Fri. May 29th, 2020

आतंकी घटना के आरोपी इंद्रेश को मानद डी-लिट देने की तैयारी

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चौंकाने वाली खबर है। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती उर्दू अरबी फारसी विश्वविद्यालय, लखनऊ, के दीक्षांत समारोह में इंद्रेश कुमार को मानद डी-लिट की उपाधि से नवाजा जाएगा। अहम बात यह है कि इंद्रेश कुमार 2007 में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की अजमेर स्थित दरगाह में हुई आतंकी घटना के आरोपी रहे हैं और अब उन्हीं के नाम पर बना विश्वविद्यालय उन्हें उपाधि से नवाजने जा रहा है। उन्हें ये उपाधि 21 नवंबर को दी जाएगी। इंद्रेश कुमार हिन्दुत्ववादी कार्यकर्ता सुनील जोशी की हत्या के मामले में भी आरोपी रहे हैं।

सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) के अध्यक्ष एडवोकेट मोहम्मद शोएब और मैगसेसे अवार्ड विजेता और सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष संदीप पाण्डेय ने संयुक्त बयान में कहा कि विश्वविद्यालय के कुलपति माहरुख खान, जिनकी अपनी अकादमिक योग्यता भी संदिग्ध बताई जाती है, से पूछा जाना चाहिए कि इंद्रेश कुमार ने समाज में ऐसा कौन सा योगदान दिया है कि उन्हें मानद डी-लिट की उपाधि दी जाए? इंद्रेश कुमार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्शक हैं और माहरुख खान मुस्लिम राष्ट्रीय मंच से जुड़े हुए हैं। दोनों नेताओं ने कहा कि एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार बढ़े शुल्क को वापस घटाने के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों के 25 दिनों से चल रहे आंदोलन के बावजूद बात न करने पर अड़ी हुई है। सरकार विश्व स्तरीय इस विश्वविद्यालय को चौपट करने पर लगी हुई है। देश के अन्य विश्वविद्यालयों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या उसकी सोच से जुड़े लोग सीधे हस्तक्षेप कर अकादमिक गुणवत्ता के साथ छेड़-छाड़ कर रहे हैं। इसी बीच यह खबर भी आई है कि इंद्रेश कुमार को उपाधि दी जा रही है।

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​दोनों नेताओं का कहना है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में आजकल कुछ संकीर्ण हिन्दुत्ववादी मानसिकता के छात्रों द्वारा संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग में डॉ. फिरोज खान के असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त हो जाने का सिर्फ उनके मुस्लिम होने के कारण विरोध किया जा रहा है, जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि डॉ. फिरोज खान इस पद के लिए सारी जरूरी शर्तें पूरी करते हैं। विरोध करने वाले छात्रों का यह भी कहना है कि यह नियुक्ति विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना मालवीय जी की सोच के अनुकूल नहीं है, जबकि मदन मोहन मालवीय ने कहा था, ‘भारत सिर्फ हिन्दुओं का देश नहीं है। यह मुस्लिम, इसाई और पारसियों का भी देश है। यह देश तभी मजबूत और विकसित बन सकता है जब भारत में रहने वाले विभिन्न समुदाय आपसी सौहार्द के साथ रहेंगे।’

उन्होंने अपने बयान में कहा कि मालवीय जी की यह कोशिश रही कि दुनिया भर से भिन्न-भिन्न विचारधाराओं के विद्वानों को लाकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में उनसे अध्यापन कराया जाए। ऐसे में विरोध करने वाले छात्रों को सोचना चाहिए कि क्या वाकई में मालवीय जी उनके तर्क से सहमत होते?

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