ख्वाजा अहमद अब्बास : समाजवाद जिनके जीने का सहारा था

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ख्वाजा अहमद अब्बास।

ख्वाजा अहमद अब्बास मुल्क के उन गिने चुने लेखकों में शामिल हैं, जिन्होंने अपने लेखन से पूरी दुनिया को मुहब्बत, अमन और इंसानियत का पैगाम दिया। अब्बास ने न सिर्फ फिल्मों, बल्कि पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में भी नए मुकाम कायम किए। तरक्कीपसंद तहरीक से जुड़े हुए कलमकारों और कलाकारों की फेहरिस्त में ख्वाजा अहमद अब्बास का नाम बहुत अदब से लिया जाता है। तरक्कीपसंद तहरीक के वे रहबर भी थे और राही भी। भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा के वे संस्थापक सदस्यों में से एक थे।

मुंबई में जब 25 मई, 1943 को इप्टा का स्थापना सम्मेलन हुआ, तो उन्हें संगठन के कोषाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसे उन्होंने कई बरसों तक बखूबी निभाया। हरफनमौला शख्सियत के धनी अब्बास साहब फिल्म निर्माता, निर्देशक, कथाकार, पत्रकार, उपन्यासकार, नाटककार, प्रकाशक और देश के सबसे लंबे समय तकरीबन बावन साल तक चलने वाले नियमित स्तंभ ‘द लास्ट पेज’ के स्तंभकार थे। देश में समानांतर या नव-यथार्थवादी सिनेमा की जब भी बात होगी, अब्बास का नाम फिल्मों की इस मुख्तलिफ धारा के रहनुमाओं में गिना जाएगा।

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ख्वाजा अहमद अब्बास का जन्म 7 जून, 1914 को हरियाणा के पानीपत में हुआ। उनके दादा ख्वाजा गुलाम अब्बास 1857 स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानियों में से एक थे और वह पानीपत के पहले क्रांतिकारी थे, जिन्हें तत्कालीन अंग्रेज हुकूमत ने तोप के मुंह से बांधकर शहीद किया था। इस बात का भी शायद ही बहुत कम लोगों को इल्म हो कि ख्वाजा अहमद अब्बास, मशहूर और मारूफ शायर मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली के परनवासे थे। यानी वतन के लिए कुछ करने का जज्बा और जोश उनके खून में ही था। अदब से मुहब्बत की तालीम उन्हें विरासत में मिली थी।

ख्वाजा अहमद अब्बास की शुरुआती तालीम हाली मुस्लिम हाई स्कूल में और आला तालीम अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई। उनके अंदर एक रचनात्मक बेचैनी नौजवानी से ही थी। वे भी देश के लिए कुछ करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कलम को अपना हथियार बनाया। छात्र जीवन से ही वे पत्रकारिता से जुड़ गए। उन्होंने ‘अलीगढ़ ओपिनियन’ नाम की देश की पहली छात्र-प्रकाशित पत्रिका शुरू की। जिसमें उन्होंने उस वक्त देश की आजादी के लिए चल रही तहरीक से मुताल्लिक कई लेख प्रकाशित किए।

ख्वाजा अहमद अब्बास ने उस वक्त लिखना शुरू किया जब देश अंग्रेजों का गुलाम था। पराधीन भारत में लेखन से समाज में अलख जगाना, उस वक्त सचमुच एक चुनौतीपूर्ण कार्य था, पर उन्होंने यह चुनौती स्वीकार की और जिंदगी के आखिर तक अपनी कलम को विराम नहीं लगने दिया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अब्बास जिस सबसे पहले अखबार से जुड़े, वह ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ था। इस अखबार में बतौर संवाददाता और फिल्म समीक्षक उन्होंने साल 1947 तक काम किया। अपने दौर के मशहूर साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ से उनका नाता लंबे समय तक रहा। इस अखबार में प्रकाशित उनके कॉलम ‘लास्ट पेज’ ने उन्हें देश भर में काफी शोहरत प्रदान की। अखबार के उर्दू और हिंदी संस्करण में भी यह कॉलम क्रमशः ‘आजाद कलम’ और ‘आखिरी पन्ने’ के नाम से प्रकाशित होता था।

