी, सिंघल, कटियार, भागवत, आडवानी-अटल आदि के जान दांव पर लगाऊ, भाषणों से बोर हो चुके हैं, जान गंवाने से परहेज़ करने लगे हैं। या मज़ा नहीं आ रहा जान देने में अब और मजबूरन रोज़गार-व्यापार की बात कर रहे हैं। पाकिस्तान-हिंदुस्तान में शांति बहाली की तरफ़ जिनका ध्यान भटकने लगा है। 

ऐसे भूखे-प्यासे-नंगे कुत्ते की मौत मरने वालों को फिर से पूरे जोशो-ख़रोश से सिर उठाकर क़त्ल होने के लिए तैयार करने का हुनर रखने वाला पाकिस्तानी मूल का, हिंदू धर्म का मुरीद, मुसलमान जमूरा कनाडा से आयात किया गया है।

ये जमूरा आजकल गली-गली यलगार कर रहा है कि रोटी-रोज़ी मांगकर हिंदू जात को शर्मिंदा करने से अच्छा है की पाकिस्तान पर चढ़ाई कर दो। जो हिंदुस्तानी मुसलमान उसकी तरह मुसलमान होते हुए भी दिल से हिंदू नहीं है, वंदे मातरम न बोले, उसका नामोनिशान मिटा दो। जब तुम ऐसा प्रण ले लोगे तो भूख-प्यास का एहसास खतम हो जाएगा। कायर हिंदू और एहसान फ़रामोश मुसलमान जिंदा नहीं बचेगा। और इन्हें जहन्नुम पहुंचाकर जो चंद बहादुर जन्नत के हक़दार बच जाएंगे उन्हें मनुस्मृति के अनुसार वर्ण कतार में लगाकर उनका लोक-परलोक सफल बनाया जाएगा।

जो लोग कनाडियन जमूरे के इस उपदेश से इत्तेफ़ाक नहीं रखते और ग़रीबी-गुरबत से परेशान हैं। और जिन्होंने नोटबंदी का मज़े ले-लेकर इसलिए समर्थन किया था कि उन्हें लूटने वाले, काला धन जमा करने वालों पर गाज गिरेगी। वो भी लाईनों में खड़े होंगे और उनकी काली कमाई मोदी साहेब उनमें बांट देंगें पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। और अब ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उनके लिए मेरी राय है कि मोदी की धोखेबाज़ी की सज़ा इस जमूरे को न दें। इस पर विश्वास करें। सभी ग़रीब-गुरबे हिंदू-मुसलमान, सवर्ण-दलित-पिछड़े,आदिवासी एक-दूसरे को मारकाट कर ख़त्म कर लें।

ऐसा क्यों करें? इसलिए कि अंबानी-अडानी, टाटा-बिड़ला आदि-आदि जिनकी एक सेकेंड-मिनट-दिन की कमाई लाखों-करोंड़ों-अरबों में बताई जाती है और जो बड़ी शान से सस्ते नौकरों की बदौलत, किसान-मज़दूर के दम पर अपने आलीशान कमरों में बैठ पैसा बटोरने वाली लूट की योजनाएं बनाते हैं। जब कोई जी-हज़ूरी के लिए बचेगा ही नहीं तो इन्हें अपने घर का झाड़ू-पोछा, संडास तक खुद साफ़ करना पड़ेगा। खाने के लिए अनाज चाहिये तो ख़ुद खेत में पसीना बहाना पड़ेगा। 

चिनाई-पुताई-प्लमबरिंग, एक-एक काम ख़ुद करना होगा। और आखि़रकार ये भी आप लोगों की तरह मज़दूर-किसान बनने में अपना सारा वक़्त ज़ाया करेंगे। पढ़ने-लिखने, सोचने, डकैती की योजनाएं बनाने का वक़्त ही नहीं बचेगा। ऐसे में इनका वक़्त भी आपके वक़्त की तरह कोडियों का हो जाएगा। क्योंकि पैसा जो इनके घरों-बैंकों में ठुसा पड़ा है वो पैसे को ही तो खींच सकता है। उन मज़दूर-किसानों को बेगारी के लिए जिंदा नहीं कर सकता जिन्होंने कब्रों-चिताओं को अपनी हर ज़रूरत का सामान बना लिया हो।

(वीना पत्रकार,फिल्मकार और व्यंग्यकार हैं।)

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