Mon. Jun 1st, 2020

राही मासूम रजा: हिंदुस्तानी रिवायत के महान प्रतीक पुरुष

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राही मासूम रजा।

डॉक्टर राही मासूम रजा (1 अगस्त 1927–15 मार्च 1992) 

फिरकापरस्ती, जातिवाद, सामंतशाही और वर्गीय विभाजन के खिलाफ निरंतर चली प्रतिबद्ध कलम के एक अति महत्वपूर्ण युग का नाम है। इसी कलम ने मुस्लिम अंतर्मन की गहरी तहें बेहद सूक्ष्मता से खोलता कालजयी उपन्यास ‘आधा गांव’ लिखा तो दूरदर्शन की दशा-दिशा में क्रांतिकारी बदलाव का सबब बना हिंदू मिथ हास के महान ग्रंथ पर आधारित सोप ओपेरा ‘महाभारत’ भी लिखा। ‘आधा गांव’ यथार्थ की खुरदरी जमीन पर टिकी कृति है तो ‘महाभारत’ मनो जगत के अबूझ रहस्यों की शानदार प्रस्तुति।

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दोनों को रजा ने ऐसी विलक्षणता के साथ निभाया कि वह महान भारतीय लेखकों की श्रेणी में शुमार हो गए। ‘आधा गांव’ मुस्लिम मन के रेशे-रेशे से गुजरे बगैर संभव नहीं था तो (धारावाहिक) ‘महाभारत’ हिंदू लोकाचार के एक-एक पहलू की पड़ताल के बगैर। ‘हिंदुस्तानियत’ का सच्चा पैरोकार ही यह कर सकता था, जो कि राही मासूम रजा यकीनन थे। वैसे भी वह खुद को गंगा-यमुनी तहजीब का बेटा मानते-समझते-कहते थे। उपमहाद्वीप की साहित्यिक-सांस्कृतिक शख्सियतों में उन सरीखा दूसरा कोई नहीं हुआ। वह अनूठे-अकेले थे।                                      

उनका जन्म एक अगस्त 1927 को गाजीपुर के गंगोली गांव में हुआ था। वहां की आबोहवा ने उनकी रगों में हिंदुस्तानी तहजीब, लहू की मानिंद भर दी जो वक्त के साथ-साथ गाढ़ी और गहरी होती गई। वह रिवायती जमींदार खानदान के फरजंद थे लेकिन मिजाज बचपन से ही समतावादी पाया। जवानी के दिनों में रजा वामपंथी हो गए।            

एक बार कम्युनिस्ट पार्टी ने तय किया कि गाजीपुर नगर पालिका के अध्यक्ष पद के लिए कॉमरेड पब्बर राम को खड़ा किया जाए। पब्बर राम एक भूमिहीन मजदूर थे। राही और उनके बड़े भाई मूनिस रजा दोनों कॉमरेड पब्बर राम का प्रचार करने लगे। उधर, कांग्रेस ने रजा के पिता बशीर हसन आबिदी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। दोनों भाई विचारधारात्मक धरातल पर खड़े रहे और अपने अब्बा को समझाया कि वह यह चुनाव न लड़ें। अब्बा हुजूर का तर्क था कि मैं 1930 से कांग्रेसी हूं। पार्टी की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करूंगा। राही मासूम रजा का जवाब था, “हमारी भी मजबूरी है कि हम आप के खिलाफ पब्बर राम को चुनाव लड़वाएंगे।” राही घर से सामान उठाकर पार्टी ऑफिस चले गए। जब चुनाव के नतीजे आए तो सब यह जानकर स्तब्ध रह गए कि एक भूमिहीन मजदूर ने जिले के सबसे मशहूर वकील को भारी बहुमत से हरा दिया था। यह घटना उनकी वैचारिक दृढ़ता की एक मिसाल है।                      

‘महाभारत’ का लेखन एक अन्य बड़ी मिसाल है। बीआर चोपड़ा ने उन्हें इसकी पटकथा-संवाद की गुजारिश की। व्यस्तता की वजह से रजा साहब ने इंकार कर दिया। उनके अभिन्न मित्र चोपड़ा मान बैठे थे कि वह इस प्रोजेक्ट के लिए अंततः उन्हें राजी कर लेंगे। संवाददाता सम्मेलन में बीआर चोपड़ा ने जोर-शोर से घोषणा कर दी कि ‘महाभारत’ का लेखन कार्य राही मासूम रजा करेंगे। इस घोषणा के साथ ही हंगामा हो गया। कट्टर हिंदूवादी संगठन सक्रिय हो गए। चोपड़ा के पास खतों का ढेर लग गया जिनमें एक इबारत समान रूप से लिखी गई थी कि, ‘क्या सारे हिंदू मर गए हैं जो आप एक मुसलमान से महाभारत लिखवाने जा रहे हैं।’ चोपड़ा साहब ने तमाम खत राही के पास भेज दिए।