अखबार में यह कॉलम उनकी मौत के बाद ही बंद हुआ। ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ और ‘ब्लिट्ज’ के अलावा ख्वाजा अहमद अब्बास ने कई दूसरे अखबारों के लिए भी लिखा। मसलन ‘क्विस्ट’, ‘मिरर’ और ‘द इंडियन लिटरेरी रिव्यूव’। एक पत्रकार के तौर पर उनकी राष्ट्रवादी विचारक की भूमिका और दूरदर्शिता का कोई सानी नहीं है। अपने लेखों के जरिए उन्होंने समाजवादी विचार लगातार लोगों तक पहुंचाए। उनके लेखन में समाज के मुख्तलिफ पहलुओं की तफसील से जानकारी मिलती है। अपने दौर के तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों पर उन्होंने अपनी कलम चलाई। ख्वाजा अहमद अब्बास को अपने समय की मशहूर शख्सियतों के साथ रहने और बात करने का मौका भी मिला। मसलन अखबारों के लिए उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट, चार्ली चौपलिन, यूरी गागरिन आदि से लंबी बातचीत की।

तेजी से काम करना, लफ्फाजी और औपचारिकता से परहेज, नियमितता और साफगोई ख्वाजा अहमद अब्बास के स्वभाव का हिस्सा थे। विनम्रता उनकी शख्सियत को संवारती थी। कथाकार राजिंदर सिंह बेदी, अब्बास की शख्सियत का खाका खींचते हुए लिखते हैं-‘‘एक चीज जिसने अब्बास साहब के सिलसिले में मुझे हमेशा विर्त-ए-हैरत (अचंभे का भंवर) में डाला है, वह है उनके काम की हैरतअंगेज ताकतो-कूव्वत। कहानी लिख रहे हैं और नाविल भी। कौमी या बैनुल-अकवामी (अंतरराष्ट्रीय) सतह पर फिल्म भी बना रहे हैं और सहाफत को भी संभाले हुए हैं। ब्लिट्ज का आखिरी सफहा तो बहरहाल लिखना ही है।

साथ ही खुश्चोफ की सवानह (जीवनी) भी हो गई। पंडित नेहरू से भी मिल आए, जिनसे अब्बास साहब के जाती मरासिम (व्यक्तिगत संबंध) हैं। फिर पैंतीस लाख कमेटियों का मेंबर होना समाजी जिम्मेदारियों का सबूत है और यह बात मेंबरशिप तक ही महदूद नहीं। हर जगह पहुंचेंगे भी, तकरीर भी करेंगे। पूरे हिंदुस्तान में मुझे इस किस्म के तीन आदमी दिखाई देते हैं-एक पंडित जवाहर लाल नेहरू, दूसरे बंबई के डॉक्टर बालिगा और तीसरे ख्वाजा अहमद अब्बास। जिनकी यह कूव्वत और योग्यता एक आदमी की नहीं।’’

तरक्कीपसंद तहरीक का अब्बास के विचारों पर काफी असर रहा। बंबई में विक्टोरिया गार्डन के नजदीक उनके छोटे से कमरे में प्रगतिशील लेखक संघ की लगातार बैठकें होतीं थीं। जिसमें हिंदी, मराठी, उर्दू, गुजराती और कभी-कभी कन्नड़ एवं मलयालम के जाने-माने लेखक शरीक होते। अपनी स्थापना के कुछ ही दिन बाद, इप्टा का सांस्कृतिक आंदोलन जिस तरह से पूरे मुल्क में फैला, उसमें ख्वाजा अहमद अब्बास का अहम हाथ है। उस वक्त इप्टा के जो भी बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम बने, उसमें उनका अमूल्य योगदान है। अब्बास, ने इप्टा के संगठनात्मक कामों के अलावा उसके लिए खूब नाटक भी लिखे।

