तुलसीराम के जन्मदिन पर विशेष: ‘मुर्दहिया’ में भूख, ग़रीबी और अंधविश्वास के चित्र

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डॉ. तुलसीराम।

भारतीय साहित्य में अपनी पहली ही कृति आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ से तुलसीराम हिन्दी साहित्य और दलित साहित्य में कालजयी लेखकों की प्रथम पंक्ति में शामिल हो गए। इसका कारण उनका एक दलित होने के कारण स्वयं भोगे भूख-गरीबी, कष्ट, दारूणता, भय, उपेक्षा, घृणा, अंधविश्वास, करूण हास्य-विनोद, उपहास, जुगुप्सा, त्रासदी, ताने-उलाहने, प्रेम, स्नेह, निराशा और आशा से भरे जीवन और अन्य ग्रामीण दलितों के जीवन को एक मानवीय संवेदना और सहानुभूति को सबके सामने ज्यों का त्यों ऐसे रख दिया है मानो जैसे किसी विरले नाविक ने नदी की अतल गहराइयों में डुबकी लगाकर, बरसों से डूबे एक दुर्लभ महाकाव्य को, नदी से निकालकर दुनिया के सामने उसकी कटी-फटी धुंधली तस्वीरों और उसकी कथाओं के पूरे मर्म और जिद के साथ सबके सामने उपस्थित कर दिया हो। 

तुलसीराम अपनी आत्मकथा मुर्दहिया में बार-बार भोगी हुई गरीबी, भूख और अंधविश्वास के दारूण चित्र उकेरते हैं। इससे बड़ा विडंबनापूर्ण और वेदना में डूबा तथ्य क्या होगा कि कोई लेखक अपनी आत्मकथा की शुरुआत ‘मूर्खता मेरी जन्मजात विरासत थी’ जैसे वाक्य से लिखने पर मजबूर हो जाए। और इस निहित वाक्य लिखने के पीछे अनेक कारणों में से एक कारण यह भी है कि जब लेखक अपनी उम्र का अधिकांश हिस्सा गुजारने के बाद, अपने पूरे जीवन पर फिर से एक नजर मारने पर हर समय, हर पल, हर क्षण उसे अपने और अपने समाज की दुर्दशा और बेबसी के पीछे छिपी ब्राह्मणवादी साजिश, नफरत और जाति की गजालत में बीते चित्र ही दिखाई देते हैं।

समय बदलने पर आज़ादी के अनेक वर्ष बीतने पर भारत में कुछ नहीं बदला, बल्कि जातीयता की भावना अपने क्रूरतम रूप में रोज हमारे सामने आ रही है। अपनी आत्मकथा के पहले पृष्ठ पर तुलसीराम एक भारतीय की विशेषता बताते हुए कहते हैं- “लगभग तेईस सौ वर्ष पूर्व यूनान देश से भारत आए मिनान्दर ने कहा कि आम भारतीयों को लिपि ज्ञान नहीं है, इसलिए वे पढ़- नहीं सकते”। आगे वे कहते हैं- “हकीकत तो यह है कि आज भी करोड़ों भारतीय मिनांदर की कसौटी पर खरा उतरते हैं। सदियों पुरानी इस अशिक्षा का परिणाम यह हुआ कि मूर्खता और मूर्खता के चलते अंधविश्वासों का बोझ मेरे पूर्वजों के सिर से कभी नहीं उतरा”। (पेज 9) 

    तुलसीराम के इस कथन में दो बातें स्पष्ट दिखाई देती हैं। एक तो वे जाति और वर्ग के आधार पर भारतीय लोगों के उत्पीड़न व अंधविश्वास की मूल वज़ह अशिक्षा बताते हैं तथा उनकी आम भारतीय की अवधारणा केवल दलित-समाज तक सीमित न रहकर एक पूरे शोषित दमित उत्पीड़ित तबके की बात करती है। शिक्षा पर एकाधिकार कायम रखते हुए वर्चस्वकारी ब्राह्मणवादी ताकतों ने धर्म और पाखंड का जाल बिछाकर अशिक्षित रखे गए आम भारतीय जनता जिसमें भारत के मजदूर, किसान स्त्रियां और दलित शामिल हैं उनको हजारों सालों से अपना शिकार बनाया और वर्ण व्यवस्था के हथियार से इस पूरे वर्ग का खूब दमन-उत्पीड़न किया। 