यह वाकया राही मासूम रजा के अलीगढ़ विश्वविद्यालय के दिनों के गहरे दोस्त डॉ. कुंवर पाल सिंह ने बयान करते हुए लिखा है, “रजा भारतीय संस्कृति और सभ्यता के बहुत बड़े अध्येता थे। अगले दिन उन्होंने चोपड़ा साहब को फोन किया, ‘महाभारत’ अब मैं ही लिखूंगा। मैं गंगा का बेटा हूं। मुझसे ज्यादा हिंदुस्तान की संस्कृति और सभ्यता को कौन जानता है?” तो राही मासूम रजा ने ‘महाभारत’ का टीवी संस्करण ऐसा लिखा कि उसके संवाद घर-घर बेइंतहा क़बूल हो गए। भाषा का ऐसा सौंदर्य लिए हुए एवं इतनी रवानगी से सराबोर लेखन शायद ‘महाभारत’ के बाद किसी अन्य हिंदी टीवी सीरियल का नहीं हुआ। उनके गहरे दोस्त और खुद सिद्धहस्त पटकथा-संवाद लेखक कमलेश्वर ने कहा था कि राही मासूम रजा ने जिस शिद्दत से डूब कर ‘महाभारत’ लिखा, वह अचंभित करता है।      

सांप्रदायिक कठमुल्लापन उनकी नफरत तथा चिढ़ का सबसे बड़ा सबब था। प्रगतिशील लेखक खेमों से वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के शुरुआती दिनों, जब वह उर्दू में शायरी करते, से जुड़ गए थे। गहरी वैचारिक प्रतिबद्धता के बावजूद वह आंखें खोलकर चलने-देखने वाले वामपंथी थे। 1975 के बर्बर आपातकाल का उन्होंने हर स्तर पर विरोध किया। 1984 की सिख विरोधी हिंसा और बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद के राजनैतिक/सामाजिक कुप्रभावों ने उन्हें लगातार बेचैन रखा। इस विवाद पर उन्होंने लिखा था, “मैंने ये कहा था और अब भी कहता हूं कि बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि मंदिर दोनों को गिरा कर उसकी जगह एक राम-बाबरी पार्क बना देना चाहिए।”                                       

राही मासूम रजा का कहना था, “धर्म का राष्ट्रीयता और संस्कृति से कोई विशेष संबंध नहीं है। पाकिस्तान का निर्माण मिथ्या चेतना के आधार पर हुआ है और जिस भवन की बुनियाद टेढ़ी होगी वह बहुत दिन तक नहीं चलेगा।” उपन्यास ‘आधा गांव’ में इस ओर साफ संकेत है कि पाकिस्तान बहुत दिनों तक एक नहीं रहेगा। यही हुआ। भाषाई आधार पर 1971 में पाकिस्तान टूटा और बांग्लादेश बना।                          

‘आधा गांव’ (रचनाकाल: 1966) को विश्व स्तर के निकट की कालजयी रचना माना जाता है। इसके बाद उन्होंने अपना दूसरा बहुचर्चित उपन्यास ‘टोपी शुक्ला’ लिखा। दोनों उपन्यास पहले-पहल फारसी लिपि में लिखे गए थे। बाद में उनका हिंदी लिप्यंतरण किया गया। बेशुमार संस्करणों में प्रकाशित ‘आधा गांव’ के बाद उन्होंने अपने तमाम उपन्यास (टोपी शुक्ला, हिम्मत जौनपुरी, ओस की बूंद, दिल एक सादा कागज, सीन 75, असंतोष के दिन और कटरा बी आर्जू) मुंबई (तब बंबई) जाकर लिखे। बतौर शायर-कवि भी उनकी खासी ख्याति थी। ‘हम तो हैं परदेस में …देस में निकला होगा चांद’ जैसी उनकी कई मशहूर नज्में-गीत हैं।       

हिंदुस्तानियत रिवायत में पूरी तरह रचे-बसे डॉक्टर राही मासूम रजा गल्प हिंदी में लिखते थे और शायरी-कविता उर्दू में। अपनी लिखी फिल्मों में वह हिंदी-उर्दू अल्फाज का माकूल इस्तेमाल करते थे।                                           

उनकी एक नज़्म से उनके व्यक्तित्व का एक खास अक्स दरपेश होता है: ‘मेरा नाम मुसलमानों जैसा है/क़त्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो/लेकिन मेरी रग-रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है/मेरे लहू से चुल्लू भर महादेव के मुंह पर फेंको/और उस योगी से कह दो-महादेव/अब इस गंगा को वापस ले लो/यह ज़लील तुर्कों के बदन में गाढ़ा गरम लहू बनकर दौड़ रही है…’।                                    

राही मासूम रजा कहा करते थे, “मैं तीन मांओं का बेटा हूं। नफ़ीसा बेगम, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी और गंगा। नफ़ीसा मर चुकी हैं। अब साफ याद नहीं आतीं। बाकी दोनों मांएं जिंदा हैं और याद भी हैं।”                                                   

उनकी एक अन्य नज़्म की पंक्तियां हैं: ‘मेरा फोन तो मर गया यारों/मुझे ले जाकर गाजीपुर की गंगा की गोदी में सुला देना/अगर शायद वतन से दूर मौत आए/को मेरी यह वसीयत है/अगर उस शहर में छोटी सी एक नदी भी बहती हो/तुम मुझको/उसकी गोद में सुला कर/उससे कह देना/की गंगा का बेटा आज से तेरे हवाले है…’।                      

हिंदुस्तानियत रिवायत का यह महान प्रतीक पुरुष इसी मार्च महीने की 15 तारीख को 1992 को जिस्मानी तौर पर अलविदा हो गया।

(अमरीक सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल जालंधर में रहते हैं।)

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