यही नहीं कई नाटकों का निर्देशन भी किया। ‘यह अमृता है’, ‘बारह बजकर पांच मिनट’, ‘जुबैदा’ और ‘चौदह गोलियां’ उनके मकबूल नाटक हैं। अब्बास उन नाटककारों में शामिल हैं, जिनके नाटकों की वजह से भारतीय रंगमंच में यथार्थवादी रुझान आया। यथार्थवादी रंगमंच को प्रतिष्ठा मिली। अब्बास के नाटकों में उन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हालात के खिलाफ संघर्ष करने की राह मिलती है, जिसकी वजह से इंसान गुलाम बना हुआ है। अब्बास के नाटकों के बारे में बलराज साहनी ने लिखा है, ‘‘अब्बास के नाटकों में एक मनका होता है, एक अनोखापन, एक मनोरंजक सोच, जो मैंने हिंदी-उर्दू के किसी और नाटककार में कम ही देखा है।’’

इप्टा द्वारा साल 1946 में बनाई गई पहली फिल्म ‘धरती के लाल’ ख्वाजा अहमद अब्बास ने ही निर्देशित की थी। कहने को यह फिल्म इप्टा की थी, लेकिन इस फिल्म में मुख्य भूमिका अब्बास ने ही निभाई थी। फिल्म के लिए लायसेंस लेने से लेकर, तमाम जरूरी संसाधन जुटाने का काम उन्होंने ही किया था। बंगाल के अकाल पर बनी यह फिल्म कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में समीक्षकों द्वारा सराही गई। इस फिल्म में जो प्रमाणिकता दिखलाई देती है, वह अब्बास की कड़ी मेहनत का ही नतीजा है। बंगाल के अकाल की वास्तविक जानकारी इकट्ठा करने के लिए उन्होंने उस वक्त बाकायदा अकालग्रस्त इलाकों का दौरा भी किया। ‘धरती के लाल’ को भारत की पहली यथार्थवादी फिल्म होने का तमगा हासिल है।

इस फिल्म की कहानी और संवाद ख्वाजा अहमद अब्बास ने ही लिखे थे। बिजन भट्टाचार्य के दो नाटक ‘जबानबंदी’, ‘नवान्न’ और कृश्न चंदर के काव्यात्मक उपन्यास ‘अन्नदाता’ को आधार बनाकर अब्बास ने इसकी शानदार पटकथा लिखी, जो यथार्थ के बेहद करीब थी। हिंदी फिल्मों के इतिहास में ‘धरती के लाल’ ऐसी फिल्म थी, जिसमें देश की मेहनतकश अवाम को पहली बार केन्द्रीय हैसियत में पेश किया गया है। पूरे सोवियत यूनियन में यह फिल्म दिखाई गई और कई देशों ने अपनी फिल्म लाइब्रेरियों में इसे स्थान दिया है। इंग्लैंड की प्रसिद्ध ग्रंथमाला, पेंग्विन ने अपने एक अंक में उसे फिल्म-इतिहास में एक महत्वपूर्ण फिल्म कहा। सच बात तो यह है ‘धरती के लाल’ फिल्म से प्रेरणा लेकर ही विमल राय ने अपनी फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ और सत्यजीत रॉय ने ‘पाथेर पांचाली’ में यथार्थवाद का रास्ता अपनाया।

ख्वाजा अहमद अब्बास फिल्मों में पार्ट-टाईम प्रकाशक के रूप में आए थे, लेकिन बाद में वे पूरी तरह से इसमें रम गए। साल 1936 से उनका फिल्मों में आगाज हुआ। सबसे पहले वे हिमांशु राय और देविका रानी की प्रोडक्शन कम्पनी बॉम्बे टॉकीज से जुड़े। आगे चलकर साल 1941 में उन्होंने अपनी पहली फिल्म पटकथा ‘नया संसार’ भी इसी कंपनी के लिए लिखी। साल 1945 में फिल्म ‘धरती के लाल’ से ख्वाजा अहमद अब्बास का कैरियर एक निर्देशक के रूप में शुरू हुआ। साल 1951 में उन्होंने ‘नया संसार’ नाम से अपनी खुद की फिल्म कंपनी खोल ली। ‘नया संसार’ के बैनर पर उन्होंने कई उद्देश्यपूर्ण और सार्थक फिल्में बनाईं।

