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विश्व पुस्तक मेला 2020:अंतिम दिन उमड़ा पुस्तक प्रेमियों का हुजूम

किताबों का महाकुंभ यानी विश्व पुस्तक मेला (World Book Fair 2020) अंतिम दिन अपने सबाब पर था। 4 जनवरी को शुरू हुए विश्व पुस्तक मेले के अंतिम दिन बच्चे, युवा और बुजुर्गों की भारी भीड़ ने अपने-अपने पसंदीदा स्टालों में जम कर खरीदारी की। देर रात तक प्रवेश द्वार 1 व 10 पर लंबी कतारें देखी गईं। नौ दिनों तक चले इस मेले को लगभग 10 लाख से अधिक लोग देखने आए। इस भारी भीड़ के बीच प्रगति मैदान के विभिन्न मंडपों में कई साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। किताबों के इस त्यौहार के 28वें संस्करण का कल यानी 12 जनवरी को विधिवत समापन हो गया। पुस्तक मेले में दो-तीन दिन खराब मौसम औऱ बूंदा-बांदी की वजह से भीड़ कम आई लेकिन अंतिम दिन पुस्तक प्रेमियों का भारी हुजूम देखने को मिला। रविवार होने की वजह से पुस्तक मेले में कॉलेज गोइंग यूथ के साथ-साथ नौकरीपेशा लोग पूरे परिवार के साथ आए।
यह कहा जाता है कि सोशल मीडिया और इंटरनेट के इस युग में युवा पीढ़ी पुस्तकों से विमुख हो रही है। युवा हमेशा मोबाइल पर लगे रहते हैं उनको पुस्तक पढ़ने का न तो शौक है और न ही समय। हिंदी की पुस्तकें नहीं बिकती हैं, इस तरह की बात हम आए दिनों सुनते रहते हैं। लेकिन पुस्तक मेले में पुस्तक खरीद रहे लोगों की उम्र, वर्ग और पेशा देख कर यह कहा जा सकता है कि संचार क्रांति के युग में भी पुस्तकों से लोगों का मोह कम नहीं हुआ है। पुस्तक न बिकने की बात प्रकाशकों की साजिश है। पुस्तक मेले में युवाओं की भारी संख्या को किताबें खरीदते हुए आप देख सकते हैं।
पुस्तक मेले का आनंद लेते हुए हमने युवाओं के साथ ही प्रकाशकों से भी यह जानने की कोशिश की कि किस तरह की पुस्तकें ज्यादा बिक रही हैं। युवा या अन्य खरीदार किस तरह की पुस्तकों को खरीदना पसंद कर रहा है। क्या आज के युवाओं के दिलोदिमाग पर चेतन भगत जैसे लेखक ही राज कर रहे हैं या हिंदी साहित्य की कालजयी रचनाएं, इतिहास, राजनीति शास्त्र और भारतीय ज्ञान को समृद्ध करने वाले बहुतेरे लेखकों की किताबें भी उनकी पसंद में शामिल हैं।
युवाओं से बात करने के बाद यह धारणा छूमंतर हो गई कि हिंदी लेखकों और वैचारिक पुस्तकें नहीं बिकती हैं। हाथों में किताबों का थैला लिए एक युवक से हमने जानने की कोशिश की कि उसने कौन सी किताबें खरीदी हैं? राजेश ने बताया कि दिनकर की रश्मिरथी, गांधी की आत्मकथा और हमारा संविधान उन्होंने खरीदा है। राजेश कहते हैं कि, “कॉलेज में हमारे कई दोस्त रश्मिरथी की तारीफ करते थे। दोस्तों से लेकर रश्मिरथी को पढ़ा तो बहुत मजा आया, इस बार खरीद ही लिय़ा। संविधान जानना जरूरी है और गांधी के आत्मकथा की भी चर्चा होती रहती है इसलिए हमने सत्य के प्रयोग को खरीदा।”
पुस्तक प्रेमियों की पसंद जानने के लिए हमने संवाद, सामयिक, राजकमल, पेंग्विन, प्रकाशन विभाग, एनबीटी, एनसीआरटी, राजपाल एंड संस और प्रभात प्रकाशन के स्टॉल पर जाकर जायजा लिया।
एनबीटी और प्रकाशन विभाग के स्टॉल पर सस्ती और अच्छी किताबों का होना किसी से छिपा नहीं है। कॉलेज के छात्र, प्राध्यापक औऱ सरकारी नौकरी वालों के साथ ही पत्रकार और बुद्धिजीवी यहां पर अपनी पसंद की किताबों को छांटते हुए मिले। कारण पूछने पर चंद्रभान कहते हैं कि “एनबीटी और प्रकाशन विभाग की किताबें तथ्यात्मक रूप से सही होने के साथ ही सस्ती भी होती हैं इसलिए पुस्तक मेला आने वाला हर शख्स यहां पर जरूर आता है”।
संवाद प्रकाशन के आलोक श्रीवास्तव कहते हैं कि, “वैचारिक और राजनीतिक पुस्तकों के साथ-साथ देश के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल रहे महापुरुषों के साथ ही विश्व स्तर की चर्चित पुस्तकें युवाओं की पसंद हैं। भगत सिंह, अंबेडकर और अन्य क्रांतिकारियों के साथ ही नेहरू,पटेल और दूसरे महापुरुषों के जीवन पर आधारित पुस्तकें हर पुस्कत मेले में बिकती हैं।”
