समुदायों के बीच नफरत की खाईं को और गहरा करने में जुट गए हैं मीडिया और सत्ता

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“मेरठ में हिन्दू आबादी पलायन कर रही है। सवा सौ घरों पर ‘घर बिकाऊ है’ चस्पा है। हिन्दू लड़कियों से छेड़छाड़ हो रही है। मंदिर पर पत्थर फेंके जा रहे हैं।” ये सूचनाएं ख़बर के तौर पर बेचैन करने वाली हैं। मगर, इन्हीं सूचनाओं को देते हुए जब खबरिया चैनल पूछने लगते हैं कि कहां हैं सेकुलर लोग, टुकड़े-टुकड़े गैंग के लोग, अवार्ड वापसी गैंग वगैरह-वगैरह, तो ख़बर बदल जाती है। ख़बर ये नहीं रह जाती कि धार्मिक आधार पर कोई कानून-व्यवस्था का मसला पैदा हुआ है जिसके शिकार हिन्दू समुदाय से लोग हैं, बल्कि ख़बर ये हो जाती है कि मुसलमान समुदाय के लोग ऐसा कर रहे हैं जिन्हें उन तमाम लोगों का समर्थन है जिन्होंने कभी मुसलमानों पर हुए अत्याचार की घटनाओं पर प्रतिक्रिया दी थी।

कथित हिन्दुत्ववादी प्रतिक्रियाएं अब ख़बरिया चैनलों की ज़ुबान बन गयी हैं। सत्ताधारी बीजेपी की भाषा अब बदल गयी है क्योंकि ज्यादातर इलाकों में उनकी डबल इंजन वाली सरकारें हैं। उनके लिए कानून-व्यवस्था नहीं सम्भाल पाने पर बोलने की भी विवशता है। वे भी मीडिया की ख़बरों और उनकी ज़ुबान के सुर में सुर मिला रह हैं। उल्टे वे यह भी बढ़-चढ़ कर कहते हैं कि मीडिया वैसे तत्वों के साथ है जो कथित रूप से मुस्लिम परस्त हैं। 

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हाल में घटी पांच घटनाएं दिलों को झकझोरने वाली हैं। उन पर डालते हैं नज़र-

  • कानपुर के बर्रा इलाके में 16 साल के मुसलमान युवक ताज को इसलिए पीट दिया गया क्योंकि उसने टोपी पहन रखी थी। वह किदवई नगर स्थित मस्जिद से शुक्रवार 28 जून को नमाज पढ़कर घर लौट रहा था। रास्ते में तीन-चार बाइक सवार युवकों ने उसकी टोपी उतार दी और ‘जय श्री राम’ बोलने को कहा। आदेश नहीं मानने पर उसकी पिटाई कर दी। चिल्लाने पर राहगीरों ने उसे बचाया।
  • 20 जून को मदरसा टीचर 23 वर्षीय एचएम शाहरुख हालदर की ट्रेन में इसलिए पिटाई कर दी गयी कि उन्होंने टोपी पहनी हुई थी। बालीगंज थाने में उन्होंने शिकायत दर्ज करायी जिसके अनुसार उनसे ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने को कथित तौर पर कहा गया। मना करने के बाद सियालदाह जा रही ट्रेन से धक्का देकर गिरा दिया गया।
  • महाराष्ट्र के ठाणे में ओला कैब ड्राइवर फैसल उस्मान ख़ान की बीच सड़क पर 22 जून को करीब 5 लोगों ने पिटाई कर दी। पिटाई के दौरान मुंह से ‘अल्लाह’ निकल जाने के बाद उसे ‘जय श्री राम’ बोलने को मजबूर किया गया। 
  • झारखंड में जमशेदपुर से सटे सरायकेला के धतकीडीह में चोर बताकर 22 साल के तबरेज अंसारी को बुरी तरह पीटा गया। सामने आए वीडियो से पता चलता है कि उसे जय श्री राम और जय हनुमान के नारे लगाने को मजबूर किया गया। 18 घंटे तक उसकी पिटाई हुई। पुलिस ने उसे अस्पताल भेजने के बजाए पिटाई करने वालों की शिकायत पर उल्टे उसे ही जेल भेज दिया। जेल में उसकी हालत बिगड़ गयी। 23 मई को उसकी मौत हो गयी।
  • कूच विहार में अलग कहानी सामने आयी। बीजेपी के मुस्लिम समर्थक पर तृणमूल कांग्रेस के मुस्लिम समर्थक के साथ मारपीट के आरोप हैं। 40 मिनट के वीडियो में आफूस अली बीजेपी समर्थक अन्य लोगों के साथ टीएमसी के अजगर शेख को थप्पड़ मारते, कान पकड़ कर उठक-बैठक लगाते और जबरन ‘जय श्री राम’ के नारे लगवाते देखा गया।