मसलन फिल्म ‘राही’ (1953), मशहूर अंग्रेजी लेखक मुल्क राज आनंद की एक कहानी पर आधारित थी। जिसमें चाय के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों की दुर्दशा को दर्शाया गया था। मशहूर निर्देशक वी. शांताराम की चर्चित फिल्म ‘डॉ. कोटनिस की अमर कहानी’ अब्बास के अंग्रेजी उपन्यास ‘एंड वन डिड नॉट कम बैक’ पर आधारित है। वही फिल्म ‘धरती के लाल’ में उन्होंने देश की सामाजिक विषमता का यथार्थवादी चित्रण किया है। फिल्म प्रत्यक्ष रूप से जमीदारों, पूंजीपतियों, व्यापारियों की और अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजी हुकूमत की आलोचना करती है। ‘अनहोनी’ (1952) सामाजिक विषय पर एक विचारोत्तेजक फिल्म थी। फिल्म ‘शहर और सपना’ (1963) में फुटपाथ पर जीवन गुजारने वाले लोगों की समस्याओं का वर्णन है, तो ‘दो बूँद पानी’ (1971) में राजस्थान के रेगिस्तान में पानी की विकराल समस्या को दर्शाया गया है। गोवा की आजादी पर आधारित ‘सात हिंदुस्तानी’ भी उनकी एक उल्लेखनीय फिल्म है।

ख्वाजा अहमद अब्बास की यथार्थवाद में गहरी जड़ें थीं। उनके लिए सिर्फ फिल्म ही महत्वपूर्ण थी, न कि उससे जुड़े आर्थिक लाभ। अब्बास के लिए सिनेमा समाज के प्रति एक कटिबद्धता थी और इस लोकप्रिय माध्यम से उन्होंने समाज को काफी कुछ देने की कोशिश की। वे सिनेमा को बहुविधा कला मानते थे, जो मनोवैज्ञानिक और सामाजिक वास्तविकता के सहारे लोगों में वास्तविक बदलाव की आकांक्षा को जन्म दे सकती है। मशहूर निर्माता-निर्देशक राज कपूर के लिए ख्वाजा अहमद अब्बास ने जितनी भी फिल्में लिखी, उन सभी में हमें एक मजबूत सामाजिक मुद्दा मिलता है। चाहे यह ‘आवारा’ हो, ‘जागते रहो’ (1956), या फिर ‘श्री 420’। पैंतीस वर्षों के अपने फिल्मी करियर में अब्बास ने तेरह फिल्मों का निर्माण किया।

लगभग चालीस फिल्मों की कहानी और पटकथाएँ लिखीं, जिनमें ज्यादातर राजकपूर की फिल्में हैं। उन्होंने अपने फिल्मी कैरियर में मल्टीस्टार, रंगीन, गीतयुक्त, वाइड स्क्रीन फिल्म, बिना गीत की फिल्म और सह निर्माता के रूप में एक विदेशी फिल्म का निर्माण भी किया। फिल्मों में उन्हें जब कभी मौका मिलता, वे नव यथार्थवाद को मजबूत करने से नहीं चूकते थे। अब्बास की ज्यादातर फिल्में सामाजिक व राष्ट्रीय चेतना की महान दस्तावेज है। उनके बिना हिंदी फिल्मों में नेहरू के दौर और रूसी लाल टोपी का तसव्वुर नहीं किया जा सकता।

अब्बास को भले ही फिल्मकार के रुप में अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली हो, लेकिन बुनियादी तौर पर वे एक अफसानानिगार थे। अब्बास एक बेहतरीन अदीब थे। उन्होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज में जमकर लिखा। अब्बास की कहानियों की तादाद कोई एक सैकड़े से ऊपर है। उन्होंने अंग्रेजी, उर्दू और हिंदी तीनों भाषाओं में जमकर लिखा। अब्बास उर्दू में भी उतनी ही रवानी से लिखते थे, जितना कि अंग्रेजी में। दुनिया की तमाम भाषाओं में उनकी कहानियों के अनुवाद हुए। अब्बास की कहानियों में वे सब चीजें नजर आती हैं, जो एक अच्छी कहानी में बेहद जरूरी हैं। सबसे पहले एक शानदार मानीखेज कथानक, किरदारों का हकीकी चरित्र-चित्रण और ऐसी किस्सागोई कि कहानी शुरू करते ही, खत्म होने तक पढ़ने का जी करे। एक अहम बात और, उनकी कहानियों में कई बार ऐसे मोड़ आते हैं, जब पाठकों को लाजवाब कर देते हैं। वह एक दम हक्का-बक्का रह जाता है।

