Wednesday, December 7, 2022

करीब 93 साल बाद फिर निकला ‘स्त्री दर्पण’ 

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नई दिल्ली। कल का दिन हिंदी पत्रकारिता के लिए विशेषकर स्त्री पत्रकारिता के लिए एक बड़ा ऐतिहासिक दिन था क्योंकि 93 साल बाद नई “स्त्री दर्पण” पत्रिका को शुरू किया गया।

1909 से लेकर 1929 तक 20 सालों तक इलाहाबाद से निर्बाध रूप से निकली इस पत्रिका की संपादक रामेश्वरी नेहरू थीं जो मोतीलाल नेहरू के चचेरे भाई बृजलाल नेहरू की बहू थीं। जिस तरह आजादी की लड़ाई में गणेश शंकर विद्यार्थी के “प्रताप” महावीर प्रसाद द्विवेदी की “सरस्वती” और महादेव प्रसाद सेठ के “मतवाला” तथा प्रेमचंद की “हंस” पत्रिका ने अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाई कुछ वैसे ही भूमिका “स्त्री दर्पण” ने भी निभाई थी लेकिन इतिहासकारों ने उसके महती योगदान पर अधिक ध्यान नहीं दिया।

साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं व्यास सम्मान से विभूषित वयोवृद्ध लेखिका मृदुला गर्ग ने इस पत्रिका का कल शाम ऑनलाइन लोकार्पण किया। पत्रिका की संपादक हिंदी की वरिष्ठ कवयित्री एवं इग्नू में स्त्री अध्ययन की प्रोफेसर सविता सिंह और वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द कुमार हैं।

पत्रिका के सलाहकार मंडल में श्रीमती मृदुला गर्ग के अलावा वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा प्रसिद्ध आलोचक रोहिणी अग्रवाल और दिल्ली विश्विद्यालय में  प्रोफेसर डॉक्टर सुधा सिंह शामिल हैं।

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कल लोकार्पण समारोह में मृदुला गर्ग ने भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति और पितृसत्त्ता का हवाला देते हुए सत्तर के दशक में अपने चर्चित उपन्यास चितकोबरा लिखे जाने पर अश्लीलता के आरोप में गिरफ्तारी का भी जिक्र किया और कहा कि आज भी भारतीय समाज मे स्थिति बदली नहीं है।

उन्होंने कहा कि जब स्त्री अपनी यौनिकता और स्वतंत्रता की बात करती है तो पुरुषों में खलबली मच जाती है और वे विरोध करने लगते हैं। दरअसल वे स्त्रियों को नियंत्रित करना चाहते हैं उन पर अधिकार जमाना चाहते हैं।

75 वर्षीय लेखिका सुधा अरोड़ा ने कहा कि स्त्रियों ने हमेशा सत्ता का विरोध किया है और आज भी हमें प्रतिरोध करने की जरूरत है और साहित्य में सत्ता के चाटुकार लोगों की जगह नहीं होनी चाहिए। उन्होंने राजेन्द्र यादव की पत्रिका हंस का जिक्र करते हुए कहा कि वह पत्रिका बीच में भटक गई थी और हंस की जगह” हंसिनी” हो गयी थी। उम्मीद् है कि “स्त्री दर्पण” नहीं भटकेगा और विरोध का तेवर बनाये रखेगा।

प्रोफेसर सुधा सिंह ने भी कहा कि इतिहास में स्त्रियों को उचित स्थान नहीं मिला और पितृसत्त्ता ने उनके नाम दर्ज नहीं किये जिससे वे ओझल हो गईं। उन्होंने स्त्री विमर्श में भाषा के सही इस्तेमाल पर जोर दिया और कहा कि कई बार स्त्री विमर्श करने वाली स्त्रियों की भाषा और मानसिकता भी पुरुषवादी  होती है। इसलिए हमें सचेत रहने की जरूरत है और स्त्रियों की सोच का समर्थन करने वाले पुरुषों को भी साथ लेकर चलने की जरूरत है।