आत्मकथा के पहले पृष्ठ पर ही तुलसीराम अपने दादा के एक भूत के द्वारा लाठियों से पीट-पीट कर मार डाले जाने की बात बताते हैं। लेखक के दादाजी मटर के खेत में मटर खाती साही को मार भगाते हैं और बाद में वही साही मटर के खेत में रखवाली के लिए सोते हुए अपने साथियों के साथ तुलसीराम के दादा को लाठियों से हल्ला बोलकर उन्हें पीट-पीट कर मार डालती है। तुलसीराम इस अंधविश्वास की गुत्थी अपनी आत्मकथा में कुछ यूं खोलते हैं, “तर्कसंगत तथ्य तो शायद यही होगा कि दादाजी की  गांव में ही किसी अन्य व्यक्ति से अवश्य ही दुश्मनी रही होगी और उसने साही भूत का मनोवैज्ञानिक बहाना निर्मित कर उन्हें मार डाला हो”।

इसके बाद जब दादी अपने विक्टोरिया वाले सिक्कों को तुलसीराम से गिनवाते समय यह भी बताती हैं कि ये सारे सिक्के एक-एक करके दादाजी ने दादी को छिपाने के लिए दिए थे तब उस समय इस अंधविश्वास के कुछ और पेंच खुलते हैं। दरअसल किसी भी तरह का भय या डर चाहे वह भूत-प्रेत का या हो देवी-देवता का या फिर किसी तरह के रीति-रिवाज व प्राकृतिक आपदा के, यह सारे के सारे तरीके कमजोर वर्गों को नियंत्रण में रखने की एक ऐसी अचूक व्यवस्था है जिसमें फंसकर दलित, शोषित, दमित तबका हमेशा नियंत्रित और उनका गुलाम बनता आया है। अंधविश्वास, पाखंड, अशिक्षा, अज्ञान के जाल में फंसाकर सवर्ण तबकों ने हमेशा दलितों की तरक्की, खुशहाली और उनको वैज्ञानिक सोच से रोकने की कोशिश की है। 

लेखक जब तीन साल का हुआ तो गांव में चेचक का प्रकोप हुआ और उस चेचक के प्रकोप को दूर करने के लिए साफ सफाई का ध्यान रखने व डॉक्टर के पास न जाकर, सारे गांव के लोगों ने चमरिया मैय्या और शीतला माता की पूजा कर तरह-तरह का पुजौरा चढ़ाया। समय पर स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों के अभाव के चलते बालक तुलसीराम की एक आंख खराब हो गई। फिर भी अंधविश्वास के गड्ढे में डूबी जनता यह मानती रही कि चलो आंख ही तो गई, बच्चा तो देवी देवता के प्रकोप से बच गया। यह कहानी अक्सर गरीब दलितों के घर की आम कहानियां है जहां अशिक्षा का अंधकार कूट-कूट कर भरा हुआ है।

हमारे समाज में एक स्वस्थ व्यक्ति की धारणा में एक ऐसा व्यक्ति पूर्ण या सुन्दर माना जाता है जो अपने सुन्दर रंग रूप के साथ, शरीर के पूरे अंगों के साथ स्वस्थ शरीर वाला हो। उसके मुकाबले किसी भी तरह का अंग-भंग होने पर अंधविश्वासी और अज्ञानी समाज द्वारा उसे अशुभ घोषित कर दिया जाता है। ऐसा करके ही समाज को चैन नही पड़ता बल्कि बार-बार ऐसे व्यक्ति को कोंच-कोंच कर उसकी अक्षमता का बोध कराया जाता है। ऐसे लोगों के प्रति तथाकथित स्वस्थ लोगों की संवेदनहीनता अपनी पराकाष्ठा पर होती है। 

गांव में बालक तुलसीराम, निर्वंश विधवा ब्राह्मणी और अस्सी वर्ष के कुंवारे जग्गू पांडे गांव में अपशकुनों की श्रेणी में गिन लिए गए। किसी भी तरह के शुभ मान लिए गए कार्य जिनमें शादी-विवाह, पूजा-पाठ शामिल है, उनसे इन्हें दूर रखा जाता था। गांव में होने वाली हर खराब बात के लिए यह लोग जिम्मेदार ठहरा दिए जाते थे। बालक तुलसी राम के साथ तो उनके ही चाचा ने उनकी एक आंख खराब होने पर बहुत अपमानित किया और हमेशा उनका मजाक बनाया और मजाक उड़ाया।