कहानी संग्रह ‘नई धरती नए इंसान’ की भूमिका में अब्बास लिखते हैं, ‘‘साहित्यकार और समालोचक कहते हैं, ख्वाजा अहमद अब्बास उपन्यास या कहानियां नहीं लिखता। वह केवल पत्रकार है। साहित्य की रचना उसके बस की बात नहीं। फिल्म वाले कहते हैं, ख्वाजा अहमद अब्बास को फिल्म बनाना नहीं आता। उसकी फीचर फिल्म भी डाक्यूमेंट्री होती है। वह कैमरे की मदद से पत्रकारिता करता है, कलम की रचना नहीं। और ख्वाजा अहमद अब्बास खुद क्या कहता है ? वह कहता है-‘‘मुझे कुछ कहना है..’’ और वह मैं हर संभावित ढंग से कहने का प्रयास करता हूं। कभी कहानी के रूप में, कभी ‘ब्लिट्ज’ या ‘आखिरी सफा’ और ‘आजाद कलम’ लिखकर। कभी दूसरी पत्रिकाओं या समाचार-पत्रों के लिए लिखकर। कभी उपन्यास के रूप में, कभी डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाकर। कभी-कभी स्वयं अपनी फिल्में डायरेक्ट करके भी।’’

ख्वाजा अहमद अब्बास की कहानियां अपने दौर के उर्दू के चर्चित रचनाकारों कृश्न चंदर, इस्मत चुगताई, राजेन्द्र सिंह बेदी और सआदत हसन मंटो के साथ छपतीं थीं। हालांकि उनकी कहानियों में कहानीपन से ज्यादा पत्रकारिता हावी होती थी, लेकिन फिर भी पाठक उन्हें बड़े शौक से पढ़ा करते थे। अब्बास का अफसाना ‘जिंदगी’ पढ़ने के बाद पाठक बखूबी उनकी सोच के दायरे और नजरिए तक पहुंच सकते हैं। ख्वाजा अहमद अब्बास के कई कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। जिनमें ‘एक लड़की’, ‘जाफरान के फूल’, ‘पांव में फूल’, ‘मैं कौन हूं’, ‘गेंहू और गुलाब’, ‘अंधेरा-उजाला’, ‘कहते हैं जिसको इश्क’, ‘नई धरती नए इंसान’, ‘अजंता की ओर’, ‘बीसवीं सदी के लैला मजनू’, ‘आधा इंसान’, ‘सलमा और समुद्र’, और ‘नई साड़ी’ प्रमुख कहानी संग्रह हैं। ‘इंकलाब’, ‘चार दिन चार राहें’, ‘सात हिंदुस्तानी’, ‘बंबई रात की बांहों में’ और ‘दिया जले सारी रात’ उनके प्रमुख उपन्यास हैं।

ख्वाजा अहमद अब्बास के समस्त लेखन को यदि देखें, तो यह लेखन स्वछन्द, स्पष्ट और भयमुक्त दिखलाई देता है। इस बारे में खुद अब्बास का कहना था कि ‘‘मेरी रचनाओं पर लोग जो चाहें लेबल लगाएं, मगर वो वही हो सकती हैं, जो मैं हूं, और मैं जो भी हूं, वह जादू या चमत्कार का नतीजा नहीं है। वह एक इंसान और उसके समाज की क्रिया और प्रतिक्रिया से सृजित हुआ है।’’ यही वजह है कि अब्बास की कई कहानियां विवादों की शिकार भी हुईं। विवादों की वजह से उन्हें अदालतों के चक्कर भी काटने पड़े, लेकिन फिर भी उन्होंने अपने लेखन में समझौता नहीं किया। इस बारे में उनका साफ-साफ कहना था कि ‘‘वह किसी राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित होकर नहीं, बल्कि इंसान को इंसान की तरह देखकर लिखते और संबंध गांठते हैं।’’ कहानी ‘एक इंसान की मौत’ और ‘अबाबील’ पर उनके विचारधारा की स्पष्ट छाप दिखलाई देती है। ‘लाल और पीला’, ‘मेरी मौत’, ‘एक लड़की’, ‘जाफरान के फूल’, ‘अजंता’, ‘एक पावली चावल’ और ‘बारह बजे’ उनकी चर्चित कहानियां हैं।