संपादक सविता सिंह ने कहा कि स्त्री दर्पण पत्रिका के यथोचित योगदान का मूल्यांकन नहीं हुआ जबकि इस पत्रिका ने वैसी ही भूमिका निभाई जैसी भूमिका महावीर प्रसाद द्विवेदी की “सरस्वती”, गणेश शंकर विद्यार्थी के “प्रताप” प्रेमचन्द के “हंस” और महादेव प्रसाद सेठ के “मतवाला” ने निभाई।

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उन्होंने कहा कि पहले भी स्त्रियों ने इसे निकाला और आज भी स्त्रियां ही इसे निकाल रहीं हैं, यह बड़ी बात है।

उन्होंने बताया कि करीब 2 वर्ष पूर्व महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि के मौके पर फेसबुक ग्रुप का गठन हुआ था और देखते देखते डेढ़ वर्षों में इसके सदस्यों की संख्या 10,000 से अधिक हो गई और अब दुनिया के 54 देशों और भारत के सौ शहरों में “स्त्रीदर्पण” को देखा और पढ़ा जा रहा है। इसकी सफलता को देखते हुए हम लोगों ने इस नाम से वेबसाइट निर्माण किया आप इंग्लिश में स्त्री दर्पण टाइप करें आपको वेबसाइट दिख जाएगी। अब तक उस पर 1,000 से अधिक प्रविष्टियां दर्ज की गई हैं और करीब सवा सौ लेखिकाओं के पेज बन गए हैं तथा 80 वीडियो भी पोस्ट किए गए हैं और यूट्यूब निर्माण किया गया है। अब तीसरे चरण में हमने एक पत्रिका निकाली है। हमने यह पत्रिका बहुत कम समय में निकाली है। 26 मई को गीतांजलि श्री को अंतरराष्ट्रीय बुकर  अवार्ड मिलने की घोषणा हुई और इससे एक माह के भीतर ही हमें इस पत्रिका का पहला अंक आपके सामने पेश कर दिया है।

इस अंक में बुकर अवार्ड पर हमारे समय के महत्वपूर्ण संस्कृति कर्मी कवि एवं लेखक अशोक बाजपेयी का एक संक्षिप्त साक्षात्कार, प्रत्यक्षा,हर्ष बाला शर्मा सपना सिंह विपिन चौधरी आदि के लेख और फेसबुक पर ऑर्गेज़्म पर हुई गरमा गरम बहस को ध्यान में रखते हुए इस समस्या पर तीन लेख भी हम दे रहे हैं जिसमें वरिष्ठ कवयित्री अनुवादक पत्रकार प्रगति सक्सेना का एक महत्वपूर्ण लेख युवा कथाकार अणुशक्ति सिंह की टिप्पणी और प्रसिद्ध कला समीक्षक पत्रकार विनोद भारद्वाज की भी एक टिप्पणी हम दे रहे हैं। इसमें लेखकों की पत्नियाँ सिरीज़ में आचार्य शिवपूजन सहाय की पत्नी बच्चन देव  पर एक लेख भी है। इसके साथ ही सत्यजीत रे की जन्मशती पर सुप्रसिद्ध फ़िल्म अध्येयता जवरीमल पारख का लेख और विद्या निधि छाबड़ा का एक बहुत ही गंभीर लेख गोर्की पर दे रहे हैं। चर्चित नाटक कार राजेश कुमारका रंगमंच और स्त्री पर लेख आप पढ़ेंगे। तेजी ग्रोवर की कविता और साथ में कई स्तम्भ भी आप देखेंगे।”

इस पत्रिका के पीडीएफ अंक और हार्ड कॉपी के बारे में सूचना स्त्रीदर्पण  वेबसाइट पर तथा स्त्री दर्पण के फेसबुक पेज पर दी जाएगी।

कार्यक्रम का संचालन पारुल बंसल ने किया और धन्यवाद रीतादास राम ने दिया।

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