एक अन्य अंधविश्वास के चलते और दूसरे ब्राह्मणों की चालाकी के चलते खेतों में काम करने की खातिर ब्राह्मण जमींदारों ने गांव के दलितों को बंधुआ मजदूर बनाए रखने के लिए अपने खेत में जबर्दस्ती काम करवाने के लिए, खेती छोड़ना यानी ब्रह्म हत्या करने जैसा पाप करने का अंधविश्वास पैदा कर दलितों के मन में भय बैठा दिया, ताकि वे सस्ते मजदूर बनकर तमाम उम्र इन ब्राह्मण जमींदारों के खेत में सारे अत्याचार सहते हुए, भूखे प्यासे रहकर भी काम करते रहें, और यह जमींदार इन गरीब दलित भूमिहीन किसानों की मेहनत पर हमेशा मौज-मस्ती करते रहे।

गांव मे और बाकी समाज में जिस तरह लोगों के जन्म-मरण शादी-विवाह, पूजा-पाठ, खोने-पीने आदि के अवसरों पर अंधविश्वास ने अपने पैर जमा रखे हैं उसे न केवल उखाड़ना अपितु हिलाना तक असंभव है। विज्ञान के युग में जिस तरह अवैज्ञानिकता को पोसते हुए अभी तक पंचांग- पोथी दिखाकर साइत निकलवाने का प्रचलन घटने की जगह बढ़ रहा है वह बहुत चिंतनीय बात है। गांव के लोगों को अंधविश्वास है कि अमिका पांडे की पोथी पतरा को देवलोक से स्वयं ब्रह्मा जी ने गिराया है। और उसी पतरा में सारे वेद पुराण छिपे हुए हैं। अमिका पांडे जैसे लोग इतने चालाक हैं कि वे चंद्रग्रहण से लेकर सूर्यग्रहण और सारे व्रत त्यौहार शहर से लाए कैलेण्डर से देखकर बताते हैं लेकिन गांव के भोले-भोले लोग समझते हैं कि वह बहुत विद्वान हैं।

अंधविश्वास का एक भयानक रूप अफवाहें भी होती हैं। एक बार गांवों में अफवाह फैली कि “नौ ग्रह एक साथ मिलने वाले हैं। गांव में महामारी आयेगी और बड़े पैमाने पर लोग मरेंगे कटेंगे। बाप बेटा को कुछ नहीं समझेगा, औरत बेटा-बाप को, न मां बेटा- बेटी को और न बेटा बेटी मां को । आपस में कोई रिश्ता नहीं रह जायेगा। सभी एक दूसरे के पीछे पड़ जायेंगे और शीघ्र ही सारी दुनिया बर्बाद हो जायेगी”। इसी तरह के अंधविश्वास में फँसाए गए लोग जो छोटी-छोटी बातों को सामान्य ज्ञान या अनुभव जन्य बात से भी बुरी तरह घबरा जाते है, इसका बहुत सजीव चित्रण तुलसीराम ने किया है। कभी-कभी आसमान में कोई उल्टा पिंड गिरने पर लोग कहते, ”आसमान से भूत इधर-उधर दौड़ते हैं और जब अंधेरे में दिखाई नहीं देता तो अपना मुँह बाते हैं जिससे आग निकलती है और उन्हें दिखाई देने लगता है।”

दलितों को गांव से दूर भगाने, उन पर गांव के दक्षिण में अपनी बस्ती बसाने या ‘दक्खिन टोली’ बनाने में भी सवर्णों का यही जहरीला अंधविश्वास काम करता है। हिन्दू लोगों के अपने अंधविश्वास, और उससे उपजा भयानक डर, जिसमें हमेशा खुद का और अपने परिवार की जान-माल-सुरक्षा का खतरा केन्द्र में होता है इसका पर्दाफाश करते हुए तुलसीराम कहते हैं, “एक हिन्दू अंधविश्वास के अनुसार किसी गांव में दक्षिण दिशा से ही कोई आपदा बीमारी या महामारी आती है, इसलिए हमेशा गाँव के दक्षिण में दलितों को बसाया जाता था”। गांव में दलितों के साथ भेदभाव- छुआछूत और नफरत करने की अमानवीय भावना, गांव में सवर्णों के मन में बैठे स्वार्थ, उनकी साजिश और उनकी दलितों के प्रति क्रूर संवेदनहीनता की पोल खोलता है। 