 ख्वाजा अहमद अब्बास, पंडित जवाहर लाल नेहरू के बड़े प्रशंसक थे। वे उनके समाजवादी विचारों से पूरी तरह से इत्तेफाक रखते थे। अपने लेखों और कहानियों के मार्फत यही काम अब्बास कर रहे थे। उन्हें लगता था कि नेहरू की रहबरी में मुल्क अच्छी तरह से महफूज है। लेकिन जब-जब भी अब्बास के सपने और उम्मीदें टूटीं, वे उनकी कहानियों और लेखों में भी बयां हुईं। एक तटस्थ आलोचक की तरह अब्बास, तत्कालीन सरकार की नीतियों की आलोचना करने से बाज नहीं आए। उन्होंने वही लिखा, जो सच है। ख्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी जिंदगी के आखिरी वक्त तक लिखा। उनकी कहानियों का दायरा पांच दशक तक फैला हुआ है। अब्बास की पहली कहानी ‘अबाबील’ साल 1935 में छपी और उसके बाद यह सिलसिला बीसवीं सदी के आठवें दशक तक चला। इस बीच मुल्क में उन्होंने कई दौर देखे।

अंग्रेजों की गुलामी, बंटवारे की आग, नये हिन्दुस्तान की तामीर, हिन्दुस्तान-पाकिस्तान जंग, हिन्दुस्तान-चीन जंग। इन सभी दौरों को यदि अच्छी तरह से जानना-समझना है, तो उनकी कहानियों को पढ़कर गुजरिये। कुछ देर चलिये, कुछ देर ठहरिये। जब अब्बास ने अपनी पहली कहानी लिखी, तो उस वक्त उनकी उम्र महज उन्नीस साल थी। उन्नीस साल कोई ज्यादा उम्र नहीं होती लेकिन जो कोई भी इस कहानी को एक बार पढ़ लेगा, वह अब्बास के जेहन और उनके कहन का दीवाना हुए बिना नहीं रहेगा।

इस एक अकेली कहानी से अब्बास रातों-रात देश-दुनिया में मशहूर हो गए। बाद में दुनिया की कई जबानों में इस कहानी के अनुवाद हुए। अंग्रेजी, रूसी, जर्मन, स्वीडिश, अरबी, चीनी वगैरह-वगैरह। जर्मन जबान में दुनिया की बेहतरीन कहानियों का जब एक संकलन निकला, तो उसमें ‘अबाबील’ को शामिल किया गया। अंग्रेजी में जब इसी तरह का एक संकलन डॉक्टर मुल्कराज आनंद और इकबाल सिंह ने किया, तो वे भी इस कहानी को रखे बिना नहीं रह पाये। राष्ट्रीय स्तर पर ही नही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह कहानी खूब सराही गई। अदब में इसे आला दर्जे की रचना का खिताब हासिल है।  

कहानी में अब्बास ने किसान की जिंदगी का जिस तरह से खाका खींचा है, वह बिना गांव और किसानों की जिंदगी को जिये बिना मुमकिन नहीं। ताज्जुब की बात ये है कि अब्बास को गांव और किसान की जिंदगी का कोई जाती तजुर्बा नहीं था। कहानी लिखते समय किसानों के बारे में उनका इल्म न के बराबर था। एक इंटरव्यू में जब कृश्न चंदर ने इसके मुतआल्लिक उनसे पूछा, तो अब्बास का बेबाक जवाब था, ‘‘कोई जरूरी नहीं कि हर कहानी अनुभव पर आधारित हो। जिस प्रकार कातिल के विषय में लिखने से पहले कत्ल करना जरूरी नहीं। या एक वेश्या के जीवन का वर्णन करने के लिए यह जरूरी नहीं है कि लेखक स्वयं भी किसी वेश्या के साथ सो चुका हो।’’ कहानी मुख्तसर सी है, रहीम खां एक कठोर दिल किसान है।