इन घटनाओं पर गौर करें तो कोई घटना ऐसी नहीं है जो गो रक्षा के नाम पर हुई हो। बीते कुछ सालों में गो रक्षा के नाम पर इंसान की मॉब लिंचिंग हुई थी। अब लिंचिंग का स्वरूप बदल गया है। किसी मुसलमान से ‘जय श्री राम’ बोलवाने का एक उन्माद देखने को मिल रहा है। ऐसी घटना किस जगह पर होगी, किस रूप में होगी किसी को नहीं मालूम। जाहिर है सड़क पर अकेले चलने को लेकर दहशत का माहौल बनता जा रहा है।

क्या इन घटनाओं को रोका जाना जरूरी नहीं है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में लिंचिंग की घटना को चिन्ताजनक और अस्वीकार्य बताया है। मगर, क्या यह काफी है? ‘जय श्री राम’ का सड़क पर सबसे पहले किसने इस्तेमाल किया? यह बीजेपी ही थी। ममता बनर्जी को देखकर ‘जय श्री राम’ के नारे लगाना, ममता बनर्जी की गैर जरूरी प्रतिक्रिया और फिर इसे हिन्दुओं पर अंकुश के तौर पर बताना सबसे पहले बीजेपी ने ही किया था। बीजेपी के नेता खुले तौर पर सभाओं में, टीवी चैनलों में, भाषणों में, वक्तव्यों में ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने लगे। अमित शाह और योगी आदित्यनाथ ने तो ‘जय श्री राम’ के नारे लगाकर ममता सरकार को गिरफ्तार कर लेने की चुनौती दी। यही आक्रामकता अब जानलेवा बन चुकी है। ‘जय श्री राम’ का नारा एक समुदाय के लिए लिंचिंग की वजह बन चुका है। क्या बीजेपी को अपनी इस गलती को कबूल नहीं करना चाहिए?

संसद के भीतर शपथ ग्रहण समारोह के दौरान भी असदुद्दीन ओवैसी के शपथ लिए जाते वक्त ठीक उसी तर्ज पर ‘जय श्री राम’ के नारे लगे जिस तर्ज पर ममता बनर्जी को देखकर बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने लगाए थे। ममता और ओवैसी की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग रहीं और इस वजह से नतीजे भी अलग-अलग देखने को मिले। ममता की प्रतिक्रिया का आलम ये है कि ‘जय श्री राम’ के नाम पर बीजेपी और टीएमसी के कार्यकर्ता एक-दूसरे की जान के दुश्मन बने हुए हैं। असदुद्दीन ओवैसी ने नारे लगाने वालों को ‘और लगाओ’ के अंदाज में उकसाया। फिर जवाब में ‘अल्लाह हू अकबर’ के नारे लगाए। अब किस मुंह से असदुद्दीन ओवैसी को दोष दिया जाए, जिन्होंने गलत उदाहरण सामने रखा। हम उन्हें इसलिए जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते क्योंकि शुरुआत बीजेपी सांसदों ने की। संसद की गरिमा तार-तार हो गयी। न्यू इंडिया का नारा देने वाले नरेंद्र मोदी की आंखों के सामने यह सब हुआ।

मेरठ की घटना की असली सच्चाई यह है कि परिवारों के संपन्न हो जाने के चलते उनके ज्यादातर लोग बाहर बस गए हैं। “दि प्रिंट” में इससे संबंधित आयी रिपोर्ट इसका खुलासा करती है। लेकिन उसे सांप्रदायिक नजरिये से पेश कर मीडिया वाले न केवल समाज में नफरत के जख्मों को और गहरा कर रहे हैं बल्कि समुदायों के बीच एक ऐसी दरार डाल दे रहे हैं जिसे पाटने में लोगों को वर्षों लग जाएंगे। पहले से ही देशभर में बदले की सामुदायिक भावना मजबूत हो रही है। इस भावना को कमजोर करने और नेस्तनाबूत करने की जरूरत है। मगर, यह काम एक पक्षीय नजरिए से नहीं हो सकता। हिन्दू और मुसलमान समुदायों के बीच आपसी सौहार्द बनाने की राष्ट्रव्यापी पहल करने की आवश्यकता है। ऐसा करने के लिए उन सभी घटनाओं के लिए जिम्मेदार लोगों को कानून के तहत सज़ा दिलाना पहला काम होना चाहिए।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल विभिन्न चैनलों के पैनल में उन्हें देखा जा सकता है।)

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