गांवों के लोगों में बैठा अंधविश्वास कि अकाल मृत्यु प्राप्त होने वाले लोग भूत बनते हैं और ऐसे लोग अपनी शेष उम्र भूत बनकर बिताते है। मुर्दहिया आत्मकथा की महानायिका लेखक तुलसीराम की दादी बालक तुलसीराम को बताती हैं कि “महामारी में मरने वाली औरतें नागिन बनकर घूमती हैं। उनके काटने से कोई भी जिन्दा नहीं बचता”। जुगनुओं के जलने बुझने को भी गांव वाले भूतों के चिराग समझकर डर जाते हैं। भूतों पिशाचों आदि को लेकर गांव में बहुत कल्पनाएं थीं खासकर गांव की दलित औरतों को लेकर। उन्होंने बताया कि “मेरी दादी की तरह अनेक औरतें कहती हैं कि भूतों के पोखरे पर जब पंचायत होती है, तो उल्लू कुडुकते हुए शंख बजाते हैं जिससे पता चलता है कि ब्राह्मण भूतों की पंचायत हो रही है। कौए की चोंच मारना, उल्लू का बोलना, खो खो करने वाली मरखड़की चिड़िया का बोलना आदि सबके सब गांव में जानकारी के अभाव में अपशकुन मान लिए गये थे”। 

मुर्दहिया में अंधविश्वास के कारण घटी एक ऐसी मार्मिक घटना का वर्णन तुलसी राम ने किया है जिसको पढ़कर दिल हिल जाता है। गांव के ही सुदेस्सर पांडे की बूढ़ी मां का देहांत ‘खरवांस’ यानी बहुत अपशकुन माने जाने वाले महीने में हो जाता है। हिन्दू धर्म के खरवांस के बारे में फैले अंधविश्वास के चलते गांव के पट्टीदार अमिका पांडे ने ‘पतरा’ देखकर बताया कि अभी पंद्रह दिन खरवांस है इसलिए मृत मां का दाह संस्कार नहीं हो सकता। यदि ऐसा किया गया तो माता जी नर्क भोगेंगी।

अमिका पांडे के सुझाव अनुसार मृत माताजी की लाश को मुर्दहिया में एक जगह कब्र खोदकर गाड़ दिया जाए तथा पद्रंह दिन बाद निकालकर लाश को जलाकर दाह-संस्कार हिन्दू रीति से किया जाए।” इस तरह के अंधविश्वास के कारण गांव में एक बूढ़ी स्त्री की लाश के साथ जितनी दुर्गति हो सकती थी, हुई और अंतत: लाश बिल्कुल सड़-गल गई। उस सड़ी लाश से उठती बदबू न सह पाने के कारण उसे जलाने के लिए उस बूढ़ी औरत का खुद का सगा बेटा सुदेस्सर पांडे लाश के पास से भागकर दूर जा खड़ा हुआ और आखिरकार लाश को जलाने का काम लेखक तुलसीराम और उनके पिता को ही करऩा पड़ा”। 

मुर्दहिया में अनेक जगह भूख और गरीबी के बेहद मार्मिक चित्र हैं जो यकायक मन को परेशानी के गर्त में धकेल देते हैं। क्योंकि लेखक गांव के अन्य दलितों के साथ स्वयं भी भूख और गरीबी की भयंकर मार सहता रहा है, इसलिए इन चित्रों में विश्वसनीयता और वर्णन में छिपा दुख किसी से छिपा नहीं रहता। हमेशा से भूख और गरीबी का जाति के साथ अटूट संबंध रहा है। जाति से अछूत बना गए एक पूरे दलित वर्ग को हजारों सालों से कभी ढंग का, पूरा और पौष्टिक खाना नसीब नहीं रहा है।

मरे जानवरों का मांस खाना, घर-घर जाकर झूठन इकट्ठा करके खाना, चूहे खाना आदि इसी बात का सबूत है। “बरसात के दिनों में भुखमरी की स्थिति पैदा हो जाती । शुरू-शुरू में जब तेज बारिश से कट चुकी फसलों वाले खेतों में पानी भर जाता तो, उनके अंदर बिल बनाकर चूहे डूबते हुए पानी की सतह पर आ जाते थे। गांव के बच्चे तरकुल या खजूर के पत्तों से बनी झाडू लेकर उन चूहों पर टूट पड़ते थे तथा उन्हें मार मारकर ढेर सारा घर लाते थे।” इसी तरह “बरसाती मछलियां भी उस गरीबी में बड़ी राहत पहुंचाती थी”। 