उसके अत्याचारों से तंग आकर पहले उसके बेटे नूरू और बुन्दु घर से भागे, तो बाद में उसकी पत्नी भी चली जाती है। इस जालिम किसान का हृदय परिवर्तन अबाबील जैसे परिंदे कर देते हैं। यही अबाबील को बारिश से बचाने की वजह से रहीम खां को तेज बुखार होता है और बाद में उसकी मौत हो जाती है। यह छोटी सी कहानी हमारी संवेदनाओं को झकझोर देती है। ऐसा नहीं कि अब्बास के यहां सभी कहानियां सामाजिक बदलाव या गमे-दौरां की कहानियां हैं, दीगर अफसानानिगारों की तरह उनकी कुछ कहानियां मसलन ‘फैसला’, ‘एक लड़की’ गमे-जानां के ऊपर हैं। शहर, हमेशा गांव के लोगों को आकर्षित करता रहा है। उन्हें लगता है कि यहां उनके सपने पूरे होंगे। लेकिन इन शहरों की सच्चाई कुछ और है। शहर और महानगरों के कड़वा यथार्थ अब्बास की कई कहानियों में सामने आया है। ‘अलिफ लैला 1956’ और ‘सुहागरात’ ऐसी ही संघर्षों और उसके बीच चल रही जिंदगी की कहानियां हैं। इन्हीं कहानियां का विस्तार उनकी फिल्म ‘शहर और सपना’ है। जो उस वक्त कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराही गई थी।

 सत्तर साल की उम्र आते-आते ख्वाजा अहमद अब्बास, तकरीबन सत्तर किताबें लिख चुके थे। अनेक पत्र-पत्रिकाओं के लिए सैंकड़ों लेख, फिल्म लेखन, निर्देशन अलग। ख्वाजा अहमद अब्बास का लेखन किसी सरहद का मोहताज नहीं था, उनका लेखन सरहदों से पार भी पहुंचा। उनकी कई किताबों का अनुवाद भारतीय और विदेशी भाषाओं मसलन रूसी, जर्मन, इतालवी, फ्रेंच और अरबी में किया गया है। ख्वाजा अहमद अब्बास के महत्वपूर्ण लेखों का संकलन हमें उनकी दो किताबों ‘आई राइट इज आई फील’ और ‘ब्रेड, ब्यूटी एंड रिवोल्यूशन’ में मिलता है। अब्बास ने अपनी आत्मकथा भी लिखी, जो कि ‘आई एम नॉट एन आईलैंड : एन एक्सपेरिमेंट इन आटोबायोग्राफी’ नाम से साल 1977 में प्रकाशित हुई।

अपने बेमिसाल काम के लिए ख्वाजा अहमद अब्बास कई सम्मानों और पुरस्कार से नवाजे गए। गोया कि सम्मान और पुरस्कार उन्हें हर क्षेत्र में हासिल हुए। ‘शहर और सपना’ के अलावा, अब्बास साहब की दो फिल्मों, ‘सात हिंदुस्तानी’ (1969) और ‘दो बूंद पानी’ (1972) ने राष्ट्रीय एकता पर बनी सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए ‘नरगिस दत्त पुरस्कार’ जीते। वहीं उनकी एक और फिल्म ‘नीचा नगर’ (1946) को खूब अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली और इसने कान फिल्म समारोह में ‘पाल्मे डीश्ओर पुरस्कार’ भी जीता। रूस के सहयोग से बनी फिल्म ‘परदेसी’ (1957) इस पुरस्कार के लिए नामित होने वाली उनकी दूसरी फिल्म थी। फिल्मों के अलावा उनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए भी कई पुरस्कार मिले। भारत सरकार ने साल 1969 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा। फिल्मों और साहित्य के क्षेत्र में उनके शानदार योगदान को सलाम करते हुए सोवियत संघ सरकार ने उन्हें साल 1984 और 1985 में लगातार दो बार सम्मानित किया। जिसमें उन्हें मिला ‘लेनिन शांति पुरस्कार’ भी शामिल है।

