Fri. May 29th, 2020

वंचितों के लिए अपनी जिंदगी लगा देने वाले वीपी सिंह राम मंदिर और गोरक्षा जैसे मुद्दों के दौर में फिर हो गए हैं प्रासंगिक

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वीपी सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री।

बात 18 दिसम्बर 1990 की है। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू किए जाने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह (वीपी) की सरकार गिर गई थी। गोरखपुर के तमकुही कोठी मैदान में मांडा के राजा और 1989 के चुनाव के पहले देश के तकदीर विश्वनाथ प्रताप सिंह की सभा होने वाली थी। सामाजिक न्याय के मसीहा का पहला और मेगा शो गोरखपुर में हुआ।

पिपराइच के विधायक केदारनाथ सिंह को सभा का संयोजक बनाया गया, महराजगंज के सांसद हर्षवर्धन सिंह कार्यक्रम करा रहे थे। कुल मिलाकर कार्यक्रम में तत्कालीन विधायक केदारनाथ सिंह, हर्षवर्धन और मार्कंडेय चंद की अहम भूमिका थी। प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी, जो जनता दल (स) में चले गए थे। इसका गठन चंद्रशेखर ने जनता दल को तोड़कर किया था। चंद्रशेखर करीब 40 सांसदों के साथ कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री थे।

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मांडा नरेश ने समाज के 52 प्रतिशत वंचित तबके को वह अधिकार दे दिया था, जिसकी मांग स्वतंत्रता के समय से ही हो रही थी। सरकार गिर गई। लेकिन मांडा नरेश ने जो क्रांति की, उसकी धमक ऐसी हुई कि दक्षिणपंथी दल भाजपा और उसकी मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बौखला गए थे।

वीपी सिंह ने गोरखपुर रैली में कहा, “भूख एक ऐसी आग है कि जब वह पेट तक सीमित रहती है तो अन्न और जल से शांत हो जाती है और जब वह दिमाग तक पहुंचती है तो क्रांति को जन्म देती है। इस पर गौर करना होगा। गरीबों के मन की बात दब नहीं सकती और अंततः उसके दृढ़ संकल्प की जीत होगी।”

देश की एक बड़ी और शासन प्रशासन, शिक्षा और देश के मलाईदार पदों से वंचित पिछड़े वर्ग को उनका वाजिब हक विश्वनाथ प्रताप सिंह ने दे दिया था। उनका संदेश साफ था कि देश तभी समावेशी और विकसित होने की दिशा में बढ़ सकता है, जब हर किसी को यह अहसास हो कि भारत उनका भी देश है और भारत में मौजूद हर गम के साथ हर खुशियां भी उनकी हैं।

मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने पर जहां आरएसएस-भाजपा परोक्ष रूप से विरोध कर रहे थे, वहीं विश्व हिंदू परिषद और भाजपा के जिला स्तर के कार्यकर्ता खुलेआम आरक्षण और वीपी सिंह के विरोध में उतर आए। भाजपा के वरिष्ठ नेता पहले से ही रथ लेकर निकल पड़े थे और देश भर में दंगे हो रहे थे।

उसी बीच जनता दल के नेता शरद यादव ने 25.08.1992 से 6.11.92 तक मंडल रथ यात्रा निकाली। इसका मकसद न सिर्फ यह बताना था कि सरकार ओबीसी रिजर्वेशन को लेकर साजिश न करे, साथ ही पिछड़ा वर्ग भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो। शरद यादव ने घोषणा की, “हम वर्तमान केंद्र की सरकार को खबरदार करना चाहते हैं कि हमें उनकी नीयत का पता है। हमें यह भी पता है कि अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास मंडल कमीशन द्वारा उत्पन्न पिछड़े व दलितों के जागरण को कब्र में भेजने की यह चतुर द्विज चाल है।”

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उसी सभा में कहा, “गरीबों की कोई बिरादरी नहीं होती। दंगों में मारे जाने वाले लोग हिंदू और मुसलमान नहीं, हिंदुस्तान के गरीब लोग हैं। गरीबों के साथ हमेशा अत्याचार होते रहे हैं। इस शोषण अत्याचार को बंद करके समाज के पिछड़े तबके के लोगों को ऊपर उठाना होगा।”

इस समय भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है। हिंदुत्व, राम मंदिर, राष्ट्रवाद, गोरक्षा पर चर्चा प्राथमिकता में है। रोजी, रोजगार और लोगों का जीवन स्तर चर्चा से गायब है। वंचितों के लिए अपनी जिंदगी लगा देने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह को आज याद करने की जरूरत है। उनके मकसद को याद करने की जरूरत है क्योंकि बेरोजगारी, महंगाई और पूंजी के कुछ हाथों तक केंद्रित होने की सबसे बड़ी मार उस गरीब और समाज के पिछड़े तबके पर सबसे ज्यादा पड़ रही है, जिसे आगे बढ़ाने के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री पद को दांव पर लगा दिया था।

(लेखक सत्येंद्र पीएस वरिष्ठ पत्रकार हैं और मंडल कमीशन पर लिखी गयी उनकी किताब ‘मंडल कमीशन: राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी पहल’ बेहद चर्चित रही है।)

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