दलित समाज में हमेशा खाने की कमी से जितने कष्टकारी दिन बीतते हैं उससे कहीं अधिक सर्दी की रातें बीतती हैं। तुलसीराम के घर में सर्दी से बचने के लिए एक भी रजाई या कंबल नहीं थी। वो एक जगह कहते हैं, “वैसे भी घर में कपड़ों की कमी हमेशा बनी रहती। मेरे पिता जी जो पूरी धोती कभी नहीं पहनते थे। वे एक ही धोती के दो टुकड़े करके बारी-बारी पहनते। ओढ़ने का कोई इंतजाम न होने से गांव के लगभग सारे दलित रात को ठिठुरते रहते। हमारे घर में सोने के लिए जाड़े के दिनों में फर्श पर धान का पैरा अथवा पुआल बिछा दिया जाता। उस पर कोई लेवा या गुदड़ी बिछाकर हम धोती ओढ़कर सो जाते। इसके बाद मेरे पिता जी पुन: ढेर सारा पुआल हम लोगों के ऊपर बिछा देते। जाड़े की ऐसी दुर्दशा पर दलित बच्चे धूप में बैठकर गाते – अर्जुन, भीम नकुल सहदेवा- ओढ़त लुगरी बिछावल लेवा।”

अपनी उस गरीबी में ठंड से ठिठुरते दिनों को याद करते हुए तुलसीराम अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, ‘वे दिन आज भी जब याद आते हैं, तो मुझे लगता है कि मुर्दों सा लेटे हुए हमारे नीचे पुआल, ऊपर भी पुआल और बीच में कफ़न ओढ़े हम सो नहीं रहे बल्कि रात भर अपनी चिताओं के जलने का इंतजार कर रहे हैं’। ऐसी हाड़ गलाने वाली दारूण स्थिति से पूरा एक वर्ग पीढ़ी दर पीढ़ी, साल दर साल जूझता रहा, लड़ता रहा है। 

अपने भूख पीड़ित गरीब जीवन की त्रासदी लेखक दो घटनाओं के माध्यम से करता है पहली अपनी माँ के माध्यम से  “दीवाली का त्यौहार आने पर मेरी माँ परम्परा के अनुसार अनाज पछोरने वाले सूप को एक लकड़ी से भट-भट पीटते हुए रात की अंतिम घड़ी में घर के एक-एक कोने में जाती और जोर जोर से अर्द्ध गायन शैली में  सूप पीटो दरिद्दर खेदो का जाप भी करती है। गांव की अन्य महिलाएं भी ऐसा ही करतीं, किन्तु कोई घर से दरिद्रता भगा पाने से सफल नहीं हुई।” 

गरीबी के साथ अकाल भी आ जाये तो इसका आसानी से शिकार सबसे अधिक दलित समुदाय ही बनता है। मुर्दहिया में लेखक तुलसीराम ने अकाल के दिनों में गांव के जमींदारों के शोषण का बड़ा मार्मिक वर्णन किया है जिसमें दलितों को कई-कई घंटे काम करना होता था। गांव के दलितों की सुबह से ही दरकार हो जाती थी। उनसे भयानक श्रम करवाया जाता था। वे विवशता में इन जमींदारों से तो कुछ नहीं कह पाते थे पर हल में जुतने वाले बैल और सुबह बाग देने वाले मुर्गे इनकी बेबसी के शिकार हो जाया करते थे- ‘प्रतिदिन सूर्योदय से एक दो घण्टे पहले ही उन मुर्गों की बाग पर दलित काम पर चले जाते और शाम तक श्रम करते रहते। अत: वे जमींदारों का सारा गुस्सा मुर्गों पर उतारकर संतुष्ट हो जाते थे’।

इतना ही नहीं हल जोतते समय अनेक दलित, बैलों को खूब गालियाँ सुनाते’। गरीबी और भूख का ही अन्य चित्रण करते हुए तुलसीराम लिखते हैं, “दलित औरतें और बच्चे प्राय: मुर्दहिया के जंगलों तथा गांव के ताल से खाने योग्य वनस्पतियों को ढूंढने निकल जाते। जंगल में तो कुछ भी नहीं मिलता किन्तु झाड़ियों में छिपे चूहों को मारकर घर लाया जाता। कई बिलों में पानी डालकर उसमें छिपे हुए चूहों को बाहर निकलने के लिए मजबूर किया जाता। कभी-कभी इन बिलों से जहरीले साँप भी निकल भागते। जंगल में खरगोश तथा साही भी ढूंढकर मारे जाते किन्तु इनकी संख्या बहुत कम होती। इधर ताल से सेरूकी नामक पौधे की जड़ें उखाड़ ली जातीं, जो एक बड़ी प्याज के बराबर चुकंदर जैसी लगती थी। इन्हें पानी में उबालकर खाया जाता था। ताल के किनारे कर्मी के पौधे तथा दुधिया नामक बड़ी-बड़ी लताएं होती थीं, जिनके पत्ते पान जैसे होते थे। इन कर्मी तथा दुधिया की लताओं का साग बड़ा स्वादिष्ट होता था। इन प्राकृतिक स्रोतों से दलितों को बहुत राहत मिलती थी।”  