अब्बास एक सच्चे वतनपरस्त और सेक्युलर इंसान थे। उनकी दोस्ती का दायरा काफी वसीह था, उनके सबसे करीबी दोस्तों में शामिल थे, इन्दर राज आनन्द, मुनीष नारायण सक्सेना, वी.पी. साठे, करंजिया, राज कपूर, कृश्न चंदर, अली सरदार जाफरी आदि। अपनी वसीयत में उन्होंने लिखा था,‘‘मेरा जनाजा यारों के कंधों पर जुहू बीच स्थित गांधी के स्मारक तक ले जाएं, लेजिम बैंड के साथ। अगर कोई खिराज-ए-अकीदत पेश करना चाहे और तकरीर करे तो उनमें सरदार जाफरी जैसा धर्मनिरपेक्ष मुसलमान हो, पारसी करंजिया हों या कोई रौशनख्याल पादरी हो वगैरह, यानी हर मजहब के प्रतिनिधि हों।’’ ख्वाजा अहमद अब्बास की साम्यवादी विचारधारा में गहरी आस्था थी, लेकिन जब जरूरत पड़ती, तो वे मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट पार्टी की सियासी नीतियों पर भी सख्त नुक्ताचीनी करने से नहीं चूकते थे।

मार्क्सवाद के बारे में उनका ख्याल था,‘‘मार्क्सवाद ‘मानव-इतिहास’ का अगला कदम है, आखिरी कदम नहीं।’’ उनकी नजर में,‘‘आज की परिस्थितियों में, अतीत के प्रकाश में, बुद्धि और मेधा तथा साइंस के प्रयोगों के आधार पर मार्क्सवाद जीवन का उचित दर्शन मालूम होता है, लेकिन यह अंतिम सच्चाई नहीं है।’’ यह आलोचनात्मक रवैया, उन्होंने मार्क्सवाद से ही सीखा था। अब्बास के लिए समाजवाद केवल किताबों और अध्ययन तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने तमाम दुख-परेशानियां और खतरे झेलते हुए इसे अपनी जिंदगी में भी ढालने की कोशिश की। वह दूसरों के लिए जीने में यकीन करते थे। समाजवाद उनके जीने का सहारा था और आखिरी समय तक उन्होंने इस विचार से अपनी आस नहीं छोड़ी। ‘देश में समाजवाद आए’, इस बात का उनके दिल में हमेशा ख्वाब रहा।

ख्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी आखिरी सांस माया नगरी मुंबई में ली। 1 जून, 1987 को वे इस दुनिया से जिस्मानी तौर पर दूर चले गए। उन्होंने अपने आखिरी दिनों तक अखबारों के लिए लिखा। मौत से पहले लिखे अब्बास के वसीयतनामे को उनकी आखिरी इच्छा के मुताबिक फिल्म कॉलम के रूप में प्रकाशित किया गया। अब्बास को इस दुनिया से जुदा हुए तीन दशक से ज्यादा हो गए, लेकिन आज भी वे लोगों के जेहन में जिंदा हैं। अब्बास के अफसाने, विचार और फिल्में मुल्कवासियों को अपनी ओर खींचती हैं और उन्हें दावत देती हैं कि वे इन पर पहले खूब बहस-मुबाहिसा करें, फिर उनके बारे में किसी आखिरी नतीजे पर पहुंचें। अपनी वसीयत में वे खुद लिखते हैं,‘‘जब मैं मर जाऊॅंगा, तब भी मैं आपके बीच में रहूॅंगा। अगर मुझसे मुलाकात करनी है, तो मेरी किताबें पढ़ें और मुझे मेरे ‘आखिरी पन्नों’, ‘लास्ट पेज’ में ढूंढें, मेरी फिल्मों में खोजें। मैं और मेरी आत्मा इनमें है। इनके माध्यम से मैं आपके बीच, आपके पास रहूंगा, आप मुझे इनमें पाएंगे।’’

(मध्यप्रदेश निवासी लेखक-पत्रकार जाहिद खान, ‘आजाद हिंदुस्तान में मुसलमान’ और ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ समेत पांच किताबों के लेखक हैं।)

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