जनचेतना, नवारूण और कुछ छोटे प्रकाशकों की राय भी यही है कि यदि किताब अच्छी है तो युवा ही नहीं हर आयु के लोग उस पुस्तक को खरीदने से नहीं हिचकते हैं। राजपाल एंड संस के प्रबंधक ने कहा कि देखिए कुछ किताबें ऐसी हैं जिनको पसंद करने वालों की संख्या कम नहीं है। आज भी आचार्य चतुरसेन, फणीशवरनाथ रेणु, बृन्दावनलाल वर्मा, प्रेमचंद के साथ ही दुष्यंत कुमार और धूमिल को पढ़ने वालों की संख्या कम नहीं हुई है।
प्रभात प्रकाशन के पीयूष कुमार कहते हैं कि, “देश का सामाजिक,आर्थिक औऱ राजनीतिक वातावरण पाठकों के जेहन को प्रभावित करता है। हमारे यहां आने वाले पुस्तक प्रेमी हिंदी साहित्य की कालजयी रचनाओं को खरीदते हैं तो नए लेखकों की रचनाओं को भा खरीदते है। सबसे बड़ी बात यह है कि पाठकों की पसंद किसी खांचे में कैद नहीं है। वे प्रेमचंद को भी खरीदते हैं तो चेतन भगत को भी।”
राजकमल प्रकाशन के आमोद माहेश्वरी कहते हैं, “हिंदी साहित्य की जो किताबें विश्वविद्यालयों के कोर्स में शामिल हैं स्वाभाविक रूप से वो ज्यादा बिकती हैं लेकिन किसी कारण समय चर्चित हुई किताबें भी खूब बिकती हैं।”
डीयू में पढ़ने वाली स्वाति गज़ल और कविताओं की किताबें पसंद करती हैं। वो कहती हैं कि बातचीत के क्रम में शेर और कविताओं के उपयोग से बात या भाषण प्रभावी हो जाता है। और दोस्तों पर इसका असर भी पड़ता है। वाद-विवाद प्रतियोगिता से लेकर कहीं भी ऐसी पुस्तकें लाभदायक होती हैं। सामयिक प्रकाशन के महेश भारद्वाज कहते हैं कि उपन्यसों के साथ ही पत्रकारिता, पर्यावरण और वैचारिक पुस्तकें भी पसंद की जाती हैं। चर्चित उपन्यास तो हमेशा बिकते हैं। लेकिन पुस्तक मेले में कविता और कहानी की पुस्तकें भी बिकती हैं।
सरकारी प्रकाशकों मसलन एनसीआरटी, प्रकाशन विभाग और एनबीटी के स्टॉल पर सरकारी अधिकारी, प्राध्यापक और विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले प्रोफेशनल्स के साथ ही कॉलेज के छात्रों और युवाओं की खूब भीड़ देखने को मिली। छात्र जहां कोर्स की किताबें और कम्पटीशन में काम आने वाली किताबों को खरीदने में जुटे थे वहीं सरकारी नौकरी वाले लोग वैज्ञानिक शब्दावली और कार्यालयों में दिन प्रतिदिन उपयोग में आने वाली किताबों का खरीदते दिखे।
पुस्तक मेले में आने वाले सिर्फ पुस्तक ही खरीदने नहीं आते हैं। पुस्तक मेला में हर वर्ष बच्चों को ध्यान में रखते हुए बाल मंडप बनाया जाता है। बाल मंडप में बच्चों को खेल के साथ ही लेखन, वाद-विवाद और कहानी-कविता प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया।
विश्व पुस्तक मेला 2020 के अंतिम दिन थीम मंडप में ‘मैथिली मचान‘ और ‘राष्ट्रीय पुस्तक न्यास‘ के संयुक्त तत्वावधान में ‘मैलोरंग‘ संस्था द्वारा ऊषा किरण खान द्वारा रचित मैथिली नाटक ‘एक मुठिया‘ का नाट्य-पाठ किया गया। इस अवसर पर ऊषा किरण खान के साथ मैथिली की प्रख्यात लेखिका डॉ. सविता झा खान भी उपस्थित थीं।
ऊषा किरण खान द्वारा रचित यह मैथिली नाटक ‘दरभंगा‘ में सन् 1919 में स्थापित गांधी आश्रम की स्थापना के बहाने गांधी के विचारों की सुदूर गांव तक पहुंच को दर्शाता है। गांधी जी का दर्शन आम जनता का दर्शन है। उनके विचार आम जनता के लिए हैं, जिसे इस नाटक में प्रभावी तरीके से दर्शाया गया है।
पुस्तक मेले के अंतिम दिन बाल मंडप में ‘द लिटिल गर्ल‘ नामक एक कहानी वाचन कार्यक्रम से हुई। विकास दवे और मंजरी शुक्ला ने बच्चों के साथ बातचीत की और दिलचस्प कहानियां सुनाईं। इन कहानियों के माध्यम से उन्होंने उन संघर्षों को उजागर करने की कोशिश की जो एक बच्ची अक्सर झेलती है। सत्र का आयोजन राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा किया गया। 23 हज़ार वर्ग मीटर पर फैले हुए पुस्तक मेले में 600 से अधिक प्रकाशक और 1300 से अधिक स्टॉलों के साथ मेले में 20 से अधिक विदेशी प्रतिभागी भी शामिल रहे।

This post was last modified on January 13, 2020 8:41 pm

प्रदीप सिंह

लेखक डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।

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