इसी भूख और गरीबी के चलते सोफी नट की बेटियां अपना स्वाभिमान नहीं बचा पाईं और गरीबी के हत्थे चढ़ गईं। लेखक ने उसके प्रति अपनी सहानुभूति जताते हुए कहा है कि “सोफी की बहू तथा दोनों बेटियाँ सुंदरता के मामले में अपरम्पार सम्पन्न थीं, किंतु भूख उन्हें भी लगती थी, पर उसे मिटाने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं होता था। धीरे-धीरे मजबूरी में उनका सौन्दर्य काम में आने लगा। गांव के कुछ अभद्र ब्राह्मण युवक संध्या के समय मुर्दहिया के उस मुहाने पर लगता था कि स्वयं भूतों की चौकीदारी करने लगे। उन नटनियों का सौन्दर्य मुर्दहिया की झाड़ियों में पीछे प्राय: गुम होता रहा।’

भूख और गरीबी और शोषण से पीड़ित गांव की दलित महिलाओं को देखकर तुलसीराम अनेक बार उन गरीब दलित महिलाओं की चिट्ठियां लिखते व पढ़ते समय उनके दुख दर्द को महसूस कर रो पड़ते थे। मुर्दहिया में गांव की किसुनी भौजी की चिट्टी लिखते हुए वे कहते हैं, “उनके आंसुओं में मेरे भी आंसू शामिल हो जाते थे। ऐसी ही थी एक किसुनी भौजी जिसका पति मुन्नी लाल कतरास की कोइलरी में कोयला काटता था। वह अपनी अद्भुत वर्णनात्मक शैली में चिट्ठी लिखवाती थीं। लेखक उसके द्वारा लिखवाई गई चिट्ठी में किसुनी भौजी की पीड़ा चीख चीखकर अपना मर्म उद्घाटित करती है। किसुनी भौजी की एक चिट्ठी उदाहरण के रूप में यहां प्रस्तुत है, “हे खेदन के बाबू ! हम कवन-कवन बतिया लिखाई, बबुनी बहुत बिलखईले। ऊ रोई रोई के मरि जाले। हमरे छतिया में दूध ना होता।

दूहै जाईला त बकेनवा लात मारै ले। बन्सुआ मजूरी में खाली सड़ल सड़ल सावां दे ला। ऊपर से वोकर आँखि बड़ी शैतान हौ। संझिया क रहरिया में गवुंवा क मेहरिया सब मैदान जा लीं, त ऊ चोरबत्ती बारै ला। रकतपेवना हमहूं के गिद्ध नाई तरेरैला। चोटवा से पेटवा हरदम खराब रहै ला। हम का खियाईं, का खाई कुछ समझ में न आवैला। बबुनी के दुधवा कहंवा से लिआई ? जब ऊ रोवैले, त कब्बो कब्बो हम वोके लेई के बहरवां जाईके बोली ला कि देख तोर बाबू आवत हउवैं, त ऊ थोरी देर चुप हो जाते। तू कइसे हउवा ? सुनी ला की कोइलसी में आगि लगि जालैं। ई काम छोड़िदा। गवुवैं में मजदूरी कई लेहल जाई। सतुवै से जिनगी चलि जाई। येहर बड़ी मुसकिल में बीतत हौ। अकेलवैं जियरा ना लगैला, ऊपरा त खइले क बड़ा टोटा हौ। सकै त बीस रूपया भेजि दा”। 

इसी तरह मुर्दहिया में भूख, गरीबी, शोषण, अन्याय और अंधविश्वास के अनेक चित्र अपनी गहन मर्म वेदना और पीड़ा के साथ मौजूद है। दरअसल मुर्दहिया दलितों के जीवन में बीमार सवर्ण मानसिकता का दखल है। जिसके चलते वह सदियों से भूख, बीमारी, अपमान, पीड़ा, भेदभाव और वेदना झेल रहे हैं।

(अनिता भारती लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

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